कैलाश विजयवर्गीय के वक्तव्य के बहाने जनसंवेदना और संस्कार की राजनीति



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

●शिक्षा, संस्कार और राष्ट्रभक्ति पर बोले कैलाश विजयवर्गीय, बयान को लेकर क्यों मचा राजनीतिक बवाल?

●समाजसेवी से सत्ता तक का सफर और संस्कार की राजनीति से जननेता की बेबाकी पर क्यों हो रही सियासत?

मध्यप्रदेश की राजनीति में जब भी स्पष्ट विचार और सामाजिक सवालों की बात होती है तो कैलाश विजयवर्गीय का नाम चर्चा में आता है। इंदौर के पार्षद से लेकर प्रदेश के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री तक का उनका राजनीतिक सफर केवल पदों की कहानी नहीं, बल्कि संगठन, जनसंपर्क और वैचारिक दृढ़ता का उदाहरण है। हाल के दिनों में उनके एक वक्तव्य को लेकर जिस तरह का विवादित माहौल खड़ा करने की कोशिश की गई, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज राजनीति में सच्चे और तीखे सवाल पूछना भी अपराध बनता जा रहा है? दरअसल, यह पूरा विवाद उस वक्तव्य से जुड़ा है जो कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में एक निजी शिक्षण संस्थान के कार्यक्रम के दौरान दिया। यह मंच शिक्षा, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गंभीर विषयों पर संवाद का था। मंत्री विजयवर्गीय ने नई शिक्षा नीति, बच्चों के चरित्र निर्माण और माता-पिता की भूमिका पर बेबाक टिप्पणी करते हुए पूरे सिस्टम को आत्ममंथन के लिए कटघरे में खड़ा किया। लेकिन दुर्भाग्यवश, उनके कथन के एक उदाहरण को संदर्भ से अलग कर राजनीतिक रंग देने की कोशिश की गई।

• व्यवस्था पर तंज, व्यक्ति पर नहीं

अपने वक्तव्य में कैलाश विजयवर्गीय ने कहा था कि केवल नई शिक्षा नीति बना देने से बच्चों में चरित्र नहीं आ सकता, जब तक घर का वातावरण सही न हो। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह बात रखी कि बच्चा दिन के लगभग 20 घंटे घर में और केवल 4 घंटे स्कूल में रहता है। ऐसे में अगर घर का माहौल ही अनुशासनहीन, भोगवादी या गलत आदतों से भरा हो, तो स्कूल में दी गई शिक्षा का असर सीमित रह जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि यदि घर का माहौल ऐसा हो कि पिता पीडब्ल्यूडी मंत्री है और बच्चों को कपड़े दिलाने ठेकेदार ले जा रहा है, तो फिर बच्चों से चरित्र की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह कथन किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं था, बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था और गलत सामाजिक उदाहरणों पर करारा तंज था। स्वयं कैलाश विजयवर्गीय ने बाद में पत्र जारी कर अपने बयान के उद्देश्य को स्पष्ट भी किया।

• तोड़-मरोड़ की राजनीति क्यों?

सवाल यह उठता है कि एक वैचारिक उदाहरण को लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा किया गया? क्या विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि अब नेताओं को सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्ट मानसिकता पर बोलने का अधिकार भी नहीं है? जनप्रिय नेता होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय की हर बात को ध्यान से सुना जाता है और शायद यही वजह है कि उनके वक्तव्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है। वास्तविकता यह है कि उनका पूरा वक्तव्य बच्चों के संस्कार, माता-पिता की जिम्मेदारी और सामाजिक वातावरण की भूमिका पर केंद्रित था। उन्होंने साफ कहा कि बच्चों के चरित्र की नींव घर से पड़ती है। माता-पिता ही बच्चों के पहले शिक्षक होते हैं। ऐसे में यदि घर में ही गलत आदतें, गलत उदाहरण और अनुचित व्यवहार मौजूद हो तो शिक्षा व्यवस्था अकेले चमत्कार नहीं कर सकती।

• माता-पिता के लिए भी “सिलेबस” की बात

विजयवर्गीय का यह सुझाव कि माता-पिता के लिए भी एक “सिलेबस” होना चाहिए, अपने आप में दूरदर्शी सोच को दर्शाता है। उनका आशय यह था कि जैसे बच्चों को स्कूल में क्या पढ़ाया जाए, इसकी योजना होती है, वैसे ही माता-पिता को भी यह समझना चाहिए कि बच्चों से कैसे संवाद करें, उनके सामने कैसा व्यवहार रखें और किस तरह का माहौल बनाएं। यह विचार किसी भी समाज सुधारक की तरह सामाजिक जिम्मेदारी की याद दिलाने वाला है, न कि किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी।

• राष्ट्रभक्ति और चरित्र निर्माण पर जोर

मंत्री विजयवर्गीय ने शिक्षा के साथ राष्ट्रभक्ति को भी अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि आज संस्थाएं इंजीनियर, डॉक्टर और प्रोफेशनल तो बना रही हैं, लेकिन चरित्रवान और राष्ट्रभक्त नागरिक बनाने पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। उन्होंने सवाल उठाया कि दुनिया में ऐसा कौन सा संगठन है, जो बच्चों को व्यवस्थित रूप से राष्ट्र भक्ति का पाठ पढ़ा रहा है? यह सवाल आज के समय में बेहद प्रासंगिक है, जब सफलता को केवल पैकेज और डिग्री से मापा जा रहा है। कैलाश विजयवर्गीय का मानना है कि जब तक शिक्षा के साथ संस्कार और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध नहीं जुड़ता, तब तक समाज संतुलित नहीं हो सकता।

• जिम्मेदार राजनीति का उदाहरण

जब उनके बयान को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया, तब कैलाश विजयवर्गीय ने पत्र जारी कर अपने उद्देश्य को स्पष्ट किया। यह कदम दर्शाता है कि वे संवाद और स्पष्टता में विश्वास रखते हैं। उन्होंने यह साफ किया कि उनका बयान भ्रष्टाचार पर कटाक्ष और सामाजिक वातावरण पर चिंता जताने के लिए था, न कि किसी व्यक्ति या वर्ग को लक्ष्य करने के लिए। आज जरूरत इस बात की है कि राजनीति में विचारों को सुनने और समझने की संस्कृति विकसित हो। कैलाश विजयवर्गीय का वक्तव्य बच्चों के चरित्र निर्माण, माता-पिता की भूमिका और राष्ट्रभक्ति जैसे मूलभूत मुद्दों पर केंद्रित था। इसे विवाद बनाना दरअसल उन सवालों से बचने की कोशिश है, जो समाज को आईना दिखाते हैं। विजयवर्गीय ने हमेशा सामाजिक सरोकारों को प्राथमिकता दी है। उनके विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश करना न तो स्वस्थ राजनीति का संकेत है और न ही समाज के हित में है। आज जब राजनीति को दिशा और दृष्टि की जरूरत है, तब ऐसे स्पष्ट और साहसी वक्तव्यों को विवाद नहीं, विमर्श का विषय बनाया जाना चाहिए।

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