--आचार्य श्रीहरि
नई दिल्ली, इंडिया इनसाइड न्यूज।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज वर्मा के आँखो में आंसू थे, वे लगातार सिसक रहे थे, आँखों के आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे, वे मुझसे पूछते हैं कि आचार्य जी आपने यह क्या करा दिया? क्या यही दिन देखना था? मै निशब्द हो गया, मेरी कठोरता भी बर्फ की तरह पिघल गई, मुझे अशोक सिंहल के फटे सिर से टपकते खून याद हो गए, मुझे उमा भारती के वे वाक्य भी याद हो गए जिसमें उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को कहा था कि शर्म आपको आती होगी, मुझे तो बाबरी मस्जिद के ढांचे गिरने, ध्वस्त होने से गर्व की अनुभूति हो रही है।
पत्रकार संवेदनशील होता है, कोई संवेदनाहीन व्यक्ति सही पत्रकार हो ही नहीं सकता है, वह सिर्फ लुटेरा हो सकता है, पैरोकार हो सकता है। चूंकि मनोज वर्मा रामनदिर आंदोलन से न केवल साथ थे, बल्कि भगवान राम के प्रति उनका समर्पण रहा है, इसलिए उनका व्यथित होना अस्वाभाविक नहीं बल्कि स्वाभाविक है। मनोज वर्मा ही क्यों, बल्कि करोड़ों उन रामभक्तो की भावनाएं, बलिदान आहत हुई है, जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी, पुलिस की गोलिया खायी थी, मुस्लिम जिहादियों की हिंसा झेली थी, कांग्रेस राज का उत्पीड़न झेला था, मुलायम सिंह यादव राज की गोलियों के सामने अपने सीने तान कर खड़े थे। मै खुद राममंदिर आंदोलन का हिस्सा था, पुलिस की लाठिया खाई थी, बाबरी मस्जिद के ढांचे का विनाश देखा था, ईट पूजन आंदोलन में महीनों गांव गांव घुमा था। क्योंकि मै राममनोहर लोहिया का वैचारिक शिष्य था, राममनोहर लोहिया के आराध्य भी भगवान श्रीराम थे, राममनोहर लोहिया श्रीराम मेला लगाते थे और कहते थे कि भारत को जानना है तो भगवान राम को जानो, उनके आदर्श और महानता से जुड़ो। श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में दान की राशि की लूट कितनी की है? दो सौ करोड़ पार तक लूट की बात आ रही है।
राममंदिर आंदोलन को पूर्ण तक पहुंचाने वाले विनय कटियार की भावनाओं का उल्लेख करना भी अति आवश्यक है। विनय कटियार की रामवाणी युवाओं का खून खौला देती थी, युवाओं को श्रीराम मंदिर के लिए मरने मिटने के लिए प्रेरित कर देती थी। श्रीराम मंदिर में दान और चढ़ावे में लूट, चोरी, डकैती पर दुखी होते हुए कहा कि जिस भगवान श्रीराम मंदिर के लिए कल्याण सिंह ने अपनी सत्ता त्याग दी थी और कहा था कि भगवान श्री राम के लिए एक तो क्या मै सौ सौ सत्ता का भी त्याग कर सकता हूं, कल्याण सिंह जी की आत्मा आज कितनी पीड़ा में होगी? सिर्फ कल्याण सिंह ही नहीं बल्कि उन कोठारी बंधुओं की आत्मा भी व्यथित होगी और अपने बलिदान पर पश्चाताप कर रही होगी। कोलकाता के कोठारी बंधु अपने माता पिता के दो ही बेटे थे, दोनों ने मुलायम सिंह यादव सरकार की गोलियों को डटकर सामना किया था, जिनकी शरीर छलनी हो गई थी, फिर भी अंतिम सांस तक हार नहीं मानी थी। उन सैकड़ों लोगों की आत्मा भी अशांत होगी जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बलिदान किया था। विशेषकर उन हजारों साधु संतों की आत्माएं भी गुस्से में होगी जो पुलिस के सामने दीवार बन गए थे और गोलियों से छलनी होने के बाद भी पुलिस से लड़े थे। अयोध्या की धरती साधु संतों और रामभक्तो के खून से लाल हो गई थी, मुलायम सिंह की सरकार ने हजारों साधु संतों के शवों को सरयू नदी में भी बहा दिया था। चूंकि साधु संत का जीवन परिवार मुक्त और पहचान विहीन होता है, इसलिए उनकी खोज खबर रखना, किसी के लिए संभव नहीं है।
भगवान श्रीराम मंदिर के दान और चढ़ावे के लुटेरे, चोर, डकैतों के कुछ नाम सामने आए हैं, इनकी पहचान उनकी अचानक बढ़ी हुई संपत्ति और रुतबे के आधार पर हुई है। दो नाम बहुत ही प्रचारित हो रहे हैं। एक नाम है, लवकुश मिश्रा का। लवकुश मिश्रा कभी कार मिस्त्री था, उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किसी तरह उसका भाग्य चमक गया, भगवान श्रीराम मंदिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया, कमर्चारी बनते ही उसका रुतबा भी चमक गया, उसकी संपति अचानक सातवें आसमान पर चढ़ गई, करोड़ो का मालिक बन गया, उसके पास कई प्लॉट, कई रिश्तेदारों के नाम संपतिया है, लवकुश मिश्रा के घर से गोबर के ढेर में छिपाये गए लाखों रुपए मिले हैं। एक अन्य है अनिल मिश्रा। अनिल मिश्रा भी करोड़ों का मालिक बन गया। टीनू यादव का प्रकरण और उदाहरण तो लोमहर्षक है और डकैत जैसा है, सबूत मिटाने जैसा है, टीनू यादव चंपत राय का निजी ड्राइवर था, फिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया। इसकी संपति करोड़ो में है, इनकी तूती बोलती थी, क्योंकि ये चंपत राय का बेहद विश्वास पात्र था। टीनू यादव ने ही रामनदिर चढ़ावे और दान से संबंधित वीडियो डिलीट कराए हैं, कुल आठ महीने के वीडियो गायब मिले हैं, गायब वीडियो की रिकवरी भी संभव नहीं है, जहां तक टीनू यादव की अवैध संपत्ति की बात है तो फिर उसकी संपति करोड़ो में है, जिसके प्रमाण सार्वजनिक हो गए। बैंक अधिकारी भी मालो माल हो गए।
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय? दान और चढ़ावे में लूट के पीछे नृपेन मिश्रा का हाथ बताया जा रहा है, नृपेन मिश्रा भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष है, नृपेन मिश्रा ने कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रबंधन में भूमिका निभाई है, नृपेन मिश्रा कौन है? नृपेन मिश्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के अति दुलारे और विश्वास पात्र हैं, मोहन भागवत के कहने पर मोदी ने इन्हें मंदिर निर्माण का सरगना बनाया था। इसलिए ट्रस्ट के प्रबंधन पर इनकी तूती बोलती है, इनकी सहमति के बिना मंदिर का कोई भी निर्णय और सुधार के कार्यक्रम तय नहीं हो सकते हैं। नृपेन मिश्रा क्या श्रीराम के भक्त थे, क्या ये हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते थे, समर्पण रखते थे? इसके उत्तर भी जानना अति आवश्यक है। कारसेवकों और साधु संतों पर गोलियां चलवाने के आरोपी और गुनाहगार नृपेन मिश्रा है। 1990 में जब कारसेवकों और साधु संतों के खून की होली खेली गई थी, तब उसका आदेश देने वाले यही नृपेन मिश्रा थे। उस समय ये मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव थे, कल्याण सिंह ने इन्हें प्रमुख सचिव के पद से हटा दिया था। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सरकार में इनकी पहुंच और रुतबा बढ़ता चला गया, दिन दुगनी और रात चौगुनी इनकी प्रगति होती चली गई। पहले उर्वरक मंत्रालय में सचिव बने फिर दूरसंचार मंत्रालय के सचिव भी बने, ट्राई के हेड भी बना दिए, कांग्रेस के लिए इनकी एक मात्र योग्यता कारसेवकों पर गोलियां चलवाने की थी, संसद में एक बार अखिलेश यादव ने कहा था कि जिसने गोलियां चलवाई, जिसने आपके कारसेवकों की हत्याएं कराई, उसी को आपने भगवान राम के मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनवा दिया। अरुण जेटली ने गुजरात भवन में मोदी और नृपेन मिश्रा की मुलाकात कराई थी। बाद की कहानी सभी को मालूम है। मोदी की कृपा नृपेन मिश्रा पर बरसती चली गई, सैया भय कोतवाल तो डर किस बात का।
संघ का प्रचारक मंद बुद्धि का नहीं होता है, संघ का प्रचारक तो अति विद्वान होता है, संघ का प्रचारक तो अति समझदार होता है, संघ का प्रचारक बईमान भी नहीं होता है, संघ का प्रचारक लोभ लालच से मुक्त होता है, संपति और परिवारिक मोह से भी दूर होता है। ये सभी भ्रम भी टूट गए, बेनकाब हो गए है। यह भी सर्विदित हो गया कि संघ का प्रचारक भी बईमान हो सकता है, झूठ बोल सकता है, सबूत मिटाने की करतूत को अंजाम दे सकता है, अपने नजदीकी की चोरी डकैती पर पर्दा डाल सकता है, पुलिस और कानून के हाथ लगने से बचा सकता है। इसका साक्षात उदाहरण चंपत राय है। चंपत राय श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव है, उनकी नियुक्ति संघ के प्रचारक के तौर पर हुई है। चढ़ावे और दान की राशि की लुट, चोरी, डकैती की घटना सामने आने पर चंपत राय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुलेआम झूठ बोला और कहा कि दान और चढ़ावे की राशि में कोई लूट नहीं हुई है, कोई गबन नहीं हुआ है, कोई हेराफेरी नहीं हुई है, कोई वीडियो डिलीट नहीं हुई है, हमारे कर्मचारी सत्य निष्ठा के प्रतीक हैं, भगवान श्रीराम के विरोधियों ने झूठा आरोप लगाया है, हम उन सभी पर कानूनी कार्रवाई करेंगे जो अफवाह उड़ाई है। पर जैसे उनके चालक टीनू यादव का लूट में शामिल होने का प्रकरण सामने आया, लव कुश मिश्रा, अनिल मिश्रा की संपति का खुलासा हुआ, वैसे ही चंपत राय गायब हो गए, उनकी बोलती बंद हो गई, उनकी ईमानदारी से पर्दा और नकाब उठ गया। कहने का अर्थ है कि चंपत राय ने झूठ बोल कर संघ की छवि खराब कर दिया। अगर चंपत राय ने सच को स्वीकार कर लिया होता तो फिर संघ की छवि भी खराब होने से बच जाती, रामभक्तो मे चंपत राय खुद सत्य निष्ठा के प्रतीक बन जाते और नायक भी बन जाते।
साधु संत और पुजारी का स्वभाव प्रबंधन सरीखा हो ही नहीं सकता है, साधु संत अपने ध्यान और तपस्या में लीन रहते हैं, इसलिए वे दान और चढ़ावे में गबन को रोकने में सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में साधु संतों के अलावा समाज के संघर्षशील और निष्ठावान लोगों को शामिल किया जाना चाहिए, ट्रस्ट से एक जाति का नियंत्रण और वर्चस्व सामाजिक विद्रोह के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक समीकरण बनना चाहिए। भगवान श्रीराम सिर्फ एक जाति के नहीं बल्कि सभी के आराध्य है। योगी आदित्यनाथ ईमानदार हैं, उन्होंने जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है फिर भी बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा के भावी चुनाव को देखते हुए कोई जोखिम नहीं लेगी, चढ़ावे और दान चोरी में जो पकड़े जाएंगे, उनकी जातियां विद्रोह पर उतर आएंगी और बीजेपी योगी को हराने की कसम खाने लगेगी। सिर्फ एनआईए ही इस लूट के गुनहगारों की गर्दन नाप सकती है। एनआईए जांच से ही श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट, बीजेपी, संघ की छवि बचेगी।
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