--विजया पाठक
एडिटर जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■केन्द्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सीएम मोहन यादव के खिलाफ किसानों का फूटा आक्रोश
■कम दाम में मूंग बेचने पर मजबूर किसान
■मध्यप्रदेश के अधिकांश जिलों में किसानों का प्रदर्शन
■किसानों की नाराजगी से सकते में मोहन सरकार
मध्यप्रदेश के किसानों की मुसीबतें कम होती दिखाई नहीं दे रही हैं। पहले गेंहू को बेचने में किसानों ने परेशानी झेली अब मूंग को लेकर भी वहीं स्थिति बन रही है। मूंग बेचने पर तो दोहरी मार पड़ने वाली है। क्योंकि मप्र सरकार ने फैसला किया है कि वह केवल प्रति एकड़ एक क्विंटल बीस किलो ही मूंग खरीद सकेगी। जबकि प्रति एकड़ मूंग 7-8 प्रति क्विंटल पैदा हुई है। ऐसी स्थिति में बाकी की मूंग को किसान कहां बेचेगा। स्वाभाविक है मजबूरन बाजार में व्यापारियों को मूंग बेचने पर मजबूर होगा। जबकि मूंग का सरकारी समर्थन मूल्य 8800 रूपये प्रति क्विंटल है। सरकार के इस फैसले से पूरे प्रदेश में केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और सीएम डॉ. मोहन यादव के खिलाफ किसानों का आक्रोश फूटा पड़ा है। पूरे प्रदेश में कांग्रेस के साथ मिलकर किसान सड़कों पर उतर आये हैं। किसानों के धरने, प्रदर्शन ने मोहन सरकार को सकते में डाल दिया है। मध्यप्रदेश सरकार ने ग्रीष्म मूंग का उत्पादन लगभग 20 लाख मीट्रिक टन होने का अनुमान जताया है और इस बार बरसात में देरी के कारण पैदावार भी अच्छी हुई है। अब जब पैदावार बेहतर हुई है तो खरीदने में सरकार की सांसें फूल रही हैं। दूसरी तरफ मोहन सरकार 2026 को कृषि कल्याण वर्ष के रूप में मना रही है। अब किसान सवाल कर रहे हैं कि यह कैसा कृषि कल्याण वर्ष है।
● शिवराज और मोहन यादव की कथनी और करनी में अंतर
जब प्रदेश में मूंग की फसल खेतों में तैयार हो रही थी तब केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री मोहन यादव मंचों से घोषणा करते थकते नहीं थे कि किसानों की मेहनत बर्बाद नहीं होने देंगे और मूंग को समर्थन मूल्य पर ही खरीदेंगे। हालांकि यहां पर इन्होंने चालाकी जरूर दिखाई कि यह नहीं बताया कि कितनी मात्रा में खरीदेंगे लेकिन किसान को लगा कि सरकार पूरी मात्रा में ही मूंग की खरीदी करेगी। यही कारण है कि किसानों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
●एमएसपी और बाजार भाव के बीच बढ़ती खाई
सरकार हर साल मूंग के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करती है, ताकि किसानों को उनकी लागत से कम दाम न मिलें। 2026 के आसपास मूंग का एमएसपी लगभग 8800 प्रति क्विंटल है। लेकिन हकीकत यह है कि मंडियों में किसानों को 6000 से 7000 प्रति क्विंटल के बीच ही दाम मिल रहे हैं। जब सरकारी खरीद नहीं होती, तो किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों को अपनी उपज बेच देते हैं। व्यापारी इसी स्थिति का फायदा उठाकर कम कीमत पर खरीदारी करते हैं।
● मंडियों का दवाब
जब सरकारी खरीद सीमित होती है, तो पूरा दबाव निजी मंडियों पर आ जाता है। वहां भाव पूरी तरह मांग और आपूर्ति पर निर्भर होते हैं। जैसे ही नई फसल बाजार में आती है, कीमतें तेजी से गिर जाती हैं। कई जिलों में देखा गया है कि शुरुआती दिनों में भाव ठीक रहते हैं, लेकिन जैसे-जैसे आवक बढ़ती है, रेट गिरकर लागत के करीब या उससे नीचे पहुंच जाते हैं। इससे किसानों की मेहनत का लाभ बिचौलियों और व्यापारियों को मिल जाता है।
● लागत बढ़ने और मुनाफा घटने की समस्या
किसान केवल फसल उगाने में ही नहीं, बल्कि बीज, खाद, सिंचाई, श्रम और परिवहन में भी भारी खर्च करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन सभी इनपुट लागतों में लगातार वृद्धि हुई है। लेकिन मूंग का बाजार भाव उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। इस असंतुलन के कारण किसान “लागत निकालना” भी मुश्किल समझ रहे हैं। कई किसानों का कहना है कि अगर फसल एमएसपी पर भी नहीं बिकती, तो वे घाटे में चले जाते हैं। किसानों की एक बड़ी चिंता नीति की अनिश्चितता भी है। कभी खरीद की घोषणा होती है, कभी प्रक्रिया देर से शुरू होती है, तो कभी सीमित कोटा तय कर दिया जाता है। इससे किसान यह तय नहीं कर पाते कि कौनसी फसल लाभकारी रहेगी। मप्र सरकार ने कुछ वर्षों में राज्य ने मूंग की खरीद प्रक्रिया को लेकर स्पष्टता नहीं दी, जिससे किसानों का भरोसा कमजोर हुआ है और उन्होंने फसल पैटर्न बदलना शुरू कर दिया है। किसानों को उत्पादन जोखिम के साथ-साथ बाजार जोखिम भी झेलना पड़ता है, जिससे यह फसल पहले जैसी “कम जोखिम वाली” नहीं रह गई है।
● छोटे और मध्यम किसानों की सबसे ज्यादा मार
मध्य प्रदेश के ज्यादातर मूंग उत्पादक छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती। ऐसे किसान फसल को लंबे समय तक रोककर नहीं रख सकते, इसलिए उन्हें तुरंत मंडी में बेचना पड़ता है। यही वजह है कि बड़े व्यापारी और आढ़ती इस स्थिति का फायदा उठाते हैं और कम दामों पर खरीद कर मुनाफा कमाते हैं।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, जिसे भारत का “दलहन राज्य” भी कहा जाता है, देश में मूंग (हरी मूंग) उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में से एक है। यहाँ के नर्मदापुरम, खरगोन, खंडवा, बड़वानी, रायसेन, सीहोर और देवास जैसे जिलों में हर साल हजारों किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती करते हैं। यह फसल कम पानी में, कम समय में और अपेक्षाकृत बेहतर मुनाफे के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल के वर्षों में यही फसल किसानों के लिए परेशानी और घाटे का कारण बनती जा रही है। इस साल भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। मूंग की फसल के बावजूद किसानों को मजबूरी में कम दामों पर अपनी उपज बेचनी पड़ रही है। इसके पीछे कई आर्थिक, प्रशासनिक और नीतिगत कारण हैं, जिन्होंने किसानों की कमर तोड़ दी है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि कृषि नीति और बाजार संरचना से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
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