--के. विश्वदेव राव
लखनऊ - उत्तर प्रदेश
इंडिया इनसाइड न्यूज।
27 जुलाई भारत के लिए एक ऐसी तारीख़ है, जब पूरा देश मिसाइलमैन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को स्मरण करता है। एक तमिलभाषी, गीतापाठी, रामभक्त, वीणावादक अब्दुल कलाम साहब भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति (2002) थे। शिलांग के भारतीय प्रबंधन संस्थान में छात्रों को व्याख्यान देते हुए उनका निधन हुआ था। ग्यारह वर्ष बाद, 2026 में जब भारत “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है तब यह देखना ज़रूरी हो जाता है कि कलाम साहब के विज़न पर देश ने कितनी दूरी तय की है और आगे की राह कैसी दिखती है।
डॉ. कलाम की सबसे चर्चित परिकल्पनाओं में एक थी “भारत विज़न 2020”। विज्ञान एवं तकनीक विभाग के अंतर्गत उनके नेतृत्व में अलग-अलग क्षेत्रों के पांच सौ विशेषज्ञों के एक दल ने यह दस्तावेज तैयार किया था, जिसका लक्ष्य वर्ष 2020 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में खड़ा करना था। इस परिकल्पना में उम्मीद जताई गई थी कि अगर सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर लगातार दस से ग्यारह प्रतिशत के आसपास बनी रहे, तो भारत आर्थिक रूप से विकसित देशों की पंक्ति में शामिल हो सकता है। बाद में इसी सोच को उन्होंने पुस्तक का रूप भी दिया, जिससे यह विज़न आम जनता तक पहुंचा।
लक्ष्य वर्ष बीते छह साल हो चुके हैं, और आंकड़े मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं। एक ओर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताज़ा विवरण के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल लगभग $4.15 ट्रिलियन है। यानी कलाम की कल्पना का दस-ग्यारह प्रतिशत सालाना विकास पूरी तरह हासिल तो नहीं हुआ, पर भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है, एक ऐसी उपलब्धि, जिसकी नींव उसी दौर की सोच में रखी गई थी।
डॉ. कलाम बार-बार यही कहते थे कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के सपनों और उनकी वैज्ञानिक सोच में छिपा होता है। नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में स्टार्टअप इंडिया पहल एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है। बीते दस वर्षों में इस पहल ने भारतीय उद्यमशीलता के परिवेश में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है, और आज देश में 1.59 लाख से अधिक स्टार्टअप दर्ज हैं, जिनके बूते भारत वैश्विक उद्यमिता के मानचित्र पर मजबूती से खड़ा दिखता है। डॉ. कलाम अक्सर छात्रों से यही पूछते थे कि वे कितने सवाल उठाते हैं, न कि कितने उत्तर रट लेते हैं। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए आज देशभर के तकनीकी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में शोध व नवाचार को उद्यमिता से जोड़ने के प्रयास तेज़ हुए हैं। डॉ. कलाम हमेशा कहा करते थे कि जब तक गांव मजबूत नहीं होंगे, तब तक भारत का विकास अधूरा रहेगा।
अब्दुल कलाम के संदर्भ में इतना आश्वस्त तो राष्ट्र हमेशा रहा था कि भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर होने पर उन्होंने भौगोलिक सीमाओं को पूरी तरह अक्षुण्ण रखा था। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में हमेशा उनकी प्राथमिकता रही। कारगिल युद्ध के दौर में भारत की सैन्य ताकत तोपों, टैंकों और पैदल सेना के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। इस मिसाइल मैन द्वारा बनाए प्रक्षेपास्त्रों ने पाकिस्तान का शायद ही कोई शहर छोड़ा हो या उस पर हमला न किया हो। अब्दुल कलाम को आज खासकर याद करेंगे। पाकिस्तान को बड़ा घमंड था कि मिसाइल में वह भारत से ज्यादा मजबूत है इसीलिए नाम भी उसने भारत पर हमला करने वाले लुटेरों के नाम पर रखा। जैसे मोहम्मद गौरी, जहीरूद्दीन बाबर, मोहम्मद अब्दाली लेकिन इन सबके सामने इस दक्षिण भारतीय मुसलमान द्वारा निर्मित मिसाइल ज्यादा कारगर रहे थे। आज, ठीक सत्ताईस वर्ष बाद, युद्ध की परिभाषा ही बदल चुकी है।
मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर ने इस बदलाव को साफ़ दिखा दिया। भारतीय वायुसेना ने एक ऐसा सैन्य अभियान अंजाम दिया जो महज़ तेईस मिनट तक चला, जिसमें पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में नौ ठिकानों पर सटीक हथियारों, उपग्रह-निर्देशित मिसाइलों और मंडराने वाले गोला-बारूद के ज़रिए हमला किया गया इस दौरान वायुसेना ने पाकिस्तान की चीन-निर्मित हवाई रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय और अवरुद्ध करते हुए दुश्मन के राडार, मिसाइल तंत्र और महत्वपूर्ण ठिकानों को ध्वस्त कर दिया।
आज के दौर में युद्ध का मतलब केवल आमने-सामने की लड़ाई नहीं रह गया है, ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल भारतीय सीमाओं की सुरक्षा को नई परिभाषा दी, बल्कि दुनिया को यह भी दिखाया कि अब युद्ध सूचना और तकनीक से जीते जाते हैं। साथ ही अंतरिक्ष तकनीक में भी भारत लगातार आगे बढ़ रहा है - मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान की तैयारियां जारी हैं। हाल ही में श्रीहरिकोटा में गगनयान मिशन के लिए विशेष रॉकेट प्रणाली का पहला परीक्षण सफल रहा, जिसे मिशन की अंतिम सफलता की दिशा में एक और अहम पड़ाव माना जा रहा है। कल के मिसाइलमैन का सपना आज ड्रोन, उपग्रह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के त्रिकोण में साकार होता दिख रहा है।
डॉ. अब्दुल कलाम का जीवन इस बात का प्रमाण था कि विज्ञान और अध्यात्म, अनुशासन और सपने साथ-साथ चल सकते हैं। ग्यारह वर्ष बाद भी उनकी सीख उतनी ही सजीव है, विज्ञान को केवल प्रयोगशाला की चारदीवारी में सीमित न रखकर हर गांव, हर छात्र और हर उद्यमी तक पहुंचाना। भारत ने विज़न 2020 के तय समय में हर लक्ष्य भले पूरा न किया हो, पर उस सोच के बीज ने ही आज के स्टार्टअप, स्वदेशी रक्षा तंत्र और अंतरिक्ष कार्यक्रम की ज़मीन तैयार की। आगे विकसित भारत 2047 का सफर तय करने के लिए यही रास्ता सबसे भरोसेमंद दिखता है, विज्ञान के प्रति जिज्ञासा, युवाओं पर भरोसा, और गांव से लेकर सीमा तक हर भारतीय को साथ लेकर चलने का संकल्प।
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