लोहा चोर ट्रांसपोर्ट कारोबारी इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ पर कसा शिकंजा...



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
रायपुर - छत्तीसगढ़, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■भिलाई इस्पात संयंत्र में कथित लोहा चोरी पर 40 साल बाद भी अनसुलझे सवाल

■राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा से लेकर पुलिस, संयंत्र प्रबंधन और प्रभावशाली लोगों की भूमिका तक उठ रहे प्रश्न

■मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार में कथित भ्रष्टाचार पर कार्रवाई को लेकर भी सवाल

■क्‍या इंद्रजीत सिंह ऊर्फ छोटू जैसे लोहा चोर लड़ेंगे विधायक का चुनाव?

लोहा चोर ट्रांसपोर्ट कारोबारी इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ पर जीएसटी का शिकंजा कसने के बाद अब राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। भिलाई इस्पात संयंत्र से लंबे समय से कथित रूप से हो रही लोहा चोरी को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल चोरी की घटनाओं तक सीमित नहीं हैं। मामला राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा, संयंत्र की आंतरिक व्यवस्था, परिवहन तंत्र, सुरक्षा व्यवस्था, कबाड़ की निकासी, खरीददार इकाइयों और पुलिस की कार्रवाई तक पहुंच गया है। दावा किया जा रहा है कि पिछले करीब 40 वर्षों में संयंत्र से लगभग 10 हजार करोड़ रुपये मूल्य का लोहा चोरी हो चुका है। इस दावे की वास्तविकता जांच का विषय है, लेकिन यदि इसमें तथ्य है तो यह अपने आप में अत्यंत गंभीर मामला है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतने लंबे समय तक राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाला कोई संगठित तंत्र सक्रिय रहा, तो उसकी पूरी श्रृंखला अब तक जांच के दायरे में क्यों नहीं आई? क्या पुलिस की जांच केवल चोरी के दौरान पकड़े गए छोटे आरोपियों और वाहनों तक सीमित रही या उन लोगों तक भी पहुंची, जिनके बारे में कथित तौर पर वर्षों से चर्चा होती रही है? सूत्रों का कहना है कि लोहा चोरी से प्राप्‍त रकम का 04 आईपीएस, 03 आईएएस और 12 राजनेताओं में बंटवारा होता है। इस पूरे मामले को लेकर डीजीपी अरुणदेव गौतम के समक्ष कई सवाल और जांच के बिंदु रखे गए हैं। मांग की गई है कि मामले को केवल एक सामान्य चोरी के प्रकरण के रूप में न देखते हुए इसकी पूरी आर्थिक और आपराधिक श्रृंखला की जांच की जाए। जीएसटी की जांच के बाद ईडी, ईओडब्‍ल्‍यू और सीबीआई जैसी संस्‍थाएं भी जांच करें तो और भी कई कारनामें सामने आ जायेंगे।

●कटी हुई गाड़ियों का रिकॉर्ड बने जांच की पहली कड़ी, कटघरे में होगा इंद्रजीत सिंह ऊर्फ छोटू

कथित लोहा चोरी में इस्तेमाल होने वाली 100 से अधिक गाड़ियों को रातों-रात काट दिए जाने का आरोप लगाया गया है। यदि ऐसा हुआ है तो परिवहन विभाग के अभिलेख इस पूरे मामले की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं। जिन वाहनों को काटा गया, उनके पंजीयन, स्वामित्व, फिटनेस, परमिट और अन्य विवरण निकाले जा सकते हैं। इसके बाद यह पता लगाया जा सकता है कि इन वाहनों के मालिक कौन थे, वे किन परिवहनकर्ताओं से जुड़े थे और वर्षों के दौरान इनका उपयोग किन कार्यों में हुआ। गौरतलब है कि इंद्रजीत सिंह ऊर्फ छोटू’ को भिलाई के प्रमुख ट्रांसपोर्ट कारोबारियों में गिना जाता है। वे हैवी ट्रांसपोर्ट कंपनी के डायरेक्टर हैं और कंपनी करीब 1,500 ट्रकों के संचालन से जुड़ी बताई जाती है।

●कबाड़ की निकासी और वजन व्यवस्था पर सवाल

संयंत्र से निकलने वाले कबाड़ और अन्य सामग्री की जांच तथा वजन की व्यवस्था भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए। आरोप है कि संयंत्र से बाहर जाने वाली सामग्री के वजन और निगरानी में गंभीर कमियां थीं। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि स्क्रैप की नीलामी और निकासी के समय वजन की क्या व्यवस्था थी, किस अधिकारी की जिम्मेदारी थी और सुरक्षा जांच किस स्तर पर होती थी।

●परिवहन यूनियन और आर्थिक लेन-देन की जांच जरूरी

मामले में परिवहन यूनियन की गतिविधियों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि यूनियन के माध्यम से हर महीने बड़ी राशि की वसूली होती है और इस धन के बंटवारे को लेकर भी सवाल हैं। यदि ऐसा कोई आर्थिक तंत्र मौजूद है तो उसके बैंक खातों, लेन-देन, लेखा दस्तावेजों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच की जा सकती है।

●राजनीतिक संरक्षण के आरोपों की भी जांच हो

मामले को लेकर यह आरोप भी लगाया गया है कि कथित रूप से चोरी से अर्जित धन का इस्तेमाल राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बढ़ाने में किया जाता रहा है। कुछ लोगों पर समाजसेवा की आड़ में बड़ी मात्रा में धन खर्च करने के आरोप लगाए गए हैं। यदि किसी व्यक्ति की आय और संपत्ति में असामान्य अंतर दिखाई देता है तो आय के स्रोत की वैधानिक जांच संबंधित एजेंसियां कर सकती हैं।

●राजनीतिक गिरफ्तारी के आरोपों ने बढ़ाई बहस

एक भाजपा मंडल के कोषाध्यक्ष की गिरफ्तारी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि संबंधित व्यक्ति वैध कर बिल के साथ माल खरीदता था, फिर भी उसके विरुद्ध कार्रवाई की गई और मामले को राजनीतिक रंग दिया गया। इस मामले में वास्तविकता जांच के बाद ही सामने आ सकती है। यदि पुलिस के पास पर्याप्त साक्ष्य हैं तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर कार्रवाई हुई है तो यह भी गंभीर विषय होगा।

●भ्रष्ट अधिकारी पर कार्रवाई कब?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई और सुशासन का दावा करती रही है। ऐसे में यदि भिलाई इस्पात संयंत्र से राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों में किसी अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई में देरी क्यों होनी चाहिए? यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध शिकायतें हैं और जांच में प्रथमदृष्टया तथ्य सामने आते हैं तो सरकार को निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

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