खाद्य मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के विभाग में राशन का खेल



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■गरीब का राशन, मिलों की मौज, राजपूत के विभाग पर गंभीर सवाल

■राशन में घोटाले के आरोपों से घिरे मंत्री राजपूत

■गोविंद सिंह राजपूत के गढ़ में राशन का खेल, घटिया अनाज ने खोली व्यवस्था की पोल

■राशन दुकानों की गड़बड़ियां उठाती हैं व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल, करोड़ों हितग्राहियों के हक पर कौन डाल रहा है डाका?

मध्यप्रदेश में गरीब और जरूरतमंद परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने वाली सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में राशन की दुकानों से जुड़ी कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने के बाद व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी पर सवाल खड़े हो रहे हैं। कहीं घटिया गुणवत्ता का अनाज दिए जाने की बात सामने आ रही है तो कहीं खाद्यान्न में मिलावट की शिकायतें बताई जा रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस राशन की एक-एक बोरी गरीब परिवारों के लिए राहत का आधार होनी चाहिए, वह आखिर रास्ते में ही गुणवत्ता और वितरण की कसौटी पर कैसे कमजोर पड़ रही है? यदि किसी दुकान पर घटिया अनाज पहुंचता है, यदि खाद्यान्न की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं है अथवा यदि अच्छे और खराब अनाज की अदला-बदली की जाती है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है। विभागीय मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की उपयोगिता पर भी प्रश्‍नचिंह हैं। प्रदेश के कई हिस्सों से सामने आ रही शिकायतों ने इस पूरी व्यवस्था की निगरानी को कठघरे में खड़ा किया है। सवाल यह है कि राशन गोदाम से लेकर परिवहन और फिर उचित मूल्य की दुकान तक पहुंचने के दौरान खाद्यान्न की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर होती है? यदि अनाज खराब है तो उसे राशन दुकानों तक पहुंचने की अनुमति किसने दी? और यदि दुकान संचालक स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो संबंधित विभागीय मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और विभागीय अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?

●मंत्री राजपूत की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल

मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के संरक्षण में राशन का फर्जीवाड़ा चलने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इस तरह के गंभीर आरोपों की पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच के बिना नहीं की जा सकती। ऐसे में सरकार के सामने सबसे उचित रास्ता यही है कि आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी मानकर खारिज करने के बजाय पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से स्थिति साफ हो जाएगी और यदि गड़बड़ी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई का रास्ता खुलेगा। मंत्री के विधानसभा क्षेत्र से भी कथित अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने का दावा किया जा रहा है। यदि ऐसा है तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि संबंधित क्षेत्र की राशन दुकानों, गोदामों और खाद्यान्न की आपूर्ति व्यवस्था का स्वतंत्र निरीक्षण कराया जाए।

●विपक्ष और सरकार दोनों की परीक्षा

राशन व्यवस्था का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है। विपक्ष के लिए यह सरकार को घेरने का मुद्दा हो सकता है, जबकि सरकार के लिए अपनी व्यवस्था की पारदर्शिता साबित करने की चुनौती। लेकिन इस पूरे विवाद का केंद्र राजनीति नहीं बल्कि गरीब परिवार का अधिकार होना चाहिए। सरकार को आरोपों का जवाब केवल बयान जारी करके नहीं, बल्कि जांच और कार्रवाई के जरिए देना चाहिए। यदि गड़बड़ी नहीं है तो जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं। यदि गड़बड़ी है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो। इसी से जनता का विश्वास कायम होगा।

●सवाल अभी बाकी हैं

मध्यप्रदेश की राशन व्यवस्था से जुड़े मौजूदा आरोप कई महत्वपूर्ण सवाल छोड़ते हैं। क्या राशन दुकानों तक पहुंचने वाले अनाज की नियमित गुणवत्ता जांच हो रही है? क्या गोदाम से निकलने वाले और हितग्राही को मिलने वाले अनाज की गुणवत्ता समान है? क्या शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई होती है? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है? इन सवालों के जवाब केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देने चाहिए। गरीबों के नाम पर चलने वाली किसी भी योजना में भ्रष्टाचार अथवा अनियमितता की गुंजाइश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का उद्देश्य गरीब की थाली तक सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण भोजन पहुंचाना है। यदि इसी रास्ते में कहीं खाद्यान्न की गुणवत्ता से समझौता हो रहा है, तो सरकार को इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तत्काल जांच करनी चाहिए। आखिर जिस अनाज पर किसी गरीब परिवार की रसोई निर्भर है, उसकी गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है। गरीब के हिस्से का राशन अगर रास्ते में ही कमजोर पड़ गया, तो सवाल सिर्फ अनाज का नहीं, पूरी व्यवस्था की नीयत और निगरानी का बन जाता है।

●गरीब की थाली से खिलवाड़ का असर

राशन की गुणवत्ता में गड़बड़ी का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से कमजोर है। जिन परिवारों के लिए सरकारी राशन उनके घरेलू बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा है, वे खराब अनाज मिलने पर उसे स्वीकार करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में गुणवत्ता से समझौता किसी सामान्य प्रशासनिक शिकायत की तरह नहीं देखा जा सकता। गरीब परिवारों को मिलने वाला खाद्यान्न यदि घटिया है, तो इसका असर उनके भोजन की गुणवत्ता पर पड़ता है। वहीं यदि मात्रा में कटौती अथवा मिलावट होती है तो सीमित संसाधनों में घर चलाने वाले परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।

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