--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।
■बड़ा सवाल: क्या मुख्यमंत्री के कहने पर हुआ महापौर का अपमान?
■मुख्यमंत्री की बहिन कलावती के कारण हाशिए पर हैं टटवाल
■क्या दलित समाज से हैं टटवाल, इसलिए हो रहे अपमानित?
■रथ से उतारे जाने से लेकर महाकाल विवाद तक: क्या उज्जैन महापौर और सत्ता के बीच बढ़ रही है दूरी?
पिछले दिनों उज्जैन में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का आगमन हुआ था। इसी दौरान नितिन नबीन के रोड शो के दौरान उज्जैन महापौर मुकेश टटवाल को रथ से नीचे उतार दिया गया। वे विधायक अनिल जैन कालूहेड़ा के साथ रथ पर चढ़े, लेकिन कुछ देर बाद उन्हें नीचे उतरने के लिए कहा गया। रथ पर मुख्यमंत्री मोहन यादव सहित कई बीजेपी के नेता सवार थे। यह विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कहने पर मुकेश टटवाल को रथ से नीचे उतारा गया था। दरअसल पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि मुख्यमंत्री और महापौर के बीच 36 का आंकड़ा है। इसके पीछे मुख्यमंत्री की बहिन कलावती यादव हैं। कलावती नगर पालिका अध्यक्ष हैं और नगरनिगम में पूरी तरह से दखलअंदाजी करती हैं। हैं। कलावती के कारण ही शुरूआत से ही महापौर केवल नाम के महापौर हैं। इन्होंने शुरू से ही महापौर मुकेश टटवाल को काम नहीं करने दिया। कोई अधिकारी मुकेश टटवाल की नहीं सुनता। नगर पालिका के मामले में हर विषय पर कलावती यादव ही निर्णय करती हैं क्योंकि मुकेश टटवाल थोड़े सीधे आदमी हैं। इसलिए विद्रोह नहीं कर पा रहे थे। लेकिन इस बार उनका अपमान कुछ ज्यादा ही हो गया है। इसलिए उन्होंने डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के प्रतिमां के समीप धरना देने का निर्णय लिया है। करीब डेढ़ वर्ष पूर्व राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू उज्जैन आई थी। कार्यक्रम नगर पालिका निगम का था। सफाई कर्मियों का सम्मान था। उस समय भी मंच पर मुकेश टटवाल को नहीं बिठाया गया था और उन्होंने मंच के सामने तीसरी रो में बैठना पड़ा था। वहीं जनवरी 2026 में महापौर टटवाल ने महाकाल मंदिर में स्थानीय श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था को लेकर प्रशासन को पत्र लिखा था। इसके बाद उन्होंने आरोप लगाया कि उनके महापौर कोटे से मिलने वाली भस्म आरती की अनुमतियां रोक दी गईं। बाद में हस्तक्षेप के बाद अनुमति बहाल होने की बात सामने आई।
●नगर का प्रथम नागरिक होता है महापौर, इस तरह का अपमान नगरवासियों का अपमान है
महापौर नगर का प्रथम नागरिक होता है। इस तरह का अपमान नगरवासियों का अपमान है। प्रोटोकाल के अनुसार भी महापौर का पहला स्थान होता है। टटवाल का कहना है कि भाजपा के जिला प्रभारी बजरंग पुरोहित और कार्यक्रम प्रभारी जयपाल सिंह चावड़ा के कहने पर वे रथ पर सवार हुए थे, लेकिन कुछ देर बाद उन्हें नीचे उतरने को कहा गया। मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल प्रोटोकॉल सूची का है। रिपोर्टों के अनुसार हेलीपैड से रथ पर सवार होने वाले नेताओं की सूची में महापौर का नाम नहीं था, जबकि क्षिप्रा तट पर बनाए गए मुख्य मंच की सूची में उनका नाम शामिल था। इस वजह से यह सवाल उठ रहा है कि अगर रथ की सूची में उनका नाम नहीं था तो उन्हें रथ पर चढ़ने की अनुमति किस स्तर पर मिली? दूसरी ओर, महापौर का कहना है कि वे खुद से रथ पर नहीं चढ़े थे, बल्कि पार्टी पदाधिकारियों के कहने पर रथ में गए थे। यही बिंदु पूरे विवाद को केवल प्रोटोकॉल की गलती मानने से पहले जांचने योग्य बनाता है।
●महापौर ने क्या कदम उठाया?
घटना के बाद टटवाल ने 20 सितंबर को डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के पास बैठकर विरोध/प्रार्थना करने की घोषणा की थी। बैरवा समाज की बैठक में भी मामले पर नाराजगी जताई थी। लेकिन मुख्यमंत्री को जब विरोध की बात पता चली तो उन्होंने मुख्यमंत्री द्वारा इस घटना का संज्ञान लेकर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने और वरिष्ठ नेताओं की समझाइश के बाद महापौर ने विरोध प्रदर्शन को स्थगित कर दिया। मतलब मुख्यमंत्री ने अपमानित भी कर दिया और धरने पर भी नहीं बैठने नहीं दिया।
●क्या दलित समाज से हैं महापौर, इसलिए हो रहे अपमानित
मुकेश टटवाल अनुसूचित जाति के महापौर हैं। मुकेश टटवाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की बहन कलावती यादव से परेशान हैं, जो पिछले छह बार से पार्षद बनती चली जा रही है लेकिन वह हमेशा अलग-अलग वार्डो से लड़ती है। एक ही वार्ड से नहीं लड़ती है। इस बार मोहन यादव ने परिवारवाद के तमाम आरोपों को दरकिनार करते हुए पार्षदों की इच्छा के विरुद्ध उज्जैन के अन्य नेताओं की इच्छा के विरुद्ध जाकर बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष पर दबाव डालकर अपनी बहन को नगर पालिका अध्यक्ष बनवाया। कलावती यादव 2003 के पहले ब्यूटी पार्लर चलाती थी। उनके पति मिल में मजदूरी करते थे, जो कि अब शांत हो गए हैं। कलावती यादव नि:संतान हैं। इसी कारण मोहन यादव ने बहुत सारी संपत्ति उनके नाम खरीद रखी हैं। यद्यपि उनके आय का कोई स्पष्ट जरिया नहीं है। उनके नाम पर करीब-करीब 300 करोड़ की संपत्ति है। यह अस्पताल में भी भागीदार हैं और अभी 400 कमरों की एक होटल बन रही है वह इन्हीं के नाम से है।
●अब उठ रहे हैं ये सवाल
· महापौर को रथ पर चढ़ने के लिए किसने कहा?
· अगर उनका नाम रथ की सूची में नहीं था, तो उन्हें चढ़ने की अनुमति कैसे मिली?
· कुछ देर बाद उन्हें नीचे उतारने का निर्देश किसने दिया?
· क्या यह महज प्रोटोकॉल की चूक थी या आयोजन में समन्वय की कमी?
https://www.indiainside.org/post.php?id=10634