चुनाव आयोग: लोकतंत्र हारेगा या जीतेगा?



--के• विश्वदेव राव
महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

लोकतंत्र केवल संविधान के पृष्ठों पर उकेरी गई पंक्तियों का नाम नहीं है। यह संस्थाओं के भीतर बहने वाली जीवंत साँसों और उनके प्रति जन-सामान्य के अटूट विश्वास का सजीव ताना-बाना है। बीते कुछ हफ़्तों में निर्वाचन आयोग को लेकर जो शोर मचा है, वह इसी भरोसे पर चोट पहुचाता है। एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से यह ख़बर आयी कि, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी के बीच पिछले दस महीनों में चौदह बार दर्ज हुई आपत्तियाँ किसी गहरे संस्थागत संकट का संकेत हैं। फिर सुनने में आया आयोग का जवाब, आयोग ने स्वयं आगे आकर बेहद स्पष्ट सफ़ाई दी और कहा, यह एक आंतरिक चर्चा और मतभेद के बाद लिए गए अंतिम निर्णय थे, इनको जोड़कर देखना ही गलत है। विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े सभी बड़े आदेश सर्वसम्मति से पारित हुए, फ़ॉर्म-6 में कोई मौलिक बदलाव नहीं हुआ बल्कि उसके साथ केवल एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया था। कैबिनेट सचिव से हुआ पत्राचार नीति या आईटी का मसला नहीं बल्कि एक अधिकारी की प्रतिनियुक्ति जैसा सामान्य प्रशासनिक विषय था। ईसीआई नेट, क्षेत्रीय अधिकारियों की भूमिका-आधारित शक्तियाँ पूरी तरह बरकरार रखता है, और 2025 से अब तक करीब पौने तीन करोड़ नए युवा मतदाता जोड़े जा चुके हैं। इतना ही नहीं, आंतरिक असहमति की चर्चाओं के बीच भी तीनों आयुक्त बीते महीनों की हर प्रमुख चुनावी ब्रीफिंग में साथ-साथ मंच पर मौजूद रहे।

अब ये किसी बिखरती संस्था की तस्वीर तो नहीं लगती। यह तो विचार-विमर्श और अंतर्विरोध के बाद भी एकजुट रहने वाली एक परिपक्व संस्था की तस्वीर दिखती है।

हम सबको एक कड़वा सच स्वीकार करना आवश्यक है, जिसे विपक्ष अक्सर भुला देता है। आज़ादी के बाद से चुनाव आयोग को अपने हिसाब से ढालने की सबसे पुरानी और सबसे सुनियोजित कोशिशें कांग्रेस के शासनकाल में ही हुईं। 1989 में राजीव गांधी सरकार ने तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त आर.वी.एस. पेरी शास्त्री को चुनाव-तारीखों और उपचुनावों पर मनचाहे फैसले न देने की सज़ा के तौर पर आयोग को अचानक तीन-सदस्यीय बना दिया था। नवनियुक्त आयुक्तों में से एक एस०एस० धनोआ ने बाद में खुद लिखा कि इसके बदले उन्हें सरकार में पद का आश्वासन दिया गया था। कांग्रेस वह चुनाव हार गई, और अगली वी०पी० सिंह सरकार ने 1990 में आयोग को फिर एकल-सदस्यीय कर दिया।

कुछ वर्षों बाद, जब टी.एन. शेषन के चुनाव आयोग ने आयोग को दाँतवाला बना दिया था, तब उसका सामना नरसिंह राव सरकार के हितों से हो गया, तो 1 अक्टूबर 1993 को कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रपति के अध्यादेश के ज़रिए आयोग को फिर तीन-सदस्यीय बनाव दिया। शेषन इसे सुप्रीम कोर्ट तक ले गए, 1995 में अदालत ने तीनों सदस्यों को बराबर अधिकार तो दिए, पर मूल राजनीतिक मंशा इतिहास में दर्ज हो चुकी थी। 2009 में तो हद हो गई, खुद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन० गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को 93 पन्नों की रिपोर्ट भेजकर आयुक्त नवीन चावला को कांग्रेस के प्रति पक्षपाती बताते हुए हटाने की सिफ़ारिश की, जिसमें बैठकों के बीच गोपनीय जानकारी लीक करने तक के आरोप थे। कांग्रेस – यू०पी०ए० सरकार ने इस सिफ़ारिश को मानने के बजाय वरिष्ठता के आधार पर उन्हीं चावला को अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिया।

भारत के स्वतंत्र इतिहास में हुई सबसे बड़ी घटना तो 1975 का आपातकाल था। आपातकाल में तो संस्थाओं की गरिमा को तार-तार ही कर दिया गया था। उस समय तो, जब भी चुनाव आयोग असुविधाजनक होता था तो, कांग्रेस ने अध्यादेश और अनौपचारिक दबाव का सहारा लिया था।

आज जब सर्वसम्मति से लिए गए निर्णयों पर भी आंतरिक सवाल उठें, तो यह किसी षड्यंत्र का नहीं बल्कि एक जीवंत, बहस-प्रिय संस्था के भीतर सामान्य निर्णय-प्रक्रिया का प्रमाण दीखता है। जिसे सुलझाने में आयोग ने पारदर्शिता दिखाई, लुकाछिपी नहीं की है। प्रचारित रपटो के अनुसार चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने निर्णय प्रक्रिया, मतदाता-सूची के डेटाबेस तक पहुँच और पश्चिम बंगाल में दायर कुछ अपीलों को लेकर सवाल उठाए थे। पर आयोग ने इन सभी बिंदुओं पर एक-एक कर तथ्यों के साथ जवाब दिया था।

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में करोड़ों मतदाताओं के नाम सत्यापन के दायरे में आए, और देशभर में विपक्ष करीब तेरह करोड़ नाम हटाए जाने का दावा कर रहा है। यहाँ मूल तथ्य समझना ज़रूरी है। फर्जी मतदाताओं, मृत व्यक्तियों और डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना किसी स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियादी ज़रूरत है, और सुप्रीम कोर्ट पहले ही एस०आई०आर० की प्रक्रिया को संवैधानिक रूप से वैध ठहरा चुका है।

इस प्रक्रिया की आँच सत्ता-शिखर और आलोचकों तक समान रूप से पहुँची, जो इसकी निष्पक्षता का सबसे बड़ा प्रमाण है। लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, सीबीआई निदेशक और स्वयं चुनाव आयुक्त संधू तक के नामों का सत्यापन होना पड़ा। अब इससे तो यही स्पष्ट दिखाता है कि व्यवस्था को "एकतरफा" या "कठपुतली" ठहराना सरासर राजनीतिक दुष्प्रचार है।

विपक्ष के लिए आयोग की आंतरिक बहस एक मनभावन बहाना बनकर आई। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे से लेकर पूरी कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त को "कठपुतली" घोषित करने में देर नहीं लगाई। पंचतंत्र की उस लोमड़ी की याद आती है, जो अंगूर न पाने पर उन्हें खट्टा करार देती थी। विपक्ष अपनी संगठनात्मक विफलताओं का दोष लगातार संस्थाओं पर मढ़ने की पुरानी परंपरा निभा रहा है। इन सब से एक बात समझ में आई कि, यह आरोपों की भाषा है, सुबूत की नहीं।

यह अकारण नहीं कि दुनिया आज भारत के चुनाव आयोग को गंभीरता से देखती है। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारित मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति) अधिनियम, 2023 ने वर्षों से अस्पष्ट रही नियुक्ति-प्रक्रिया को पहली बार एक क़ानूनी ढाँचे में बाँधा था। इसी नए तंत्र के तहत बनी समिति की बैठक प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में हुई, जिसमें नेता प्रतिपक्ष भी शामिल थे। नतीजा सामने है - नए मतदाताओं के जुड़ने और मतदान की पुरानी रिकॉर्ड-संख्याएँ टूटने के बीच, इसी साल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र एवं निर्वाचन सहायता संस्थान (अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए) के अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई। यह किसी "हाईजैक" हुई संस्था का नहीं, भारत के चुनाव तंत्र पर बढ़ते वैश्विक भरोसे का प्रमाण है।

असहमति तो लोकतंत्र की धड़कन होती है। अगर आप सहमत हैं तो आप अनुयायी बन जाते हैं। असली ख़तरा तब पैदा होता है जब बिना सुबूत के आरोपों की झड़ी लगाकर एक कार्यशील, जवाबदेह और पारदर्शी संस्था की साख को बार-बार नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है। भारत का चुनाव आयोग आज जिस तरह हर आरोप का तथ्यों से जवाब दे रहा है, वह बताता है कि लोकतंत्र हारेगा नहीं - जीतेगा, और उसकी सबसे मज़बूत गवाही खुद यह संस्था है।

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