अब सिंधिया के गढ़ में ही उठ रही उनके विरोध की चिंगारी



--विजया पाठक
एडिटर - जगत विजन
भोपाल - मध्यप्रदेश, इंडिया इनसाइड न्यूज।

■ग्वालियर में काले झंडों ने खोली सिंधिया की सियासत की पोल

■22 विधायकों के साथ कमलनाथ सरकार गिराई, सत्ता मिली लेकिन क्या सिंधिया ने खो दी अपनी पुरानी सियासी पकड़?

■सत्‍ता के लिए सिंधिया करते हैं दोगली राजनीति

■गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी और प्रदुम्य सिंह तोमर जैसे नेताओं के दम पर चमकाते हैं राजनीति

■इतिहास गवाह है सिंधिया राजघराने ने की है देश के साथ गद्दारी

ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति का एक ही मकसद है- सत्‍ता का सुख भोगना। सिंधिया को जनसेवा या जनकल्‍याण से कोई वास्‍ता नहीं है। यहीं कारण है कि वह केवल सत्‍तासीन पार्टी से जुड़कर रहना चाहते हैं। कमलनाथ सरकार के दौरान भी सिंधिया ने यही किया था। अपने पिछलग्‍गू गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी और प्रदुम्‍य सिंह तोमर जैसे नेताओं के बल पर अपनी राजनीति सेंकते रहते हैं। सिंधिया की राजनीति में एक दौर ऐसा रहा है जब ग्वालियर-चंबल की सियासत में उनका नाम ही काफी माना जाता था। राजघराने की विरासत, कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में पहचान और ग्वालियर-चंबल में मजबूत व्यक्तिगत नेटवर्क- इन सबने मिलकर सिंधिया को मध्यप्रदेश के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल किया। लेकिन राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसी नेता का अतीत कितना मजबूत रहा है। सवाल यह होता है कि आज जमीन पर उसकी पकड़ कैसी है? यही सवाल इन दिनों सिंधिया के सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। ग्वालियर में उनके कार्यक्रम के दौरान काले झंडे दिखाए गए। विरोध के बाद कार्यक्रम स्थल पर समर्थकों और प्रदर्शनकारियों के बीच हाथापाई की स्थिति बनी। घटना कुशवाहा समाज के छात्रावास एवं सामुदायिक भवन के भूमिपूजन कार्यक्रम के दौरान हुई। इसी दौर में गुना से उनके तेवर वाले वीडियो सामने आते हैं, स्थानीय स्तर पर राजनीतिक विरोध के आरोप लगते हैं और ग्वालियर में भाजपा के अंदर ही गुटीय खींचतान की चर्चा तेज होती है, तब सवाल बड़ा हो जाता है।

●गुना में ‘नो रोड, नो वोट’ ने बदल दिया संवाद का रंग

ग्वालियर की घटना के कुछ ही दिनों पहले गुना से एक और वीडियो चर्चा में आया। एक स्थानीय युवक ने सड़क की समस्या को लेकर सिंधिया से कहा कि सड़क नहीं बनी तो लोग वोट नहीं देंगे। जवाब में सिंधिया ने युवक से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न करने को कहा। इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। राजनीति में जनता और नेता के बीच संवाद का स्वर बहुत मायने रखता है। एक तरफ जनता अपने इलाके की सड़क, पानी, बिजली, रोजगार जैसी समस्याएं लेकर नेता के सामने आती है। दूसरी तरफ नेता के सामने सवाल होता है कि वह इन शिकायतों को किस तरह लेता है। गुना का यह वीडियो इसलिए चर्चा में आया क्योंकि इसमें जनता और नेता के बीच उस पुराने राजनीतिक संवाद की झलक दिखाई दी, जिसमें अब जनता सीधे सवाल पूछ रही है। दूसरी तरफ अधिकारियों को लेकर सख्त तेवर। इन घटनाओं ने सिंधिया की राजनीतिक शैली को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

●ममता मीणा के आरोपों ने विवाद को और राजनीतिक बनाया

इसी बीच ममता मीणा ने सिंधिया पर राजनीतिक दबाव बनाने के आरोप लगाए हैं और ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में अपनी बात जनता तक ले जाने की बात कही है। ये आरोप राजनीतिक विवाद के संदर्भ में लगाए गए हैं और इन्हें आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन राजनीति में आरोप भी तब महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब वे किसी ऐसे इलाके से आते हैं जहां पहले से ही राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा चल रही हो। ग्वालियर-चंबल में भाजपा के भीतर कई स्थानीय चेहरे अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करना चाहते हैं।

●ग्वालियर की राजनीति में कौन किसके साथ है?

किस नेता का प्रभाव कितना है? किसकी बात संगठन में सुनी जा रही है? किस नेता के समर्थक खुद को राजनीतिक रूप से मजबूत मानते हैं? और सबसे बड़ा सवाल- क्या सिंधिया की मौजूदगी अब भी ग्वालियर की पूरी राजनीति को अपने प्रभाव में समेट पाने की स्थिति में है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय की राजनीति में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। जिस ग्वालियर में ‘महाराज’ का प्रभाव था, वहीं अब टकराव क्यों?

●महाराज से ‘भाई साहब’ तक का सफर

‘महाराज’ की छवि उनके समर्थकों और ग्वालियर-चंबल की राजनीति में लंबे समय तक एक पहचान रही है। लेकिन भाजपा की संगठनात्मक राजनीति व्यक्तिगत राजघराने की छवि से अलग ढांचे पर चलती है। 2020 में सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा। उनके साथ 22 विधायक भी भाजपा में आए और कमलनाथ सरकार गिर गई। इसके बाद मध्य प्रदेश में सत्ता का समीकरण बदल गया। आज कमलनाथ की सरकार होती तो प्रदेश में स्थिति अलग होती। यही वह जगह है जहां ‘महाराज’ और ‘भाई साहब’ की राजनीति का फर्क दिखाई देता है।

●1857 से 2020 तक- सिंधिया नाम के साथ जुड़ी राजनीतिक बहस

सिंधिया परिवार का राजनीतिक इतिहास जितना लंबा है, उसके साथ जुड़ी राजनीतिक बहस भी उतनी ही पुरानी है। 1967 में विजयाराजे सिंधिया का कांग्रेस से अलग होकर जनसंघ की राजनीति से जुड़ना भी प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। फिर 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़ना और उनके समर्थक विधायकों का भाजपा में जाना। यानी सिंधिया परिवार की राजनीति में पार्टी बदलने और सत्ता के समीकरण बदलने की चर्चा बार-बार लौटती रही है। 1857 की क्रांति में भी इस राजघराने ने देश के साथ गद्दारी की थी। आजादी का यह वह दौर था जब पूरा देश आजादी की लड़ाई में साथ खड़ा था लेकिन सिंधिया राजघराना अंग्रेजों के साथ खड़ा हो गया और रानी लक्ष्‍मीबाई को हार का सामना करना पड़ा।

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