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दलील से पहले फ़ॉन्ट सुधारिए



--के. विश्वदेव राव, महासचिव - इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स।

हम जो पढ़ते हैं, वह सिर्फ़ वही नहीं होता जो लिखा गया है। वह इससे भी तय होता है कि कैसे छपा है। यह बात अख़बारों ने सौ बरस पहले समझ ली थी। अब, उपलब्ध समाचारों के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय और उसकी लखनऊ पीठ भी इसे अपने ढंग से स्वीकार कर रही हैं। यह आदेश इशारा करता है कि एक विशेष फॉन्ट में मुद्रित दलील कोई निर्दोष औज़ार नहीं, वह उस विश्वास का पहला दरवाज़ा है, जो कानूनी प्रक्रिया को रेखांकित करता है। फ़ाइलों के पहाड़ में धँसा न्यायाधीश हो या सुबह की चाय के साथ अख़बार पढ़ने वाला नागरिक, उसे पठनीय मसौदे से पहले कागज़ पर उकेरे अक्षरों को सुगमता से पढ़ने की सहूलियत चाहिये।

पहले ख़बर। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में शिव किंकर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य के मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अजीत कुमार एवं न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद ने आदेश दिया कि 12 नवंबर 2026 से अंग्रेज़ी में दाख़िल हर याचिका, शपथ-पत्र, प्रति-शपथ-पत्र और अपील “टाइम्स न्यू रोमन” में, चौदह पॉइंट के आकार में और दोहरी पंक्ति-दूरी के साथ होंगी। मोटे अक्षर केवल संलग्नकों और सूची के लिए रहेंगे, तिरछे अक्षर केवल उद्धरण या अदालत और अधिनियम के नाम के लिए। प्रार्थना-खंड तिरछा हो ही नहीं सकेगा।

इस आदेश को घरेलू व्यवस्था की भाषा में लिखा गया है, यानी काग़ज़ चाहे भौतिक रूप में आए या इलेक्ट्रॉनिक, अभिलेख एक-सा दिखे। पर गौर करने की बात है कि अदालत का अपना पिछला निर्देश कुछ और था: आकार बारह, अक्षर “एरियल” फॉन्ट में। यानी यह आदेश अपनी ही पुरानी भूल का मौन स्वीकार भी है।

●अब सवाल यह है कि अदालत को यह बात इतनी देर से क्यों सूझी, और अख़बारों को पहले क्यों?

शायद इसलिए कि अख़बार का पाठक नाराज़ हो तो पन्ना पलट देता है, जबकि अदालत में मजबूरी है कि हर अक्षर उसे पढ़ना ही पड़ेगा। जिससे वो भाग नहीं सकता, उसकी थकान का हिसाब कोई नहीं रखता।

टाइम्स न्यू रोमन फॉन्ट की जड़ें अख़बार से ही उपजी हैं। 1932 में लंदन के “द टाइम्स” ने इसे दो इंच चौड़े संकरे स्तंभों और सस्ते, स्याही सोखने वाले न्यूज़प्रिंट के लिए अपनाया था। दो इंच में यह अक्षर चमकता है, छह इंच में बुझने लगता है। तंग गली के सिपाही को चौड़े क़ानूनी काग़ज़ के मैदान में उतारना वैसा ही है जैसे शहर के रिक्शे को राजपथ पर दौड़ा देना। इसी वजह से अमेरिका के सातवें सर्किट की मार्गदर्शिका के हवाले से कहा जाता है कि पेशेवर टाइपोग्राफ़र लंबे दस्तावेज़ों में इससे बचते हैं, और वहाँ का सर्वोच्च न्यायालय अपने नियमों में “सेंचुरी” परिवार के फॉन्ट माँगता है।

●फिर हमारी अदालत उसी की ओर क्यों जा रही है जिससे वे लोग दूर जा चुके हैं?

क्योंकि यहाँ प्रश्न सुंदरता का नहीं, एकरूपता का है। यह फॉन्ट लगभग हर कंप्यूटर में पहले से मौजूद होता हैं, और जहाँ नहीं है, वहाँ मिलते-जुलते विकल्प चल जाते हैं। झाँसी की कचहरी में बना मसौदा और लखनऊ के किसी कॉरपोरेट दफ़्तर का मसौदा एक-सा दिखेगा। हज़ारों फ़ाइलें निपटाने वाली रजिस्ट्री के लिए यह सुविधा किसी भी अक्षर-सौंदर्य से भारी है। यह तर्क हल्का नहीं है, पर इसकी क़ीमत कौन चुकाएगा, यह देखना भी ज़रूरी है।

यथार्थ यह है कि आदेश आधी राह पर ठहरा हुआ लगता है। चौदह पॉइंट और दोहरी पंक्ति में सामान्य याचिका भी फूलकर मोटी हो जाएगी: ज़्यादा पन्ने, ज़्यादा फ़ोटोकॉपी, ज़्यादा जिल्द। फ़ॉन्ट पर अनुशासन हो और लंबाई खुली छूट पर, तो एक हाथ से आँख को राहत मिलती है और दूसरे हाथ से जेब पर भारी लगती है। अमेरिकी अपीली नियम इसीलिए फॉन्ट के साथ शब्द-सीमा भी बाँधते हैं, ताकि टाइपोग्राफ़ी के सहारे लंबाई चुपके से न घुसे। इलाहाबाद न्यायालय के आदेश को भी फ़ॉन्ट के साथ उचित शब्द-सीमा और पृष्ठ-सीमा तय करनी चाहिए, ताकि कागज़ की बर्बादी रुके और पढ़ने वाले की आँख और धैर्य दोनों बचें।

हिंदी में दाख़िल किये जाने वाले मसौदे का प्रश्न और भी बड़ा है। आदेश के अनुसार देवनागरी के लिए कोई भी यूनिकोड अक्षर इस्तेमाल किया जा सकता है। पर देवनागरी के अक्षर मोटाई और ऊँचाई में एक-दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। जिस एकरूपता की बात आदेश करता है, वह यहीं सबसे पहले डगमगाएगी। बेहतर होगा कि हिंदी के लिए भी कोई स्पष्ट फॉन्ट और निश्चित आकार तय हो। “मंगल” या “अपराजिता” जैसे सर्वसुलभ अक्षर इस पर विचार का आरंभ-बिंदु हो सकते हैं, हालाँकि अंतिम चुनाव अदालत और विशेषज्ञों का काम है। और चूँकि अनुपालन की जाँच स्कैनिंग-शाखा में होगी, एक ग़लत पंक्ति-दूरी का अर्थ है लौटाई हुई याचिका, टला हुआ अंतरिम संरक्षण और किसी वकील की शाम जिल्द-बंदी की भेंट। यह मार सबसे ज़्यादा उन पर पड़ेगी जो ख़ुद अपनी पैरवी करते हैं, या जिनके दफ़्तर में परिपत्र पढ़ने वाला कोई मुंशी नहीं। इसलिए 12 नवंबर तक अनुपालन चाहने वाली अदालत को निर्देश के साथ एक नमूना पृष्ठ, फ़ाइलिंग-काउंटर पर जाँच-सूची और आपत्तियाँ शुरू होने से पहले थोड़ी रियायत भी देनी चाहिए।

फिर भी एक बड़ी बात मान ली गई है। अदालत ने स्वीकार किया कि पन्ने की बनावट इस बात में शामिल है कि दलील कैसे ग्रहण की जाती है। मोटे, रेखांकित और तिरछे अक्षरों का जंगल वैसा ही है जैसे कोई कचहरी में चीख़कर बोले। स्वर जितना ऊँचा, विश्वास उतना कमज़ोर। जब सब कुछ ज़ोर देकर कहा जाए, तो कुछ भी ज़ोरदार नहीं रह जाता। अख़बार जानता है कि शीर्षक का फॉन्ट संपादक की आवाज़ है, और उसे अगर बदल दिया तो ख़बर की गंभीरता बदल जाती है। अदालत अब यह जान रही है कि वकील का मसौदा उसकी पहली दलील है, चाहे वकील यह माने या न माने। शब्दों को लिख कर सम्पादित करना फिर प्रिंट प्रस्तुत करना वकालत की वह आख़िरी मंज़िल है जिसके बारे में अधिकतर वकील दिन रात चिराग जलाते हैं। और अंततः न्यायाधीश महोदय उस भारी भरकम जिरह जो एक पहेली होती है, उसे सुलझा कर अपना न्यायसंगत आदेश पारित करते हैं।

●तो अंत में प्रश्न यही है। अगर अदालतें मानती हैं कि पन्ने की बनावट न्याय की पहली सीढ़ी है, तो क्या वे इसे फ़ॉन्ट के आदेश पर ही छोड़ देंगी, या उसके साथ लंबाई की मर्यादा, हिंदी का सम्मान और साधन-हीन वादी की सुविधा भी तय करेंगी?

न्यायालय ने न्याय तक पहुँचने का रास्ता तो सुंदर बना दिया, पर क्या वह सबके लिए सुगम भी होगा? फॉन्ट तो सँवर जाएँगे पर न्याय कहीं पीछे ना छूट जाए।

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