जो अपने बुजूर्गों को दर-दर की ठोकर खिलाया करते हैं......



--- हरेन्द्र शुक्ला।

(●) कानपुर में युवाओं की काव्याशी - चाय्याशी कवि गोष्ठी

कानपुर, 17 दिसंबर। बड़े -बड़े सभागारों और मंचों से कविता ऊब चुकी है, अब वह वहाँ से निकलकर खुली हवा में सांस लेना चाहती है। वह पार्कों और खेतो की स्वछंद हवा में जीना चाहती है। सड़कों पर घूमकर किसी फुटपथिये की सुध लेना चाहती है। झुग्गियों के दर्द को खुद में समा लेना चाहती है। कुछ इन्हीं जज्बों के साथ विशाल स्वरुप ठाकुर के संयोजकत्व में रविवार को कानपुर के हर्ष विहार स्थित मोती झील पर एक घुमंतू किस्म की 'चलते चलते यूँ ही... कव्याशी और चय्याशी' काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ।

कवि गोष्ठी का आगाज स्वतंत्र कुमार सिंह की कविता से हुआ । उन्होंने अपनी रचना - "वो ख्वाब में मेरे जीती है, मैं जिस लड़की पर मरता हूँ....सुनाकर खूब वाहवाही लुटी । इसके बाद कनपुरिया रोहन ने काव्यपाठ किया। ओम जी बदनाम ने - " जो अपने बुजुर्गों को दर दर की ठोकर खिलाया करते हैं, वही लोग अक्सर मंदिरों के चक्कर लगाया करते हैं। विशाल स्वरुप ठाकुर ने कहा- " यूँ तो तय है कि बड़ा कवि हो जाऊंगा, तुम यूँ ही जलाती रही तो रवि हो जाऊंगा।" शिवम् गुप्ता ने हिंदी के प्रति प्रेम ज़ाहिर करते हुए कहा - "हिंदी की महिमा - नमस्कार मै आपकी अपनी हिंदी हूँ। ...चलो मान लिया - डरपोक ही सही क्यूकी डर ही तो याद दिलाता है कि अभी बहुत कुछ है खोने को तुम्हारे पास।" शिखर राज गुप्ता ने कहा - "कैसा ये मंजर है, कैसी ये मोहब्बत है... जब जब तेरा नाम लूं, क्यों आंखे ये नम है...।"

अमित ने अपनी कविताओं द्वारा प्रेम के अनुभव साझा किये - "मैं अँधेरी रात को रंगीन लिखता हूँ, नाम है "सागर" मोहब्बत हसीन लिखता हूँ ...।" वी वी एस रठवी ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक स्थितियों का ज़िक्र किया।

शैलराज, दिव्यांशु कश्यप, संदीप श्रीमाली, आकाश सिंह, अमिता गौतम, शिवम गुप्ता, नरेन्द्र कुमार आदि ने अपनी कविताओं के माध्यम से समसामयिक स्थितियों का खाका खींचा। गोष्ठी का सफल संचालन राघव प्रजाति एवं धन्यवाद ज्ञापन स्वतंत्र कुमार सिंह ने दिया।

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