सर्कस का अंदाज बदला लेकिन नहीं बदला मनोरंजन



--- रंजीत लुधियानवी, कोलकाता।

मोबाइल, इंटरनेट, डिजीटल इंडिया में भले ही दुनिया के पूरी तरह बदलने का दावा किया जाता हो लेकिन अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो पुराने तौर तरीकों के माध्यम से बच्चों को मनोरंजन और ज्ञान प्रदान करना चाहते हैं। चिड़ियाघर में हर साल लोगों की बढ़ती भीड़ इसका जीता-जागता प्रमाण तो है ही। इसी तरह सर्कस भी भले मीडिया की नजरों से ओझल हो गया हो, लेकिन वास्त में ऐसा नहीं है।

सुनने में भले ही अजीब लगता हो, लेकिन अब भी लोगों को सर्कस का इंतजार रहता है। हावड़ा के आंदुल इलाके के आमबगान मैदान में गुरूवार को ‘रशियन रोलेक्स सर्कस’ का उद्घाटन हुआ और पहला शो हाउस फूल था। बीते साल भी यह सर्कस इस मैदान में लगी थी और अच्छा कारोबार किया था, जिससे प्रभावित होकर दोबारा यहां सर्कस का आयोजन किया गया है। हालांकि इसके लिए न तो धुंआधार प्रचार किया गया और न ही उद्घाटन में खास लोगों को बुलया गया। आसपास के इलाके के लोग ही टोटो, मोटरसाइकिल, बस से यहां पहुंच रहे हैं।

भले ही सर्कस तो अब भी है और इसके प्रति लोगों का आकर्षण भी मौजूद है। ज्यादातर लोग अभी भी अपने बच्चों को साथ लेकर सर्कस देखने के लिए आ रहे हैं, लेकिन ‘सर्कस’ बदल गई है। पहले सर्कस का मतलब हाथी, घोड़ा, बंदर, ऊंट, शेर, सिंह ही नहीं हर तरह के जीव-जंतु जिसमें भालू का शो भी एक खास आकर्षण हुआ करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पशु-पंक्षी सर्कस में नहीं हैं, इसके बाद भी शो हाउसफूल चल रहे हैं।

इस बारे में पूछे जाने पर सर्कस के एक अधिकारी ने बताया कि तीन बजे, पांच बजे और सात बजे के शो की 50 रुपये, 70 रुपये की टिकटें होने के बावजूद पश्चिम बंगाल ही नहीं बिहार, झारखंड और आसपास के राज्यों में खासी मांग है। इन दिनों भी साल भर सर्कस का आयोजन होता है और साल के 365 दिन में ज्यादा नहीं तो 600 शो तो हम करते ही हैं।

मालूम हो कि सर्कस में जानवरों के बजाए अब जिम्नास्टिक आकर्षण बन गया है। लोग जिम्नास्टिकों के करतब दिखाने के लिए बच्चों को यहां लेकर आते हैं। पहले तो हावड़ा का गुलमोहर रेलवे मैदान सर्कस के लिए ही प्रसिद्ध था। सर्कस देखने वाले कई लोगों का कहना है कि टीवी और इंटरनेट से हटाने के लिए जरुरी है कि सर्कस के शो ज्यादा से ज्यादा हों, कई लोगों का तो कहना है कि कुछ जानवरों को तो सर्कस में रखने की मंजूरी मिलनी ही चाहिए। हालांकि ठंड के मौसम में इन दिनों विभिन्न मेलों के बाद सर्कस बच्चों के साथ ही बड़ों को भी लुभा रहा है। कई लोगों का कहना है कि राज्य सरकार कला और कलाकारों के बारे में संजीदा है तो ‘सर्कस’ के बारे में भी सोचना चाहिए।

https://www.indiainside.org/post.php?id=1254