---हरेन्द्र शुक्ला, वाराणसी।
(★) केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी उद्घघाटित
काशी, 30 दिसम्बर। दुनियां में यह संस्कृति विकसित हुई है कि शक्ति का प्रदर्शन कर सबसे ताकतवर बने। इस संस्कृति के कारण दुनिया के देशों में खतरनाक हथियारों को रखने के लिए होड़ मची हुई है। यह मानवता के लिए ठीक नहीं है। लोगों के बीच भावनात्मक रिश्तों को जोड़कर ही शांति की परिकल्पना की जा सकती है। यह बात शनिवार को वाराणसी के सारनाथ स्थित केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में आयोजित दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुये तिब्बतियों के सर्वोच्च धर्मगुरू परम पावन दलाई लामा ने कही।
उन्होंने कहा कि इस पृथ्वी पर रहने का अधिकार सबको है लेकिन हमने अपनी सारी उर्जा को नकारात्मक चीजों की तरफ लगा रखी है। हमें ग्लोबल वार्मिंग पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है। पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में हमलोगों ने घोर लापरवाही का परिचय दिया है जिसकी कीमत हमें पर्यावरण के असंतुलन के रुप चुकानी पड़ रही है। परम पावन दलाई लामा ने कहा कि हमें भारतीय दर्शन ने हमेशा आकर्षित किया है इसके संरक्षण के लिए हम हमेशा गंभीर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान दौर में सामाजिक ताना-बाना टूटने लगा है। आज बडी संख्या में मंदिरों का निर्माण हो रहा है ऐसे में मेरा यह मानना है कि मंदिरों की जगह यदि पुस्तकालय का निर्माण हो तो सामाजिक दर्शन को बल मिलेगा। धर्म और दर्शन हजारों वर्षों से मानव मन के रुपान्तरण पर ही कार्य कर रहे हैं। मन की भावनाओं को समझकर ही तमाम समस्याओं से बचा जा सकता है।
वहीं अतिथियों का स्वागत करते हुये केन्द्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के निदेशक प्रो• गेशे समतेन ने कहा कि बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के परम्पराओं के साधकों का आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ मानव मन के विभिन्न आयमों पर संवाद करना जरुरी है।
https://www.indiainside.org/post.php?id=1323