@ प्रकाश पाण्डेय, कोलकाता महानगर का आर्ट्स एकर संग्रहालय भारत में अपनी तरह की एक बेजोड़ कृति है। इस संग्रहालय में बंगाल की कला और औपनिवेशिक काल के अंकित दृश्य यहां की पारंपरिक संस्कृति को प्रदर्शित करते हैं। कलाकारों की नई नस्लों के लिए यहां रखे दिग्गजों की कृतियां उन्हें सीखने का मौका देती है।
वर्तमान में संग्रहालय में 500 से अधिक कलाकृतियां रखी हैं जिसमें चोरबागन के प्रिंट्स, कालीघाट पाट्स जैसे बेशकीमती चित्रों का संग्रह इसकी रौनक में चार चांद लगाता है। इसके अलावा अगुवा चित्रकारों थॉमस एंड विलियम डेनियल, अबनिंद्रनाथ टैगोर, गगनेंद्रनाथ टैगोर, रामकीनकर बैज जैसे अग्रदूतों की कृतियां यहां रखी है। वहीं समकालीन कलाकारों का प्रतिनिधित्व चितत्रोभानु मजूमदार, जयश्री चक्रवर्ती और पंकज पानवार करते हैं।
इस संग्रहालय के निर्माण का मूल उद्देश्य था कि चित्रकला को प्रोत्साहित करना और नव कलाकारों को इस कला क्षेत्र के अग्रदूतों की कृतियों से परिचित करवाना। महानगर के न्यू टाउन स्थित इस संग्रहालय की स्थापना 6 मार्च 2014 में हुई, जो साढ़े चार एकड़ जमीन में फैला हुआ है। यह भारत का पहला निजी विश्वन स्तरीय संग्रहालय है।
यहां चित्रकला से जुड़ी कार्यशालाओं का आयोजन आए दिन होता रहता है जिसमें इस कला क्षेत्र के महानुभाव शामिल होते हैं। इसके अलावा यहां बच्चों के लिए विशेष शालाओं की व्यवस्था है।
सुविधाओं की बात करें तो यहां विशेष समारोह आयोजन हेतु आडोटोरियम की व्यवस्था है जहां एक साथ 400 लोग बैठ सकते हैं। इसके अलावा बाहर से आने वाले देशी व विदेशी मेहमानों के ठहरने के लिए यहां 18 कमरे हैं जो अति आधुनिक व्यवस्थाओं से परिपूर्ण है और इसके निर्माण के जनक बांग्ला जगत के प्रख्यात चित्रकार शुभाप्रसन्ना हैं। जिनकी बेशकीमती चित्रकारी यहां आने वालों के लिए मुख्य रूप से आकर्षण का केंद्र है।
साल 1947 में जन्मे शुभाप्रसन्ना को बाल्याकाल में उनके परिजन व चाहने वाले शुभा या शुभादा पुकार नाम से बुलाते थे। उन्होंने कलकत्ता के इंडियन कॉलेज ऑफ आर्ट से अपनी पढ़ाई पूरी की और चार दशक तक कई भूमिकाएं निभायी जैसे ग्राफिक कलाकार, चित्रकार, शिक्षक, लेखक और कला कार्यकर्ता के रूप में अपना योगदान दिया। इनके द्वारा उकेरे गए रंगों में प्रमुखता से शहरी परिदृश्य ही सामने आते हैं जिसमें घड़ियां, कौवे और उल्लू की श्रृंखलाएं देखने को मिलती है। जुनून के फूलों के साथ कामोद्दीपक और दुर्गा, कृष्ण-राधा और अन्य प्रतीकों की श्रृंखलाओं में स्वर्ण और चांदी के पन्नी के वस्त्रों के उपयोग के साथ उनकी कृतियां जीवंत रंगों में अमर नजर आती है जो भारतीय लघु चित्रों की याद दिलाती है। उनके नव प्रयोगों में विषय के साथ-साथ उत्सुकता भी साफ परिलक्षित होती है।
https://www.indiainside.org/post.php?id=136