ट्रेन में गंदगी के लिए रेलवे को दो लाख रुपये जुर्माना



कोलकाता, 8 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

--- रंजीत लुधियानवी। ट्रेन के आरक्षित डिब्बे में अवैध यात्रियों की भीड़, शौचालय में गंदगी, बेसिन के नल में गंदा पानी मिलने के बारे में लंबी दूरी की ट्रेनों में यातायात करने वाले लोगों का खासा अनुभव है। अब मुंबई-हावड़ा मेल में ऐसी ही हालत का सामना कलकत्ता हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज व राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के एपिलेट ट्राइब्यूनल के चेयरमैन प्रभेंदु नारायण सिन्हा को करना पड़ा। ट्रेन की हालत को लेकर रेलवे प्रबंधन को क्रेता सुरक्षा अदालत में ले गए। कलकत्ता जिला क्रेता सुरक्षा अदालत (यूनिट-2) के अनुपम भट्टाचार्य, संगीता पाल और रविदेव मुखोपाध्याय की खंडपीठ ने दो लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश दिया है। इसमें अवकाश प्राप्त न्यायधीश की मानसिक परेशानी के लिए एक लाख रुपये, अदालत में मामले के खर्च के लिए 10 हजार रुपये देने होंगे। जबकि बाकी एक लाख रुपये क्रेता सुरक्षा अदालत के फंड में जमा करने होंगे।

मालूम हो कि इसके पहले भी ट्रेनों में घटिया खाना परोसने, से लेकर प्रबंधन की लापरवाही के कारण ट्रेन छूट जाने समेत कई तरह की शिकायतों को लेकर रेलवे के खिलाफ क्रेता सुरक्षा अदालत में लोगों की ओर से शिकायतें की गई हैं। अदालत ने मामलों का निपटारा भी किया है। लेकिन पूर्व न्यायधीश की ओर से इस तरह की शिकायत शायद पहली बार की गई है। हालांकि रेलवे की ओर से उनकी शिकायत को खारिज करने के लिए कई कारण गिनाए गए थे। इसमें यह भी कहा गया कि उन्होंने रेलवे से शिकायत क्यों नहीं की। रेलवे के मुताबिक पानी भरने से लेकर सफाई तक सारा कुछ किया गया था। लेकिन अदालत ने रेलवे की बातों को खारिज कर दिया। हालांकि जिला क्रेता सुरक्षा फोरम के निर्देश के खिलाफ रेलवे उच्च न्यायालय में अपील कर सकती है।

सूत्रों के मुताबिक मई 2016 में मुंबई मेल के एसी थ्री डिब्बे में सिन्हा नागपुर से सपरिवार लौट रहे थे। उन्होंने पांच सीटें आरक्षित करवाई थी, लेकिन ट्रेन में सवार होने पर उन्होंने पाया कि वेटिंग लिस्ट वाले यात्री उनकी सीटों पर बैठे थे। इसके अलावा दूसरी कई सीटों पर भी वेटिंग लिस्ट वाले यात्री बैठे हुए थे। ट्रेन के टीटीई को मामले के बारे में कहा, लेकिन उसने महत्व नहीं दिया। मजबूर होकर सीटें आरक्षित करने के बाद भी किसी तरह सीटों पर बैठना पड़ा। इसके बाद ट्रेन के शौचालय में जाकर देखा जहां बदबू मार रही थी। शौचालय का फ्लश काम नहीं कर रहा था। 16-17 मग पानी के डालने के बाद भी शौचालय की हालत ठीक नहीं हुई। दूसरे दिन सुबह नई समस्या देखने को मिली, बेसिन के नल से पानी नहीं आ रहा था। कुछ देर बाद थोड़ा सा पानी तो आया लेकिन वह काला था।

उन्होंने अदालत में आरोप लगाया कि ट्रेन में पानी की टंकी की ठीक से सफाई नहीं की जाती है। जिससे रेल यात्रियों को इस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने शिकायत की कि शौचालय से सट कर भी लोग बैठे थे, जिससे शौचालय आने-जाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन के साथ ही दक्षिण पूर्व रेलवे व पश्चिम रेलवे प्रबंधन को लापरवाही का आरोप लगाते हुए पत्र लिखा। लेकिन इसका असर नहीं हुआ, जिसके बाद अदालत की शरण ली।

दूसरी ओर, रेलवे की ओर से कहा गया कि आरक्षित कमरे में अवैध यात्रियों के सवार होने का आरोप आधारहीन है। टीटीई को इस बारे में किसी तरह की लिखित शिकायत नहीं की गई। ट्रेन में गंदगी साफ करने की जिम्मेवारी जिस संस्था की थी, उसने भी तय समय पर ट्रेन के डिब्बे और शौचालय को साफ किया। इसके साथ ही रेलवे की ओर से अभियुक्त पर 16-17 मग पानी के बर्बाद करने का आरोप भी मढ़ा गया। हालांकि अदालत ने रेलवे की टिप्पणी नहीं मानी और उसे खारिज करते हुए जुर्माना देने का निर्देश दिया।

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