@प्रकाश पाण्डेय, अब हम ऐसे हालात में नहीं है कि कंप्यूटर का नाम सुनते ही रोजगार के खत्म होने की आशंका पाल ले। आज भारत इंटरनेट की बात आत्मविश्वांस से करता है। जटिल समझे जाने वाले कागजी काम अब ज्यादा सरल और सटीक ढंग से होने लगे हैं। कंप्यूटर के आने से रोजगार बढ़ा है और नित्य हो रहे प्रयोगों से आगे संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है। मोदी सरकार ने डिजिटल इंडिया प्रोग्राम की लांचिंग बड़े धूमधाम से की थी और आज इस प्लेटफार्म पर देश की सर्वोच्च न्यायालय भी है। भारी भरकम फाइलों की वजह से कई मामले धूल गर्दों की गर्त में ही दब कर रह जाते थे और न्याय दूर की कौड़ी थी लेकिन उम्मीद है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय के डिजिटलाइज होने से काफी हद तक काम आसान होगा। बहस के दौरान मोटी फाइले की आवश्यकता नहीं पड़ेगी बल्कि केस नम्बर और पैरा संख्या फीड कर इंटर मारते ही पूरा रिकॉर्ड न्यायाधीश के सामने होगा। वहीं कहा जा रहा है कि डिजिटल फार्मेट उन लंबित पड़े मामलों के लिए आगे वरदान साबित हो सकता है जिनकी सुनवाई की आखिरी तारीख आज तक मुकर्र ही नहीं हो सकी है।
गर्मी की छुट्टी के बाद नियमित रूप से लगी सर्वोच्च न्यायालय के कोर्ट संख्या एक से लेकर पांच तक का दृश्य एकदम से बदला नजर आया और फाइलों का अम्बार नदारत था और न्यायाधीश के समक्ष महज एक कंप्यूटर स्क्रीन रखा था। न्यायाधीशों ने कंप्यूटर पर ही केस पढ़ कर सुनवाई की। अधिवक्ता कहते थे माई लार्ड पेज नंबर 125 का पैरा चार देखिए और माई लार्ड अपने सामने मौजूद कंप्यूटर स्क्रीन पर वही पेज खोल लेते थे। न्यायाधीशों के पास डिजिटल फार्म में पूरी फाइल और दस्तावेज मौजूद थे। यहां तक कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दाखिल विशेष अनुमति याचिकाओं में न्यायाधीशों के पास हाईकोर्ट का रिकार्ड भी कंप्यूटर पर मौजूद था। जिस भी दस्तावेज का हवाला दिया जा रहा था वो दस्तावेज उनके स्क्रीन पर था। यहां तक की हाईकोर्ट के रिकार्ड में उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर है या नहीं इस बारे में भी अधिवक्ता को बताया जा रहा था और ऐसे में जब अधिवक्ता खुद की ओर से हस्ताक्षरित फोटो कापी पेश करता तो उसे लेने से इनकार कर दिया गया। इसके पीछे वजह यह थी कि उक्त दस्तावेजों को हाईकोर्ट में दाखिल ही नहीं किया गया था।
वहीं यह भी साफ कर दिया गया है कि अब सर्वोच्च न्यायालय में नए मामले आन लाइन ही दाखिल होंगे। हाईकोर्ट का रिकार्ड और मामला नंबर डालते ही सारे दस्तावेज खुद-ब-खुद संलग्न हो जाएंगे।
गौर करने वाली बात यह है कि हर साल औसतन 70,000 मामले सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए आते हैं। हर केस में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी, संलग्नित दस्तावेज और रेफरेंस पेपर मिलाकर औसतन 100 से ज्यादा पन्नों की फाइल हो जाती थी। इसके अलावा तमाम लॉ फर्म हैं जो लगातार केस फाइल करते रहते हैं। समूह में याचिकाएं आती हैं। ऐसे में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के दस्तावेजों को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से इकट्ठा करके फाइलों का बोझ कम करने से काम तो आसान होगा ही इसके अलावा मामलों के त्वरित निपटान की भी गुंजाइश होगी।
लेकिन विकास और रफ्तार में बलि की भी एक पुरानी परम्परा है। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है जहां डिजिटल फार्मेट में काम शुरू होने से पीड़ितों को जल्द न्याय और अधिवक्ताओं के काम आसानी और समय बचत की बात हो रही है वहीं इस पेशे में खुद की जिंदगी को खपा चुके वे बुजुर्ग टाइपिस्ट भी है जिनके लिए उनका टाइप राइटर ही सब कुछ है। भले ही कंप्यूटर क्रांति के दौर में टाइपिंग मशीनों का वजूद खत्म हो चला है बावजूद इसके आज भी देशभर के कोर्ट परिसरों के भीतर-बाहर भारी संख्या में टाइपिस्ट नजर आते हैं। भारतीय अदालतों के डिजिटलाइजेशन फार्मेट में इन्हें क्या कही फीट किया जाएगा या फिर इनके वजूद को ही खत्म मान लिया जाए?
कोलकाता के बैंकशॉल कोर्ट के बाहर टाइपिंग कर गुजर बसर करने वाले एक टाइपिस्ट शेख अब्दुल मन्नान कहते हैं कि वो पिछले 35 साल से यहां यह काम कर रहे हैं और ऐसे में अगर उन्हें अचानक से इस काम से अलग होना पड़ा तो वो पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे। इनकी मौजूदा स्थिति अच्छी नहीं है। दो जून की रोटी के लिए वो पूरे दिन काम करते हैं। इनके चार बच्चे हैं, ऊपर से सिर पर बुजुर्ग मां-बाप की जिम्मेदारी भी है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर बुजुर्ग मां-बाप की दवा तक का इंतजाम इसी काम से चलता है और अगर यह भी नहीं रहा तो आप समझ सकते हैं कि हम जीते जी मर जाएंगे।
एक अन्य टाइपिस्ट सुन्दर दास जो जिंदगी के 50वे पड़ाव पर है और आज भी कार्यरत हैं। सुन्दर चार बेटियों के पिता हैं। किराए के मकान में गुजर बसर कर रहे हैं। चार में से तीन बेटियों की शादी सुन्दर ने कर दी है लेकिन अब भी एक का ब्याह बाकी है। सुन्दर बताते हैं कि पैसे की किल्लत की वजह से वो पत्नी का इलाज भी नहीं करवा पा रहे हैं जो पिछले दो साल से हृदय रोग से ग्रसित है। इलाज के लिए लाखों रुपए की आवश्यकता है, लेकिन कमाई इतनी नहीं है कि वो इलाज करवा सकें और ऊपर से जवान बेटी की शादी करनी है। अगर किसी वजह से यह काम बंद हो जाता है तो जीना दुश्वावर हो जाएगा।
कुछ लोगों का कहना था कि छोड़िए जो होगा देखा जाएगा। कल की फिक्र में आज से ही क्यूं मरें। अब देश को मानव की नहीं बल्कि यंत्र मानव की जरूरत है।
सर्वोच्च न्यायालय के डिजिटलाइज होने पर कोलकाता के अधिवक्ताओं की राय
अधिवक्ता अरुण कुमार भगत के मुताबिक सोफ्ट काफी फार्मेट को प्रमोट करने से पहले प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए थी। कोर्ट अगर डिजिटलाइज होते हैं तो इसमें कोई दिक्कत नहीं है बल्कि इसके कई लाभ है जैसे कागजों की जिन गट्ठरों को हम सम्भाल कर रखने के लिए मजबूर होते थे उनकी जगह हम अपने मेल और पेनड्राइव का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि कुछ शुरुआती दिक्कतें जरूर आएंगी लेकिन आहिस्ते-आहिस्ते इसकी लत हो जाने पर काम सरल और सहज दिखने लगेगा।
अधिवक्ता मनोज कुमार शर्मा ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के डिजिटलाइज पेपरलेस वर्क के समर्थक है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि डिजिटल तौर तरीकों के अपनाने भर से काम नहीं चलता बल्कि उसको अमल में लाने से पहले योजनाबद्ध तरीके से पूर्ण संरचनात्मक व्यवस्था पर गौर करना भी अनिवार्य होता है। आज सर्वोच्च न्यायालय ने कामकाज को आसान बनाने के लिए पेपरलेस डिजिटलाइज फार्मेट को अपनाया है कल हाईकोर्ट और फिर जिला कोर्ट को भी इस फार्मेट को अपनाना होगा जिसके लिए इनफ्रासटेक्चर की जरूरत पड़ेगी और इसे चंद दिनों में पूरा नहीं किया जा सकता है। बिना प्रशिक्षण के काम करना काम को आसान नहीं बल्कि कठिन बनाना होता है।
अधिवक्ता अमर कृष्णा साहा के अनुसार इस वर्क फार्मेट की आज जरूरत थी। तैयारियों के लिए 5-6 महीने का वक्त भी था जो कम नहीं होता है। इस तरीके को अपनाने से काम आसान ही होगा। आज लगभग-लगभग सभी लोग कंप्यूटर से अवगत है अनभिज्ञता जैसी कोई स्थिति नहीं है। कुछ लोगों को दिक्कतें जरूर आएंगी लेकिन कुछ की वजह से सभी को परेशानी से दो-चार होना पड़े ये भी तो सही नहीं है न।
अधिवक्ता ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि वर्क फार्मेट कुछ भी हो काम तो रूकेने वाला नहीं है। जैसे हमारे घर परिवार का कोई शख्स जब हमसे हमेशा के लिए जुदा होता है तो क्या हम उसके बिना जीना छोड़ देते हैं, नहीं न? ऐसे ही काम और जीवन यूं ही चलते हैं। तकनीक के युग में तकनीक का इस्तेमाल तो होगा ही। विदेशों में डिजिटल फार्मेट को पहले अपनाया गया, हम थोड़ा देर से अपना रहे हैं। बस इतना ही अंतर है। डिजिटालाइजेशन तो हर क्षेत्र में हो रहा है बैंकों से लेकर आयकर विभाग तक इस फार्मेट को अपना चुके हैं, फिर न्याय क्षेत्र में तो इसके प्रवेश में पहले ही काफी विलंब हो चुका है।
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