नसीम साकेती। योग का शाब्दिक अर्थ है जुड़ाव। योग जीवन दर्शन है ब्याधिमुक्त जीवन की सचेत संकल्पना है, योग एक व्यवहारिक विज्ञान है, शारीरिक स्तर पर योग्याभ्यास से मनुष्य निरोग हो सकता है, शारीरिक बल में वृद्धि होती है वह ऐसी स्थिति में जा सकता है कि भविष्य में कोई रोग ही न हो। बौद्धिक स्तर पर मनुष्य योग्याभ्यास से अपनी मानसिक क्षमता की वृद्धि कर सकता है, श्री अरविंद का कहना है कि प्राणायाम करने से मेरी कविता लिखने की क्षमता काफ़ी बढ़ गई है, पहले जहां महीने में कुछ पंक्तियां लिख पाता था वहां उतनी पंक्तियां आधे घण्टे में लिखने लगा, योग से अपने स्वभाव में पूर्ण परिवर्तन ला सकते हैं तथा अपने अन्दर प्रयुक्त ज्ञान तथा शक्ति का पूर्ण जागरण कर सकते हैं, तनावमुक्त जीवन जीने का प्रशस्त मार्ग है योग। भगवद्गीता के अनुसार ‘‘सिद्धध्यसिद्धत्यो समोभूखा समत्वंयोग उच्चते’’ अर्थात् दुख-सुख, लाभ अलाभ, शत्रु-मित्र, शीत तथा ऊष्णा आदि द्वन्दों से सर्वत्र समभाव रखना योग है। आज के मनुष्य को योग की अत्यधिक आवश्यकता है, क्योंकि आज की भाग-दौड़ तथा तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी में मानव जीवन में, व्यस्तता तथा मन की ब्यग्रता ने, सेंध लगा लिया है, जिससे मन तथा शरीर अत्यधिक तनाव, चिड़चिड़ेपन तथा क्रोध से रोगों की गिरफ़्त में आता जा रहा है। ऐसे में ज़िन्दगी को स्वस्थ तथा ऊर्जावान बनाये रखने के लिये योग ही एकमात्र विकल्प है, इससे जीवन में एक शाश्वत गति मिल जाती है, योग हमारी भारतीय संस्कृति की प्राचीनतम पहचान तथा बहुमूल्य धरोहर हैं, यह मानव जीवन को न केवल स्वस्थ तथा दीर्घायु बनाता है, बल्कि उसे आत्मिक आनंद की अनुभूति भी कराता है तथा मानव-चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करता है अच्छे स्वास्थ्य तथा प्रफुल्लित मन के लिये यह परम आवश्यक है कि योग पद्धति का अधिक से अधिक उपयोग तथा प्रचार-प्रसार किया जाये जिससे केवल हम भारतीय ही नहीं बल्कि विश्व का जन-मानस इससे लाभान्वित हो सके क्योंकि हमारी आस्था तो ‘‘वसुधैव कुटम्बकमं्’’ की है, वैसे तो सम्पूर्ण विश्व में योग की पहचान पूर्ववत् थी परन्तु हमारे प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के अथक प्रयास से संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को ‘अन्तरराष्ट्रीय दिवस’ घोषित कर भारत की इस सांस्कृतिक धरोहर को विश्वव्यापी बना दिया।
11 दिसम्बर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने भारत द्वारा पेश किये गये प्रस्ताव को स्वीकार करते हुये 21 जून को ’’अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’’ के रूप में घोषित कर दिया सबसे सुन्दर बात यह रही कि इस प्रस्ताव का समर्थन 193 देशों में से 175 देशों ने किया और बिना किसी वोटिंग के इसे स्वीकार कर लिया गया। सवाल उठता है कि ’’अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’’ 21 जून को ही मनाने के पीछे कारण क्या है...? 21 जून को ग्रीष्म संक्रांति होती है इस दिन सूर्य उत्तर से दक्षिण की और चलना शुरू करता है, यानी सूर्य जो अब तक उत्तरी गोलार्द्ध के सामने था अब दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर बढ़ना शुरू हो जाता है, योग की दृष्टि से यह समय ‘संक्रमण काल’ होता है यानी रूपांतरण के लिये बेहतर समय होता है।
सोलह कलाओं के अवतार श्री कृष्ण ने श्रीमद् भगवतगीता में ‘योग’ की महत्ता को विशेष रूप से प्रतिपादित किया है, तथा इसके अनेक स्वरूप बताये हैं। विष्णु पुराण के अनुसार ‘‘योगः संयोग इत्युक्तः जीवात्म परमात्मने’’ अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्ण मिलन है क्योंकि मनुष्य जब एकाग्रता से योग की प्रक्रिया शान्तमन से प्रारंभ करता है तो उसे परमात्मा की अनुभूति अचेतन मस्तिष्क से चेतन मस्तिष्क में आने लगती है।
योग को गणित के माध्यम से समझा जा सकता है, पृथ्वी भूवृत है यह 360 अंश की है, पृथ्वी 24 घन्टे में 21,600 बार सांस लेती है यानी 360ग60 बराबर 21,600 होता है, मानव शरीर पृथ्वी से बना है, अतः 24 घण्टे में वह भी 21,600 बार श्वांस लेता है जैसे यदि मनुष्य स्वस्थ है और वह प्राणायाम प्रतिदिन करता है, तो एक मिनट में 15 बार सांस लेगा एक घण्टे में 15ग60 बराबर 900 बार सांस लेगा, 24 घण्टे में 900ग24 बराबर 21,600 बार सांस लेगा, इसे योग का गणितीय वैज्ञानिक आधार कहा जा सकता है।
21 जून 2017 हमारा शहर-ए-लखनऊ इतिहास के पन्नों की सतरें बन गया जब हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी ने हमारे शहर को योग करने के लिये चुना और ‘अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस’ पर रमाबाई अम्बेडकर के विशाल मैदान में रिमझिम बारिश के बीच हज़ारों उत्साही लोगों के साथ योग किया इसमें अमेरिका तथा रूस समेत नौ देशों के 50 प्रतिनिधि भी शामिल हुये। बारिश में प्रधानमन्त्री जी का योग के प्रति समर्पण ‘हठयोग’ जैसा था।
‘योग’ को किसी धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिये हज़ारों साल पहले जब धर्म अस्तित्व में नहीं आया था, तब भी योग इस धरा पर विद्यमान था, योग सीधे तौर पर हमारे मन, आत्मा तथा शरीर को एक समुचित लय में काम करने का मार्ग प्रशस्त करता है, कितनी बड़ी विडम्बना है इसे कुछ लोग राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे है, जो घोर निन्दनीय है।
वेदों, पुराणों तथा उपनिषदों के विद्वान विधान सभा अध्यक्ष श्री हृदयनारायण दीक्षित जी ने अपने एक लेख में कहा है-‘नमाज़ में भी विशेष योगासन हैं, ‘योग’ किसी पंथ अथवा मज़हब का पेटेंट नहीं है’।
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