@प्रकाश पाण्डेय। गोबर, गौमूत्र और थोड़ी सी मिट्टी निषिद्धो पाली से मंगाकर मिलायी जाती है। निषिद्धो पाली वेश्याओं के रहने के स्थान को कहते हैं और मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्याओं के चौखट की मिट्टी को पवित्र माना गया है।
साल 1917 में उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की बांग्ला उपन्यास देवदास प्रकाशित हुई और इस कृति पर कई निर्देशकों ने फिल्म भी बनाई। पहली बार 1928 में इस उपन्यास पर फिल्म बनी। इसके बाद साल 1935 में पीसी बरुआ अभिनीत और निर्देशित देवदास आई। एक साल बाद एक बार फिर 1936 में पीसी बरुआ द्वारा निर्देशित और के.एल सहगल और जमुना द्वारा अभिनीत देवदास प्रदर्शित की गई। 1953 में वेदांतम राघवैय्या के निर्देशन और नागेश्वहर राव और सावित्री अभिनीत तेलगु देवदास का अवतरण हुआ। इसके दो साल बाद यानि 1955 में विमल राय ने दिलीप कुमार और सुचित्रा सेन को लेकर देवदास बनाई। 2002 में संजय लीला भंसाली के निर्देशन में शाहरुख खान, एश्वेर्या राय और माधुरी दीक्षित अभिनीत देवदास को सिनेमा घरों में प्रदर्शित किया गया, जिसे लोगों ने हाथों हाथ लिया और इस फिल्म की सिनेमा जगत में जमकर सराहना हुई। बंगाल की बाबू संस्कृति और जमीनदारी प्रथा के बीच पनपे प्रेम के मध्य वेश्या अवतरण और दुर्गोत्सव के दौरान वेश्या की चोखट से मिट्टी की पवित्रता इस उपन्यास की खास जमीन को और भी ज्यादा मजबूती देती है। देवदास मुखर्जी और उनकी बाल्यकाल की प्रेमिका पारो यानि पार्वती चक्रवर्ती को देवदास के पिता और परिजनों की हट की वजह से अलग होना पड़ता है और पारो किसी और की हो जाती है इसका गम देवदास बर्दाश्त नहीं कर पाता और वो शराब के आगोश में इस कदर रमता है कि उसकी जिंदगी आहिस्ता-आहिस्ता खात्मे के करीब पहुंच जाती है लेकिन इसी दरम्यान देवदास वेश्या चंद्रमुखी के कोठे पर अपने साथी चुन्नीबाबू यानि चुन्नीलाल के साथ पहुंचता है और इस घटनाक्रम में चंद्रमुखी को देवदास से प्रेम हो जाता है। इस प्रेम में पाने से ज्यादा वेदना दिखती है और सामाजिक उस रीति-रिवाज का दृश्य भी सामने आता है जिसकी कथनी और करनी में हमेशा से ही फक्र देखने को मिलता रहा है।
भले ही 1911 में देश की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली हो गई, लेकिन आज भी कोलकता को सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा हासिल है। सोनागाछी ऐसे तो दागदार जिंदगियों का ऐशखाना है। पर इस ऐशखाने की भी अपनी अहमियत है। और महत्व है वेश्याओं का यहां की संस्कृति में। क्योंकि यहां की वेश्याए यहां की सांस्कृतिक दर्पण का एक हिस्सा है। दुर्गा पूजा में पूजी जाने वाली मां दुर्गा की भव्य मूर्तियों का एक खास महत्व होता है और महत्व होता है उस मिट्टी का जिससे मां दुर्गा की मूर्तियां तैयार की जाती हैं। ये मिट्टी पवित्र पावन गंगा के तट से ला कर तैयार की जाती है। इसमें गोबर, गौमूत्र और थोड़ी सी मिट्टी निषिद्धो पाली से मंगाकर मिलायी जाती है। लेकिन आपके जहन में सवाल उठेगा कि आखिरकार निषिद्धो पाली क्या है? निषिद्धो पाली वेश्याओं के रहने के स्थान को कहते हैं और मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए वेश्याओं के चौखट की मिट्टी कोे पवित्र माना गया है।
दरअसल दुर्गा उत्सव मूल रूप से पश्चि म बंगाल का एक महत्वपूर्ण त्योहार है, लेकिन अब यह त्योहार समूचे भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। दुर्गा प्रतिमा के निर्माण के लिए उत्तर कोलकता का कुमोरटोली इलाका विश्व्भर में विख्यात है। साथ ही विख्यात है सोनागाछी जो शहर का ही नहीं बल्कि एशिया का सबसे ब़ड़ा रेड लाइट एरिया है और यहीं की मिट्टी को लाकर मूर्तिकार मूर्तियां बनाना शुरू करते हैं। आज देश के दूसरे राज्यों में भी मूर्तियों का र्निमाण होने लगा है तो ऐसे में वहां भी इस वेश्यालय की मिट्टी बोरों में भर कर बिकने के लिए जाने लगी है। पर सवाल यह भी है कि भला वेश्यालय के चौखट की मिट्टी ही क्यों जरूरी है? इसकी भी कई कहानियां प्रचलित हैं। कुछ पुरोहितों के अनुसार प्राचीन काल में एक वेश्या मां दुर्गा की अन्नय भक्त थी उसे तिरस्कार से बचाने के लिए मां ने स्वंय आदेश देकर उसके आंगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई थी। वहीं समाजसेवी व पेशे से अधिवक्ता बप्पाधिश दास कहते हैं कि कोलकाता से ही ज्यादातर सामाजिक सुधार से जुड़े आंदोलन शुरू हुए। इन्हीं में से एक महिलाओं के सम्मान के लिए भी था और इसी लिए ये मान्यता प्रचलित की गई कि नारी शक्ति का ही एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उससे कहीं गलती होती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है, फिर चाहे वो वेश्या ही क्यों ना हो। वेश्या के कोठे के बाहर से मिट्टी लेने का उद्देश्य उन्हें सम्मान देना है और कुछ नहीं। इसके अलावा एक अन्य मान्यता यह भी है कि जब एक महिला या कोई अन्य शख्स वेश्यालय के द्वार पर खड़ा होता है तो अंदर जाने से पहले अपनी सारी पवित्रता को वहीं छोड़कर प्रवेश करता है, इसी वजह से यहां की मिट्टी को पवित्र माना गया है।
फिर, देश के इस सबसे बड़े वेश्यालय यानि सोनागाछी में धंधा करने वाली औरतों के लिए वेश्या और धंधेवाली जैसे अपशब्दों का क्यों इस्तेमाल किया जाता है? शरीफ इन्हें सभ्य संस्कारी समाज पर काला धब्बा क्यों करार देते हैं? सामज भी वही है, लोग भी वही है फिर क्यूं साल में नौ दिन इन वेश्याओं की अहमियत ज्यादा होती है? तथाकथित समाज के शरीफ कहलाने वाले लोग क्यूं यहां की लड़कियों व औरतों को इंसानी नजर से नहीं देखते हैं?
क्या किसी ने सोचा है कि इनको आखिरकार ये सब क्यों करना पड़ता है? शायद इस ओर झांकने की जरूरत किसी को आज तक महसूस ही नहीं हुई। आखिर क्यों तथाकथित शरीफ कहे जाने वाले लोग जो इनसे नफरत करते हैं इस धंधे से जुड़ी औरतों व लड़कियों की पीड़ा को समझने की कोशिश करते हैं। कुछ तो मजबूरिया रही होंगी, यूं ही कोई धंधेवाली न बनती है।
इनको इस धंधे में आने के लिए किसने मजबूर किया? ऐसी क्या मजबूरी होगी कि एक औरत अपने जिस्म का सौदा करने को तैयार हो गई होगी? ना चाहकर भी रुपयों के लिए एक दिन में न जाने कितने भेड़ियों से खुद के जिस्म को नुचवाती होगी। नरक से भी बदतर जिन्दगी, ना सुबह, ना शाम और रात के अंधकार में तो वो खुद के वजूद को ही भूला देती होगी।
उर्दू जुबानी की मशहूर लेखिका ऐनी आपा यानि कुर्रतु्ल ऐन हैदर की गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो कुछ इसी तरह की वेदना को जाहिर करती है। इस पेशे से जुड़ी हर लड़की एकांत में शायद आंसुओं के साथ इसी गीत को गुनगुनाती होगी।
नसीब की मारी इन भारतीय बेटियों की स्थिति को देखकर उस मां की कोख पर दया आती है जिसने इन्हें जन्म तो दिया लेकिन जिंदगी न दे सकी। उन निमात्रियों को आज भी अपनी बेटियों की तलाश होगी, अगर वो इस जहां में खुद सलामत हुई तो, वरना आत्मा तो रो ही रही होगी। ऐसे में बदनाम गली की इन भारतीय बेटियों को गाली न देकर सांत्वना के दो बोल की जरूरत है। ज्यादातर मामलों में देखा जाता है कि सुदूर ग्रामीण इलाकों की बेटियों को रोजगार दिलाने के बहाने दलाल बहकाकर शहर लाते हैं और उनका सौदा जिस्म के बाजार में कर देते हैं जहां से उनका निकलना सम्भव ही नहीं होता और कुछ दिन वहां रह किसी तरह से निकल भी गई तो घर वापसी आसान नहीं होता क्योंकि वो खुद ही अपनी नजर में गिर गई होती हैं।
चिड़िया मुक्ताकाश में उड़ान भरते अच्छी लगती है, न कि कैद पिंजरे में। पर सोनागाछी उस पिंजरे की तरह है जहां से जीते जी मुक्ति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यहां जकड़ी जिंदगी और उदास दिल की विरह वेदना ही व्याप्त होती है।
यहां की लड़कियों को देख ऐसा नहीं लगता कि ये और लड़कियों से अलग है और न ही इनके चेहरे पर वेश्या होने का ठप्पा लगा होता है। फिर भी लोग इनको हेय दृष्टि से देखते हैं। लेकिन सवाल है कि अगर कोई लड़की सोनागाछी की वेश्या है तो क्या वो इंसान नहीं है? वो भी खुश रहना चाहती है।
कहने को वेश्यावृत्ति का कारोबार बहुत बड़ा है लेकिन अधिकतर पैसा वेश्याओं को नहीं बल्कि उनके मालिकों और दलालों की जेबों में जाता है और एक वेश्या को बस मिलता है कुछ पैसे और ढेर सारा अपमान।
सोनागाछी की संकरी गलियों में ज्यादातर संख्या में वेश्याएं पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश और नेपाल से है इसके अलावा झारखंड और बिहार की भी लड़कियों की तादाद अच्छी खासी है।
बांग्लादेश और नेपाल की लड़कियों की बात करें तो ये लड़कियां गरीबी की वजह से परिवार पालने के लिए भारत काफी उम्मीदों के साथ आई थी कि यहां उन्हें कोई काम मिल जायेगा लेकिन जिस्मफरोशी के ठेकेदारों के चंगुल में फंसकर वो जीते जी नरकवासी हो गई है और हर रोज यहां बकरों की तरह जिस्म की बाजार में बिकने के लिए अपने कोठे के बाहर खड़ी रहती है ग्राहक के ताक में।
इस मरे बदन को भगवान के वास्ते निहार ले,
वरना तेरी बेरुखी मुझे भूखे तर-तर तड़पाएगी।
चर-चर करेगी पेट की क्षुधा रोटी की ताक में,
वास्ता है तुझे जिसे तू पूजता है हर सहर रोज।
इस गली की मोहनी और रेखा
पेट में खाना न हो तो जिस्म की हिफाजत क्या कोई खाक करेगा! मजबूरी ने कोठों की सीढ़ी चढ़ा दी लेकिन दिल में अब भी खुले आसमान के नीचे जीने की ललक इन्होंने बचा रखी है। उम्मीद भरी नजरों से वे किसी जन्नत की चाह में निकलना चाहती हैं। दर्द की बिसात से रू-ब-रू होने के लिए मैंने कई कोठों और कोठियों की तरफ रूख किया-जिसमें नारकलियां ग्राहकों का इंतजार किया करती हैं, जो उनके पेट पर मालिकाना हक रखते हैं। दर्द का किस्सा बहुत है और जिन्दगी इस पार जितनी आसां लगती है, शायद उस पार उतनी आसां नहीं है। किसी ने कहा था कि अगर मैं अनंत तक अस्तित्व में रहूंगा तो फिर मैं कल कैसे अस्तित्व में रह सकूंगा?
दुनियां की तरह कोठे और बस्तियां भी बसती रही है उजड़ती रही है। चाह, वाह और आह का सिलसिला चलता रहा है, चल रहा है और आगे भी चलता रहेगा।
बी. आर. चोपड़ा निर्मित फिल्म साधना, साल 1958 में आई, इस फिल्म के दृश्य, संवाद और गीत मनभावक हैं। रसिक की जिम्मेदारी सिर्फ रसास्वादन और भावविभोर होने के हैं। हाशिये का जमीन, उससे जुड़ी कहानियां कुछ लोगों तक पहुंच जाए यही कोठागोई का लक्ष्य रहा। साधना फिल्म के बारे में बी.आर.चोपड़ा ने कहा था कि वेश्यावृति एक मानव निर्मित लांछन है और उसकी जिम्मेदारी है कि वे इसके पीड़ितों को वापस समाज का हिस्सा बनाए।
हर किसी के पास कई सारी कहानियां है। उनकी जिन्दगी में झांक कर क्या दिखा और क्या दिखा पाया, आपको क्या बताऊं। खैर! मुझे ही मालूम नहीं चला। हर कहानी में दर्द चरम पर रहा और हर सवाल का जवाब तो मिलता लेकिन आंसुओं की बरसात पूरी कड़ी में आम हो चली थी। आधुनिक भारत के निर्माण की विशाल प्रक्रिया के हंगामे और शोर में समय से थोड़ा परे स्मृति की पगडंडियां गहरी धंसी हुई हैं। खिलखिलाहटों, सिसकियों से काफी कुछ सिखने को मिला। हंसी, दर्द और ये अहसास उन किरदारों के हैं जिन्हें राष्ट्रीय गौरव की पोथियों में जगह नहीं दी जाएगी। उनके नाम पर सड़कें नहीं होंगी और न ही उनकी जयंती मनाई जाएगी। इनके होने और न होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।
सोनागाछी के अलावा भी शहर में कई दूसरी संकरी बदनाम गलियां हैं। समाज में इज्जतदार कहे जाने वाले लोगों को इन संकरी गलियों से परहेज है लेकिन सवाल है कि अगर परहेज ही था तो आखिर ये गलियां कैसे बसी। फिल्म साधना में नायक संस्कृत साहित्य का शिक्षक है और एक कक्षा में वह शुद्रक की कथा पढ़ा रहा होता है जिसमें एक राजकुमार और एक वेश्या की प्रेमकहानी है। पढ़ा रहे शिक्षक से छात्र पूछते हैं कि क्या वो ऐसे किसी प्रेम को स्वीकार करेंगे? तो शिक्षक मना करते हुए वेश्याओं को पापी की संज्ञा देता है।
इसके अलावा शरत बाबू का देवदास भी इसी तर्ज की कथा है जिसमें नायक मरते वक्त देखता है कि स्वर्ग में सोने के सिंहासन पर उसकी मां और पारो के साथ चंद्रमुखी भी बैठी है।
औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया। इस गीत का शायर साहिर एक अन्य फिल्म प्यासा में भी समाज के विरूद्ध तवायफों-वेश्याओं की ओर से अभियोग पत्र दायर करता है। चंदा गाती है- अपना जिया जैसे रात अंधेरिया।
बहरहाल, हुनर और हादसों के बीच गुजरती तवायफों के कल्याण की सभ्य चिंता से कोठागोई बच-बचा कर निकल जाती है। कभी कोलकाता की छोटी-छोटी बदनाम गलियों से, तो कभी बदनामी की समंदर सोनागाछी से।
मेरा सोनागाछी में एक दिन का दौरा खौफ की रिदा से कम नहीं था। इस बदनाम गली में पहली दफा मेरा प्रवेश हुआ। खुद ही इतना खौफजदा था कि सवाल करना मेरे लिए शर्म से ज्यादा पहाड़ बन गया था। किसी तरह से एक दलाल से बात की, उसे दिखाने की कोशिश कर रहा था कि मैं रोज इस गली में आता हूं पर जहां तक मुझे लगा कि वो मुझे अच्छे तरीके से भांप चुका था कि मैं पहली बार इस गली में आया हूं। मैंने उससे कहा कि ‘अच्छा माल चाहिए- पैसे बोलो’। वो हंसा, मैं भी मुस्कुरा दिया। मेरी मुस्कुराहट के पीछे मेरा डर कायम था। दरमोलाई के बाद वो मुझे एक तीन मंजिले इमारत के पहले माले पर ले गया। पहले माले के दाहिनी ओर एक कमरा था, अंदर गया तो एक लड़की ने मुस्कुराते हुए मेरी आगवानी की। और थोड़ी देर बाद दलाल और लड़की ने बाहर बरामदे में कुछ गुफ्तगूं की, फिर दलाल चलता बना। लड़की अंदर आकर मुझसे बातें करने लगी। उसने कहा-क्या करना है? मैंने शर्माते हुए कहा-जरा दूर ही रहना, मुझे बस चंद सवाल करने हैं। मुझे बात करने में अच्छा लगता है न कि कुछ और। वो हंसने लगी और बोली कि क्या बात करोगे? थोड़ी देर बाद वो पानी लेकर आई और मैंने उससे उसके माता-पिता के बारे में पूछा। उसने कहा- पिता शब्द मेरे लिए नहीं है.. मैंने कहा क्यों? उसने कहा 16 साल की उम्र में झारखंड से उसे एक शख्स ने नौैकरी दिलाने के बहाने यहां लाया और फिर कुछ दिनों तक अपने पास रख यहां पहुंचा दिया। मैंने कहा झारखंड में कहां से हो? उसका जवाब था-बोकारो। आगे कुछ न पूछने को कहा और मैं भी शांत हो गया। थोड़ी देर बाद मैंने उसे कुछ रूपए दिए और कहा यहां से यदि तुम्हें बाहर निकाल दिया जाय तो क्या घर लौट सकती हो? उसका जवाब था-आई थी सोलह साल की हूं 38 की। घर वापसी अब कहां मुमकिन। उस लड़की के लिए मेरी जुबां से वेश्या शब्द नहीं निकला। क्यों ये मैं भी नहीं जानता। लेकिन हर क्यों का जवाब भी मुमकिन नहीं होता। उसने अपना नाम बताया था लेकिन असल नाम बता नहीं सकता। इसीलिए उसे एक काल्पनिक नाम दे दिया-मोहिनी। वो इसलिए क्योंकि जब से उसने होश सम्हाला था तब से उसका काम मर्दों को मोहना बन गया था।
कुछ गीत ऐसे होते हैं जो मन में धीरे-धीरे रास्ता बनाते हैं। और कुछ ऐसे जो दिल में नश्तर सा चुभते एक बार में ही दिल के आर-पार हो जाते हैं।
ऐसी विदाई बोलो देखी कहीं है
मैया ना बाबुल भैया कौनो नहीं है
दुनियां में कई अजीब रीति-रिवाज हैं जिस्म का धंधा कई देशों में कानूनी मान्यता पाने के बाद आसानी से फल-फूल रहा है। लेकिन कई देशों में आज भी इसे कानूनी मान्यता नहीं मिली है। फिर भी जिस्म बिक रहा है। इन देशों में भारत भी शामिल है। जहां पर लड़कियां महज 134 रुपए में जिस्म बेंच देती हैं।
कोलकाता का सोनागाछी बिकाऊ जिस्म का एक बड़ा अड्डा है। हर साल भारी तादाद में यहां सैकड़ों विदेशी सैलानी घूमने आते हैं क्योंकि सोनागाछी बिकाऊ जिस्म का गढ़ माना जाता है। यहां करीब 11000 वेश्याएं देह व्यापार के धंधे में लगी हुई हैं।
पहले मां अब बेटियां जिस्म बेच रही हैं और जिस्म बेचने की कला बेटियां अपनी मां से सिखती हैं। कुछ मजबूरी में आती हैं तो कुछ को अगवा कर के लाया जाता है। आज भी इसके सुधार और यहां के दलदल में फंसी लड़कियों के लिए किसी प्रकार का कोई काम नहीं किया गया है। किसी जमाने में सोनागाछी राजा-महाराजाओं के मनोरंजन का केन्द्र हुआ करती थी लेकिन किस अभिशाप ने इस सोनागाछी को अपने घेरे में ऐसे लिया कि आज यह एशिया के सबसे बड़ी बदनाम गलियों में शुमार है।
पड़ताली किस्से की कड़ी में मेरी मुलाकात रेखा से हुई। रेखा, यह भी एक काल्पनिक नाम है। रेखा मूल रूप से बिहार के सितामढ़ी जनपद की रहने वाली थी। उसे उसके एक रिश्तेदार यहां यह कह कर लाया था कि वो उसकी पढ़ाई करवायेगा। पिछड़ी जाति से ताल्लुक होने की वजह से किसी ने उसकी खैर-खबर नहीं ली। रेखा बताती है कि उसके घर की माली हालात ठीक नहीं होने की वजह से उसके पिता ने उसे कोलकाता रिश्तेदार के यहां रहने के लिए भेज दिया लेकिन उसे बाद में पता चला कि उसका रिश्तेदार लड़कियों को यहां लाकर बेच देता है। शुरुआत में मैंने भागने की कोशिश की थी पर नाकामयाब रही लेकिन अब तो उम्र ही ढ़ल गई है और वहां जाकर अब किसी को आपबीती बताऊं भी तो उससे क्या आना जाना है। इसीलिए इसे ही अपना नसीब मानकर जिन्दगी काट रही हूं। अब तो यही हमारा घर है। यहां मेरी कई सहेलियां है जो इस धंधे में है। बाजार में हम हर रोज बिजनेस करते हैं, बिजनेस यानि जिस्म दिखा कर मर्दों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इस जिस्मफिरोशी के बाजार में मोहिनी और रेखा जैसी और भी कई लड़कियां है, हर किसी के पास अपना एक अलग किस्सा है। लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई भी नहीं है। वो जिंदगी के गुमनाम अंधेरे में जीती हैं और हर रोज बिन ब्याही दुल्हन बन सुहागरात की सेज कई मर्दों के साथ सांझा करती हैं, इसके एवज में उन्हें रुपए मिलते हैं और रुपयों से पेट भरता है।
सोनागाछी - सोनागाछी में सोने का गाछ यानि पेड़ न कभी था और न हीं आज है। फिर भी इस नरक को सोनागाछी कहा जाता है। यहां के बुजुर्गों का कहना था कि पुराने जमाने में ये जगह सोने के गहने बनाने बेचने की पूर्वी भारत की एक बड़ी मंडी थी और उस समय के अनुसार यहां बहुत निपुण स्वर्णकार बसते थे। इस इलाके में आज भी सोने-चांदी की कुछ दुकाने हैं पर सोने की मंडी के रूप में सोनागाछी कोलकाता महानगर में भी मशहूर नहीं है। पहले दूर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले भोली और सोने की लोभी सुन्दर औरतों को ऐय्याश किस्म के स्वर्णकार और दूसरे लोग बहका लिया करते थे। धीरे-धीरे यह आम बात हो गई और सोनागाछी ऐय्याशी की छोटी-मोटी मंडी बन गई। लेकिन कंचन और कामिनी के मेल से पैदा हुई सोनागाछी के लिए इतिहास की कोई गली नहीं खुलती। खैर, इसे लोक कथा की बातें ही कह सकते हैं।
नामकरण की वजह - इस इलाके में एक सोना गाजी नाम के बाबा रहा करते थे और आज भी उनका मजार यहां स्थित है। उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि इस इलाके का नाम उनके नाम पर कर दिया गया यानि सोना गाजी से सोनागाछी। बहरहाल, इतिहास में झांकने पर पाते हैं कि मनोरंजन के आधुनिक साधनों से दूर 18वीं और 19वीं सदी के अंग्रेजी भारत में कलकत्ता का मुख्य मनोरंजन स्थल के रूप में यह इलाका प्रसिद्ध था। पानी के जहाज से आने वाले सात समंदर पार के लोगों का भी मन बहकाती थी सोनागाछी। हुगली की लहरों पर चांदनी रात में हिचकोले खाती नौकाओं पर अंग्रेज साहबों का साथ देती थी ये सोनागाछी।
बड़े-बड़े जमीनदारों, सेठ-साहूकारों और उनके बिगड़े औलादों,रईसों के पहलू में भी थी सोनागाछी। पर तब सोनागाछी आम ग्राहकों के लिए नहीं थी, जैसे कि आज नजर आती है। इस इलाके के विकास में बंगाल का अकाल, ऐतिहासिक बंग-भंग और पूर्वी पाकिस्तान के रूप में एक हिस्से के चले जाने का बड़ा हाथ था।
नजीर के तौर पर साल 1980-81 में सोनागाछी आई संध्या दे की दास्तां ही देखें। बांग्लादेश के जैसोर जिले में केशवपुर थाने के तहत एक गांव है, मध्यकुल ग्राम संध्या इसी गांव की बेटी रही। जब वो 13-14 साल की हुई तो उसके पिता सुधीर दे को डर था कि बेटी की आबरू खतरे में है और किसी भी वक्त उस पर दरिन्दों की नजर पड़ सकती है। आखिरकार, उसके पिता ने उसे उत्तर -24 परगना स्थित हाबरा उसके नाना-नामी के यहां भेज दिया लेकिन एक दिन शेफाली नाम की महिला ने संध्या को कलकत्ता दिखाने के बहाने बुलाई और उसे सोनागाछी पहुंचा दिया और एक बेटी उस दिन से बाजारू बन गई। संध्या के साथ जो हुआ वो वाकई समाज को शर्मसार करने के लिए कम नहीं है लेकिन यहां हजारों संध्या है जिनकी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
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