कोलकाता, 22 जनवरी 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
---रंजीत लुधियानवी। पूर्व रेलवे की ओर से राज्य में घाटे में चल रहे आठ रेलवे रूट बंद करने का प्रस्ताव जोरदार विरोध के बाद वापस लेने का फैसला किया गया है। रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने कहा कि संसदीय पब्लिक एकाउंट कमेटी ने सुझाव दिया था, इस बारे में रेलवे ने कोई फैासला नहीं लिया है। लेकिन केंद्र की ओर से देश के संघीय ढांचे में छेड़छा़ड़ को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इसके साथ ही ब्लैक लिस्ट में डाले गए रूटों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। इसमें सोनारपुर-कैनिंग डिवीजन के कैनिंग स्टेशन से ही प्रतिदिन 2 लाख 65 हजार रुपये की टिकटों की बिक्री की सूचना है। लोगों का कहना है कि अगर एक स्टेशन पर ही तीन लाख रुपये के टिकट कट रहे हैं, तब घाटे का सवाल कहां से आता है।
पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के महासचिव पार्थ चटर्जी ने कहा कि मुख्यमंत्री व पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी इस पर पहले ही ऐतराज जता चुकी हैं। उन्होंने इसे लेकर केंद्र को पत्र भी भेजा है। यह प्रतिशोध की राजनीति है। राज्य के प्रति इस सौतेलेपन को पार्टी किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी।
गौरतलब है कि रेल मंत्रलय ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर सूचित किया है कि राज्य के आठ रूटों में चल रही ट्रेन सेवाओं से काफी नुकसान हो रहा है इसलिए वह इन रूटों पर ट्रेन सेवा बंद करना चाहता है। ट्रेन सेवाएं जारी रखने के लिए रेल मंत्रालय ने शर्त रखी है कि इन रूटों पर रेलवे को जितना नुकसान हो रहा है, उसका 50 फीसद राज्य सरकार को वहन करना होगा।
कई लोगों की ओर से केंद्र के प्रस्ताव को राजनीतिक प्रतिशोध वाला माना जा रहा है। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में अधिकांश रेलवे रूट उस समय चालू किए गए, जब ममता बनर्जी रेल मंत्री थीं। केंद्र की ओर से उस दौरान चलाई गई ट्रेनों और परियोजनाओं के साथ भी उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाए जाने का आरोप लगाया जा रहा है। पहले ही केंद्र की ओर से राज्य में संचालित 50 परियोजनाओं को बंद कर दिया गया है जबकि 39 के लिए आर्थिक अनुदान कम कर दिया गया है। अब रेल रूट को बंद करने का प्रस्ताव राज्य के प्रति न सिर्फ सौतेलापन है बल्कि राज्यवासियों का अपमान भी है।
राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि केंद्र का यह फैसला राज्य के लोगों के कामकाज में हस्तक्षेप का मामला है। इतना ही नहीं, कैनिंग - सोनारपुर स्टेशन को हेरिेटेज का दर्जा भी मिलना चाहिए क्योंकि यह सियालदह स्टेशन से भी पहले बना था। इतिहास के मुताबिक 1862 में बेलियाघाटा - कैनिंग में ट्रेन चली थी। लार्ड कैनिंग के नाम पर स्टेशन का नामकरण किया गया था। सूत्रों का कहना है कि सिर्फ कैनिंग स्टेशन से ही प्रतिदिन 15,000 टिकटों की बिक्री हो रही है। इसी तरह दूसरे नौ स्टेशनों पर भी टिकटों की भारी बिक्री हो रही होगी। इसके साथ ही सुंदरवन में देश-विदेश से पर्यटक आते हैं और वहां जाने के लिए कैनिंग लाइन ही मुख्य रूट मानी जाती है।
कई धार्मिक लोगों का भी कहना है कि रेलवे का फैसला धर्म विरोधी है क्योंकि इससे जहां राज्य पर्यटन को नुकसान पहुंचेगा, वहीं धार्मिक स्थल की यात्रा करने वालों को भी परेशानी होगी। शांतिपुर-नवद्वीप, बालीगंज-बजबज, बर्दवान-कटवा लाइन पर समस्या होने से नवद्वीप घाट या मायापुर के ईस्कान के मंदिर का दर्शन करने वाले श्रृद्धालुओं, बजबज औद्योगिक स्थल, कटवा के श्रीचैतन्य के दीक्षा स्थान के दर्शन करने वाले धार्मिक लोगों को भारी ठेस लगेगी।
तृणमूल कांग्रेस नेताओं की ओर से कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री की आपत्ति के बाद पूर्व रेलवे की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा गया है कि इस प्रस्ताव से पूर्व रेलवे का सीधे तौर पर कोई सरोकार नहीं है लेकिन यह विरोधाभास को दर्शाता है। लोगों का कहना है कि यह संभव नहीं कि पूर्व रेलवे और रेल मंत्रालय दो अलग-अलग निर्णय लें और अगर ऐसा है तो यह इससे पता चलता है कि केंद्र सरकार के विभागों में कोई तालमेल नहीं है। रेलवे की ओर से फायदे-नुकसान को लेकर उठाए जाने वाले सवाल को लेकर कई लोगों ने कहा कि बजट में केंद्र को यह प्रावधान कर देना चाहिए कि रेलवे जिन राज्यों से गुजरती है, वहां के टिकटों की संग्रह वहां की राज्य सरकारें करें। इसके बाद घाटा व फायदा का सवाल आएगा। रेलवे टिकटों से लेकर विज्ञापन, पानी से लेकर हर मामले में कमाई करेगा और राज्य भरपाई करेगा, यह सवाल ज्यादातर लोगों के गले नहीं उतर रहा है।
भाजपा की ओर से पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा ने कहा कि कहीं भी प्रस्ताव में रेल सेवा बंद करने की बात नहीं कही गई है बल्कि नुकसान का जिक्र किया गया है जबकि तृणमूल राजनीतिक स्वार्थ के लिए गलत प्रचार कर रही है। उन्होंने कहा कि मैंने इस मामले पर संबंधित मंत्रलय से संपर्क किया है। प्रस्ताव में महज नुकसान का जिक्र है। यदि ऐसा ही है तो ममता रेलवे के नुकसान की भरपाई को लेकर कदम क्यों नहीं उठा रही हैं। जनता के हित की दुहाई देने वाली राज्य सरकार 50 फीसद खर्च वहन करने को क्यों नहीं तैयार हो रही है।
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