हस्तशिल्पकारों की जननी है ये मिट्टी



@प्रकाश पाण्डेय। कला एक परम्परा है और कलाकार मुक्ताकाश। सच मानिए तो सुकून आज भी गांव में ही है शहर तो गाड़ियों की भोभो और पोपो में बंधकर रह गई है। शहर की तुलना में गाँवों की आबो हवा आज भी स्वच्छ है और नव सृजन या प्राचीन संस्कृति का बचाव भी भारत की गाँवें ही कर रही है। शहर में तो महज रस्म अदायगी रह गई है। हो सकता है कि आप इस विचार को दरकिनार कर दे लेकिन कला और कलाकारों ने बखूबी इस बात को समझा है और उन्होंने खुद की समझ को रंगों के कटोरों में तूलिका के जरिए बयां भी किया है। देशभर के गांवों में आज कई अनाम कलाकार है जो लोक संस्कृति की रक्षा अपनी तूलिकाओं में रंग भरकर कर रहे हैं। उनकी कृतियों की एक झलक विचारों की गहराइयों में ले जाने के लिए काफी है और उनकी चित्रों में जिंदगी के अहसास और स्वच्छंदता के भाव नजर आते हैं।

पटचित्रों में जीवन के रंग समाए हैं। दीदी-नानी और माँ की जुबानी हम सभी ने पौराणिक कथाए खूब सुनी है लेकिन रंगों के बेहतर सामंजस्य से बने पटचित्र में पौराणिक कथाएं चित्रात्मक रूप में मौजूद उन कहानियों को अमर बनाती है जिनके मूल में हमारी संस्कृति होती है।

पश्चि म बंगाल की पटचित्रकारी यहां की लोक कला व संस्कृति का प्रतीक रहा है। पट्टे पर चित्रकारी करने वाले चितेरों को यहां पटुअस कहा जाता है। असल में पट शब्द की उत्पति संस्कृत शब्द पट्टा से हुई और इसका अर्थ है कपड़ा, यानि कपड़े पर रंगों से खींची जाने वाली सांस्कृतिक व दैविक आकृतियों को पटचित्र कहा गया और इस कला के माहिर कलाकारों की पूछ आज विश्वज स्तर पर है। आमतौर पर ये लोग प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं जो पेड़, पत्तों, फूलों और मिट्टी से बनाई जाती है। पटुअस सिर्फ चित्रकारी ही नहीं करते हैं बल्कि वो गाते भी हैं।

राज्य के पश्चि मी मेदिनीपुर जिले का एक गावं पटचित्रकारी के लिए विश्वं स्तर पर विख्यात है। गांव का नाम है नया गांव। इस गांव में लोक कला संसाधन केंद्र भी है जिसे चित्रातरू के नाम से जाना जाता है और यहां उन चित्रों व उत्पादों को प्रदर्शन के लिए रखा जाता है जिसे स्थानीय कलाकार बनाते हैं।

इस कला का जिक्र पुराणों, महाकाव्यों, प्राचीन साहित्यों और ऐतिहासिक ग्रन्थों में भी मिलता है। इन चित्रों में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, अजंता-एलोरा की ऐतिहासिक छाप भी देखने को मिली है और इस पटशिल्प के जानकार बताते हैं कि पहले पहल संथाल आदिवासियों ने इसकी शुरुआत की।

यह हिन्दू जनजातियों जैसे संथाल, होस, मुंडा, जुआंग्स और खेरिया में काफी लोकप्रिय था। इनके पूर्वज माने जाने वाले पिल्छू हराम और पिल्छू बुरही के सात बेटे और सात बेटिया थी जिन्होंने आपस में ही शादी कर ली और इस दौरान बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से ज्यादातर पटुअस ने बौद्ध धर्म भी अपनाया था। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए इनकी कला का इस्तेमाल किया गया और इसी दौरान इस कला की पहुंच बाली, जावा, श्रीलंका, मलेशिया और तिब्बत में तक हुई।

साल 2004 से बंगलानाटक डॉट कॉम करीब 230 कलाओं के लिए मार्केटिंग व ब्रान्डिंग का काम कर रही है। इसके संचालकों का उद्देश्य है कि किसी तरह से पटुअस चित्रकला का दुनिया भर में प्रचार-प्रसार हो और इस कला क्षेत्र से जुड़े कलाकारों को इस माध्यम के जरिया कुछ हासिल हो। वहीं नया गांव का आर्ट फॉर्म भी इनके आजीविका का एक मजबूत जरिया बन गया है। इस कला में भागीदारी की बात की जाए तो आदिवासी समुदाय की महिलाओं की संख्या ज्यादा है। देश में महिला सशक्तीकरण की बात होती है लेकिन यहां की महिलाएं खुद को नेतृत्वकर्ता की भूमिका में पेश कर रही है जो आने वाले कल के लिए एक शुभ संकेत है।

कोलकाता के साल्टलेक स्थित पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के मुख्यालय को केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से कला विकास व प्रचार-प्रसार के लिए साल 2005-2009 से ही पूरी सहायता मुहैया कराई जा रही है। वहीं यूरोपीय संघ समर्थित बंगलानाटक डॉट कॉम भी इस कला से जुड़े कलाकारों के स्तर को सुधारने व इनके कला विकास के लिए कई परियोजनाओं को संचालित कर रहा है साथ ही यूरोपीयन चित्रकारों और पटुअसों को एक मंच पर लाने की दिशा में नव कार्य प्रगति पर है। इतना ही नहीं पटुअस परिवारों का स्वास्थ्य बीमा भी करवाया गया है और पिंगला में संसाधन केंद्र स्थापित कर इनके विकास से जुड़ी योजनाओं को सुचारू रूप से संचालित किया जा रहा है। केवल पश्चििमी मेदिनीपुर में ही नहीं बल्कि पूर्वी मेदिनीपुर में भी पटुअस कलाकार है जो पट्टे पर प्राकृतिक रंगों के जरिए पटचित्रों को आंकते हैं। पटचित्र कलाकार चित्रकारी के अलावा पाटेर गीत भी गाते हैं जो यहां की अपनी अनूठी परम्परा का एक हिस्सा है। चित्रकारी के दौरान कलाकारों की जुबान पर लोक गीतें हुआ करती है जिन गीतों में सामाजिक संदेश और समकालीन घटनाओं का जिक्र देखने को मिलता है और इस परम्परा को पाटमाया कहा जाता है। इनकी स्वरों में विचार और समुदाय की समृद्ध के बोल होते हैं।


कोलकाता के साल्टलेक स्थित पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के परिसर में आयोजित हस्तकला प्रदर्शनी के दौरान पटचित्रकार तपन से मुलाकात के बाद कई नई चीजे जानने का मौका मिला। तपन पश्चिरमी मेदिनीपुर के नया गांव पिंगला के रहने वाले हैं और इनसे जब इनके सरनेम चित्रकार के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि चित्रकारी हमारा पेशा है और हमारे पूर्वज भी इसी सरनेम को लगाते रहे हैं इसके पीछे वजह यह रही है कि इससे ऊंच-नीच की भावना खत्म होती है और समानता स्थापित होती है। तपन के परिवार में सात लोग है और सभी इस काम में लगे हुए हैं। कमाई निर्धारित न होने की वजह से समस्या भी होती है। बंगलानाटक डॉट काम की तरफ से हमे अक्सर मौके व आर्थिक सहायता दोनों ही चीजें हासिल होती है। ये संस्था पूरे देशभर में आयोजित होने वाले कला प्रदर्शनियों से हमे जोड़ने का काम करती है। इसके साथ ही बाहर जाने पर संस्था की ओर से किराए के अलावा रहने खाने की भी व्यवस्था की जाती है। हमारे गांव के ज्यादातर लोग इसी काम में लगे हैं। गांव के विकास के लिए संस्कृति विभाग और बंगलानाटक डॉट काम की ओर से काम जारी है। संस्कृति विभाग से हमे हर माह एक हजार रुपए दिए जाते हैं। वहीं कई बार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पटचित्र के साथ गायन के लिए भी हमें पैसे मिलते हैं। पटगायन परम्परा हमें हमारे पूर्वजों से हासिल हुई है और इसमें हम रामायण, महाभारत की कथा को गीत के रूप में लोगों के सामने रखते हैं। गांव में 50 से ज्यादा मुस्लिम परिवार है जो सीधे तो पटचित्रकारी से नहीं जुड़े हैं लेकिन रंगों और कपड़ों का व्यवसाय करते हैं।

एक अन्य चित्रकार मौइना जो पूर्व मेदिनीपुर के चंडीपुर स्थित हीबी चौक गांव की रहनी वाली है, ने कहा कि उसके गांव में करीब 150 परिवार पटचित्रकारी में लगे हैं। आर्थिक पक्ष को लेकर सवाल पूछे जाने पर मौइना ने कहा कि लाभ की दृष्टि से हम ये काम नहीं करते हैं बल्कि इस काम में हमारा मन रमता है। हमारे पूर्वजों से हमें यह कला विरासत में मिली और हम इसे आगे बढ़ाने मे लगे हुए हैं। मौइना ने बिना पूछे ही बंगलानाटक डॉक काम का जिक्र करते हुए कहने लगी कि संस्था के मुखिया अमिताभ दा से हमे काफी सहयोग मिल रहा है और उनके प्रयासों का ही फल है कि हम आज समूचे देशभर में लगने वाली प्रदर्शनियों का हिस्सा बन रहे हैं। वहीं उसने पड़ोसी राज्य ओडिशा के पटचित्रकारी और पातचित्रकारी के बारे में भी बताया। उसके कहेनुसार ओडिशा के पुरी स्थित रघुराजपुर नामक कस्बे में आज भी उसके नाते-रिश्तेदार है जो इस काम में लगे हुए हैं और वहां करीब 150-200 परिवार इसी काम को करते हैं। मौइना ने बताया कि कपड़े पर बनने वाली रंगकृति को हम पटचित्र कहते हैं वैसे ही ओडिशा के रघुराजपुर में पातचित्र की परम्परा रही है जिसमें चित्रकारी के लिए पत्तों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। शुरुआत में पटचित्र ताड़ के पत्तों पर बनाए जाते थे। हालांकि बाद में कपड़े पर बनाए जाने लगे और अब तो हस्तनिर्मित कागज पर बनए जा रहे हैं।

इस चित्रकारी में इस्तेमाल होने वाली तूलिकाए गिलहरी या नेवले की पूंछ के बालों से बनते हैं। सौंदर्य की दृष्टि से तो ये मन को भाते ही है लेकिन पर्यावरण के हिसाब से भी ये अनुकूल होते हैं। चित्रों की बाहर की रेखाएं काले और लाल रंग से बनाई जाती हैं। फिर इनमे प्राकृतिक रंग भरे जाते हैं। मौइना के अनुसार ये रंग यह सुनिश्चिंत करते हैं कि दशकों बाद भी चित्रकारी की सुंदरता और चमक बानी हुई है। विषय की बात करे तो इसके मूल में धर्म और रोजाने की जिंदगी से जुड़े किस्से होते हैं। चित्र बनने के उपरांत गीत गाने की भी परम्परा है क्योंकि इसकी प्रस्तुति के दौरान कलाकार नृत्य और गीत के माध्यम से चित्रों का वर्णन करते हैं जिसे पाट खेलनो कहते हैं हालांकि परंपरागत रूप से पाटचित्र का प्रदर्शन पुरुष कलाकार और उनके परिवार के बच्चे ही करते थे। महिलाएं केवल उनके यात्रा की व्यवस्थाओं में लगी होती थी। लेकिन आज महिलाएं भी चित्रकारी कर रही है।

बात अगर यूरोपीयन यूनियन समर्थित बंगलानाटक डॉट कॉम की करें तो यह एक सामाजिक उद्यम है जो संस्कृति आधारित कार्यों को प्रोत्साहन देने का कार्य करता है। इसके मूल में महिलाओं, बच्चों और स्वदेशी दबी कलाओं व उन कलाओं से जुड़े कलाकारों की रक्षा और संरक्षण हैं।

जहां तक कला और संस्कृति की बात है तो बंगाल की संस्कृति शुरू से ही समृद्ध रही है और यहां की मिट्टी कुशल शिल्पकारों की जननी। यहां का हस्तशिल्प दुनिया भर में मशहूर है। आज भी कला के रचनात्मक वस्तुएं बनाकर यहां के शिल्पकार अपनी आजीविका चलाते हैं। ऐसे तो हस्तशिल्प का एक समृद्ध इतिहास है जो सदियों में विकसित हुआ है। यहां की सांस्कृतिक विरासत में यहां की सौंदर्य, गरिमा, रूप और शैली जैसी सभी चीजों का जोड़ मिलता है जो यहां की कला दुर्लभता और रहस्यपूर्ण स्वर में विराज करता है जिसे देख मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।

कोलकाता के साल्टलेक स्थित पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के परिसर में आयोजित हस्तकला प्रदर्शनी 2017 में पहुंचे हस्तशिल्पियों की कलात्मक कार्यों को देख परम्परावादी सांस्कृतिक दर्पण से आप इस कदर जुड़ेंगे कि इनकी विलक्षणता के कायल हुए भी नहीं रह सकेंगे। इनकी कृति में युगबोध और कलाबोध दोनों का दर्शन एक साथ होता है और अंत: मन से यदि आप इनकी कृतियों को निहारेंगे तो आपके लिए श्रेणी विभाजन मुश्किल होगा।

पश्चिकम बंगाल के पश्चिकमी मेदिनीपुर जिले के चांदकुरी गांव के रहने वाले असीत बारनजाना हाथों से बुनी गई उम्दा चटाई के लिए साल 1988 में तत्कालीन राष्ट्रपति आर० वेंकटरमण से सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। असीत बताते हैं कि उनके गांव में कुल 50 परिवार ऐसे हैं जो इस काम में लगे हुए हैं और चटाई बुनाई कर अपनी आजीविका चला रहे हैं। ज्यादातर कारीगरों को संस्कृति विभाग की ओर से समय-दर-समय आर्थिक सहायता भी मिलती है। इसके अलावा बंगलानाटक डॉट कॉम से भी कारीगरों को काम मिल रहा है और ये संस्था देशभर में कारीगरों की कृतियों का मार्केटिंग कर रही है। कुछ समय बात करने के बाद उनसे उस चटाई को दिखाने को कहा जिसके लिए उन्हें राष्ट्रपति सम्मान मिला था और कहते ही उन्होंने उस चटाई को निकाला जिसे देख वाकई मन प्रसन्न हो गया। सच तो यह है कि असीत की हस्त निर्मित कला की बेमिसाल कारीगरी का नमूना उन्हें दूसरों से एकदम अलग करता है।

इसके बाद चार कदम चलते ही पूर्व मेदिनीपुर के वैष्णव चौक कस्बा की रहने वाली संकारी हाजरा से मुलाकात हुई। संकारी भैसों की सिंग से रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजे बनाती है जैसे कंधा, चम्मच, छोलनी, चाभी की रिंग, सिन्दुरदानी इत्यादि। संकारी बताती है कि उनके गांव में करीब 100 परिवार हैं जो इस काम को करते हैं।

इसी तरह वहां से कैमरा उठा कर आगे बढ़ा ही था कि पास में ही मद्रासी शंखों से निर्मित हस्तकलाकारी देखने को मिली। विभिन्न आकृतियों में शंखों से बने सामान वहां आने वाले लोगों को खुद की तरफ आकर्षित करने के लिए काफी थे। कारीगर मोलिका मंडल से मिलने के बाद पता चला कि वो बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर की रहने वाली है और वो जिस गांव से वास्ता रखती है वहां का 200 परिवार इस काम से जुड़ा है। मोलिका बताती है कि शंख मद्रास से मंगाए जाते हैं और बाद में हाथों से इनकी आकृति काटी जाती है फिर जा कर नक्काशी होती है।

एक-एक कर उन कलाकारों से मिलता रहा जिनकी कलाकृतियां वाकई में लुभावनी थी और उन्हें अनदेखा करना मेरे बस की बात नहीं थी। इसी कड़ी में बांकुड़ा जिले के सोनामुखी गांव के रहने वाले श्रीकांत रूद्र से मुलाकात हुई। श्रीकांत विष्णुपुरी सिल्क साड़ियों की बुनाई करते हैं। इसके अलावा सूती और सिल्क मिक्स कर साड़ी बनाते हैं जिसकी मांग पूरे देशभर है। उनके गांव में करीब 300 परिवार इस काम में लगे हैं और वे लोग रंगों और पट्टों के हिसाब से साड़ियों की बुनाई करते हैं। साड़ियों की कीमत ज्यादा न होने की वजह से इसकी मांग हर वर्ग में समान होती है।

सत्यजीत चांद बांकुड़ा जिले के रामपुर छोटो कालीतल्ला के रहने वाले हैं और ल़कड़ी के खिलौने बनाते हैं। बांकुड़ा का काठ घोड़ा काफी लोकप्रिय है और हर प्रदर्शनी में उनके स्टाल पर काठ घोड़ों की मांग सबसे ज्यादा होती है। वो सालों अपने खिलौनों के साथ देश भ्रमण पर रहते हैं। जहां कही भी प्रदर्शनी लगती है वो वहां पहुंचते हैं और अपने काठ के खिलौनों से लोगों को मोहते हैं।

डोगराशिल्प के बारे में तो सभी जानते हैं। लेकिन इसकी खूबियों से कम ही लोग परिचित होंगे। आज इस कला और इसके कारीगरों की स्थिति ठीक नहीं है क्योंकि इसके खरीददारों की किल्लत पड़ गई है। इस काम में ज्यादा मेहनत की वजह से इसकी कीमत भी ज्यादा होती है और लोग निर्धारित कीमत पर खरीद करना पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में प्रदर्शनियों के जरिए इस कला को बचाने की मुहिम चल रही है। बांकुड़ा जिले के बिकाना शिल्पोडांगा के शिल्पकार बचन कर्मकार कहते हैं कि पहले की तुलना में लाभ अर्जित करना मुश्किल का सौदा हो गया है। इन मूर्तियों को बनाने में समय के साथ मेटेरियल में भी अधिक पैसे लगते हैं लेकिन खरीददार की किल्लत बनी रहती है। सुकून की बात यह है कि संस्कृति विभाग और बंगलानाटक डॉट कॉम से इन्हें सहयोग मिलता रहा है जिसकी बदौलत उनका और उनके साथ जुड़े दूसरे कारीगरों का काम चल जाता है।

उत्तर-24 परगना के विजयपुर निवासी बाबुल सरकार लकड़ियों से किचन में इस्तेमाल होने वाले सामान बनाते हैं और उनके अनुसार उनका माल आसानी से बिक जाता है। विजयपुर में ज्याजातर लोग इसी काम से जुड़े हैं और सभी अच्छा कारोबार कर रहे हैं।

खैर, कहते हैं कि कला कभी काल में नहीं मिटती वो तो काल के इतिहास को जीवित रखती है और कृतियां बीते कल को वर्तमान और भविष्य से जोड़ती है।

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