@संतोष यादव। ये कहानी है साहस की, धैर्य की, लीक से हटकर चलने की और जीत के लिए जिद की भी। उसका आत्मविश्वास ही उसे लड़ने की ताकत दे रहा है वरना वह कब की टूट चुकी होती। कैंसर बीमारी से माँ की मृत्यु हो चुकी है और पिता भी इसी बीमारी से लड़ रहे हैं। मजबूत दृढ़ इच्छाशक्ति इरादे वाली यह बेटी हम उम्र बेटियों के लिए प्रेरणा बनकर उभरी है।
आगरा जिले की मूल निवासी 24 वर्षीय जूही प्रकाश दलित परिवार से हैं। आगरा में ही इनके पिता नित्यप्रकाश का कारोबार है। जिसमें माँ जयंती देवी भी कभी हाथ बटाती थी। दो भाई एक बहन में जूही सबसे छोटी है। हर माँ -बाप का एक सपना होता है कि उनकी संताने आगे निकलकर उनका नाम रोशन करें। ऐसा ही एक सपना जूही के पिता ने भी लाडली बेटी के लिए देखा था। माँ चाहती थी कि बेटी डाक्टर बने और पिता उसे आईएएस और आईपीएस के रूप में देखना चाहते थे। इसके लिए नित्यप्रकाश ने कोई कोर कसर भी नही छोड़ी। हर वह माहौल उन्होंने बेटी को दिया। जूही ने भी उनकी उम्मीदें धूमिल नहीं होने दीं लेकिन परिस्थितियां राह का रोड़ा बनीं। बीडीएस में चयन होने के बाद जूही ने महज इसलिए प्रवेश नही लिया कि माँ कैंसर से पीड़ित है जिसे वह छोड़कर जा नही सकती। एमएससी, एमबीए की शिक्षा पूरी हुई तो वोडा कंपनी में जूही को कुछ बाद जॉब मिल गई। इस बीच पिता को कैंसर की बीमारी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। जूही ने एक बार फिर यह अवसर हाथ से आसानी से निकल जाने दिया और पिता के लिए कवच बनकर उनकी देखभाल में जुट गईं। कहते हैं कि भाग्य आगे आगे चलता है। जूही के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कैंसर से पीड़ित माँ जयंती देवी का इलाज लंबे समय तक चलता रहा। तीन ऑपरेशन भी हो चुके थे लेकिन सफलता हाथ नही लगी। मेदान्ता अस्पताल में इलाज के दौरान 23 दिसम्बर 2013 को उनकी मौत हो गई। माँ की मौत बाद जूही के सामने अंधेरा छा गया। इसी के साथ बेटी को डाक्टर बनाने का उनका सपना भी मर चुका था। कम उम्र में ही मां खोने का दंश झेल रही जूही उस सदमे से उबर भी नही पायी थीं कि पिता को भी कैंसर की बीमारी के लक्षण चिकित्सकों ने बताए तो मानों उसके पांव तले की जमीन ही खिसक गई। अब उसके सामने छाया अंधेरा और घना हो चुका था। असमय माँ को खो चुकी जूही पिता को खोना नही चाहती थी। पिता के लिए लड़ने का मन बनाया। हिम्मत जुटाई, उन्हे लेकर दिल्ली गई। जहां एम्स के चिकित्सकों ने कैंसर होने की पुष्टि की। अब जूही की मुश्किलें और भी बढ़ गईं। मां की बीमारी से आर्थिक कठिनाइयों में परिवार पहले से ही था, इस दौरान नोटबंदी भी हुई थी। उधारी के सारे रास्ते बंद थे। इस सबका सीधा असर नित्यप्रकाश के इलाज पर पड़ रहा था। कहीं से जूही को पता चला कि इन सब बीमारियों के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से भी मदद मिलती है। पहले तो प्रधानमंत्री को अपनी मदद के लिए ट्वीट करना शुरू किया लेकिन जब रिसपॉन्स नही मिला तो तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव को ट्वीट किया। नोटबंदी दौरान पिता के इलाज के लिए जूझती जूही का दर्द अखबारों की सुर्खियां बन चुका था। अखिलेश यादव ने जूही के प्रकरण को संज्ञान लेते छह लाख रुपये की आर्थिक मदद उसे दौरान की थी। जरूरत के समय मिली मदद जूही के परिवार के लिए संजीवनी साबित हुई। पिता का समय पर इलाज हुआ आज वे स्वस्थ हैं। अखिलेश यादव द्वारा मिली इस मदद ने जूही को समाजवादी बना दिया। कल तक नौकरी करने का सपना देखने वाली जूही अब समाज के लिए जीना चाहती है। उनके लिए कुछ करना चाहती है। उसका मानना है कि नौकरी में रहकर सिर्फ अपने लिए ही कर पाऊंगी। अब कुछ अलग करना है। समाज में परिवर्तन लाने के लिए लाचारी, बेचारी दूर करने के लिए संघर्ष ही एक रास्ता है। वह राजनीति से बहुत इत्तेफाक नही रखती लेकिन समाजनीति राष्ट्रनीति करने की पक्षधर है। इसके लिए उसने तीन माह पूर्व ही “मेरी पहल” नाम से एक संगठन बनाया जिसके बैनर तले महिलाओं को जोड़ना शुरू किया। सामाजिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय की इस लड़ाई को लेकर वह आगे बढ़ी तो कारवां भी बढ़ता गया। आज मेरी पहल से लगभग दो हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। बकौल जूही ‘‘जहां भी गलत हो रहा हो उसके खिलाफ आवाज उठाना मेरी शुरू से आदत रही है चाहे वह घर परिवार ही क्यों न रहा हो, गलत सुनना नही, गलत सहना नही, गलत करना नही, गलत होने नही देना, यही संकल्प है मेरा। इसके लिए मुझे चाहे जिससे लड़ना पड़े। मुझे जानने वाले जानते हैं कि जूही जिद्दी है जो ठान लिया पूरा करके ही रहती है।’’ मेरी पहल नामक संगठन का मकसद महिलाएं जागरूक हां, उन्हे उनका हक मिले, शोषण बंद हो, भ्रष्टाचार खत्म हो। इस अभियान को लेकर इस संगठन के लोगों द्वारा जूही के नेतृत्व में आज भी महिलाओं को सरकारी योजनाओं की जानकारी देने, लाभ दिलाने, साफ सफाई के साथ शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है। जूही के इस लड़ाकू तेवर को देखते हुए उत्तर प्रदेश सफाई मजदूर संघ ने अपनी लड़ाई लड़ने के लिए अपने संगठन में उन्हे उपाध्यक्ष बनाकर अपना नेता चुना है। जूही भी उनकी आवाज बनीं और आगरा के नगर निगम में संविदा पर फर्जी तरीके से हुई 16 नियुक्तियों के खिलाफ न सिर्फ हल्ला बोला बल्कि भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए। मां-बाप से मिले संस्कारों ने जूही के अन्दर इन्सानियत कूट कूट कर भरी है। वह हर किसी के मदद को तत्पर रहती है। वह पशु प्रेमी भी है। घर में ही खरगोस, कुत्ता, बिल्ली, तोता, कबूतर, बकरी भी पाल रखा है। यही नही सड़क पर कहीं भी लावारिश घायल अवस्था में मिले पशु पक्षियों के इलाज की व्यवस्था संभालती है। जूही द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों के इस सफर में बाधाएं डालने वाले चेहरे भी आए। धमकियां भी मिलीं। परदे के पीछे आरोप भी लगे, उलाहने भी मिले लेकिन जूही का दृढ़ आत्मविश्वास ही रहा कि वह विचलित नही हुई। घर परिवार समाज में संघर्षों से जूझ रही जूही अपने रास्ते खुद तय कर रही है। उनके पिता नित्यप्रकाश को भी ऐसी बेटी पर गर्व है। वह कहते हैं बेटियों को नजरअंदाज करने वाले नासमझ ही होते हैं। बेटियां बेटों से कम नही हैं। आज वह बेटी के प्रयासों से गदगद हैं।
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