• कलकत्ता की सड़क पर पुलिस की गोलियों से छलनी कर दिए गए 13 कुनबे। सियासत ने बलिदान ली, नाम मिला शहीद का।
@प्रकाश पाण्डेय, कोलकाता। सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है यह एक अपने आप में वीभत्स विचारधारा है और जब तक यह वीभत्स विचारधारा जीवित है, तब तक इसके गर्भ से खौफ और दानव ही उपजेंगे। खुद के खिलाफ उठने वाली आवाजों को खामोश करने और सर्वनाश रूपी अमानवीय खेल के लिए वामपंथी विशिष्ट शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं जिसे पार्टी की सफाई कहते हैं। अंग्रेजी में पर्ज भी कहा जाता है इसका अर्थ है सफाई करना।
बंगाल में वाम शासनकाल विकासहीनता और अराजकता के लिए जाना गया। आपातकाल के खात्मे के साथ ही बंगाल में वाम सत्ता का उदय हुआ लेकिन सत्ता की सियासत में आम को इस कदर दरकिनार किया गया कि संघर्ष की एक ऊंची दीवार खड़ी हो गई। 90 के दशक तक चिंगारी रूपी विरोध ने विशाल आकार लेना शुरू कर दिया। वाम पार्टियां अब आंदोलन रहित जोर जबर की सियासत में विश्वाास करने लगी थी। चारों ओर हरमाद वाहिनी के डंडे चल रहे थे। चुनावों में धांधली सरेआम हो चली थी। मतदाता मतदान केंद्रों तक तो जाते थे लेकिन मताधिकार से वंचित रह जाते थे। वजह सियासी क्लबियां खौफ और उनको पालने वाले सत्ताधारी पार्टी के मंत्री व बड़े नुमाइंदे थे।
चुनावों में आए दिन हो रही धांधलियों के खिलाफ लोगों की आवाज अब बुलंद होनी शुरू हो गई थी। सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ सड़कों पर आए दिन जुलूस निकाले जाने लगे। विरोधकर्ताओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा था। ममता बनर्जी इस खेमे का प्रतिनिधित्व कर रही थी। कई बार उन्हें भी पुलिस की लाठी का शिकार होना पड़ा।
साल 1991 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चा को भारी जनादेश मिला और विपक्षी पार्टियों की ओर से धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। बंगीय सियासत के जानकार बताते हैं कि इस जीत के साथ ही विपक्ष का संघर्ष तेज होने लगा था। सड़क पर जुलूस और प्रदर्शन हो रहे थे और आखिरकार 21 जुलाई 1993 को ममता बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस युवा विंग की ओर से विरोध प्रदर्शन किया गया। उस समय ममता राज्य युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थी और राज्य में वाम सत्ता स्थापित थी। प्रदर्शन में शामिल लोग फोटो पहचान पत्र की मांग कर रहे थे और उनका मानना था कि यदि फोटोे पहचान पत्र के जरिए मतदान होगा तो निष्पक्षता सुनिश्चि त होगी।
सुबह के 11 बजे होंगे, रैली में शरीक लोगों की भीड़ आगे बढ़ रही थी तभी सचिवालय से एक किलोमीटर दूर एस्प्लेनेड मेट्रो सिनेमा के पास मेयो रोड और डारिना रोड क्रासिंग पर पुलिस ने हस्तक्षेप किया। लेकिन उफानी भीड़ रूकने को तैयार नहीं थी और इतने में पुलिस की ओर से गोलियां चलनी शुरू हो गई। जिसका नतीजा यह हुआ कि मौके पर ही 13 लोगों ने दम तोड़ दिया और सैकड़ों की तादाद में लोग जख्मी हुए।
कलकत्ता शहर के तत्कालीन पुलिस आयुक्त तुषार तालुकदार के अनुसार, विरोध की सम्भावनाओं को देखते हुए उन्होंने राइटर्स बिल्डिंग और राज भवन के पास पुलिस बलों को तैनात कर रखा था। सीआरपीसी की धारा 144 के तहत एक निषेध आदेश मेयो रोड क्रॉसिंग से आगे लागू कर दिया गया था। अलग-अलग कर तीन जगहों से रैली निकली थी। ममता बनर्जी के नेतृत्व में में आ रही रैली के लोग टी-बोर्ड के पास एकदम से उग्र होने लगे थे। जबकि मेयो रोड के पास एक अन्य समूह कथित तौर पर नियंत्रण से बाहर हो गया था। बाध्य होकर पुलिस को गोली चलानी पड़ी।
घटना के बाद मीडिया से मुखातिब हुए तालुकदार ने दावा किया था कि वह गोलीबारी से अनजान थे। जब पत्रकारों ने उनसे सवाल किया कि कैसे एक जूनियर अधिकारी गोलीबारी का आदेश दे सकता है और पुलिस ने क्यों तय मानदंडों का उल्लंघन किया के जवाब में उन्होंने महज यह कह कर चुप्पी साध ली थी कि पूछताछ होगी। लेकिन सवाल उठता है कि उग्र स्थिति में यदि गोली चलाने की नौबत आई ही तो क्यों सिने में गोली दागी गई पैरों में भी तो मारी जा सकती थी।
उक्त घटना के बाद कलकत्ता पहुंचे उस समय के केंद्रीय गृह मंत्री एस. बी चव्हाण ने राज्य सरकार को इस पूरे घटनाक्रम की न्यायिक जांच करने का आदेश दिया था। लेकिन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने किसी भी जांच का आदेश नहीं दिया। इतना ही नहीं उन्होंने पुलिस के कार्यों का समर्थन करते हुए कहा था कि राइटर्स बिल्डिंग के घेराबंदी के प्रयासों को रोकने में पुलिस ने अच्छा काम किया है। हालांकि बाद में एक कार्यकारी जांच की गई थी। कंवलजीत सिंह, राइटर्स बिल्डिंग के संयुक्त प्रभारी सीपी डारिना क्रॉसिंग की घटना की जांच कर रहे थे, जबकि डी.सी वाजपेयी ने मेयो रोड की घटनाओं की जांच की। 21 साल बाद इन अधिकारियों ने जांच आयोग को बताया कि कलकत्ता पुलिस मुख्यालय लालबाजार और राइटर्स बिल्डिंग से फाइलें गुम हो गई है।
एक तरफ वाम सरकार इस मामले को दबा रही थी वहीं दूसरी तरफ इस गोलीकांड के बाद ममता बनर्जी बंगाल की दुर्गा बन कर उभरी। गोलीकांड में ममता भी बुरी तरह से जख्मी हुई थी उनके साथ लोगों की सहानुभूति बढ़ती जा रही थी। साल 1997 में ममता ने किन्हीं वजहों से कांग्रेस छोड़ कर खुद की पार्टी बनाई, जिसका नाम तृणमूल कांग्रेस रखा गया। देखते ही देखते दीदी बंगाल के युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गई। उनके साथ विशाल युवा वर्ग आ जुड़ा और विपक्ष की नेता बन गई। आखिरकार साल 2011 में ममता के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने भारी मतों से जीत दर्ज करते हुए बंगाल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। सत्ता में आने के बाद हर साल 21 जुलाई को तृणमूल कांग्रेस की ओर से कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शहीद दिवस रैली का आयोजन किया जाने लगा जो आज भी जारी है।
ममता बनर्जी 2011 में मुख्यमंत्री बनी उन्होंने मई 2011 को 21 जुलाई 1993 के पुलिस फायरिंग की जांच के लिए उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशांतो चट्टोपाध्याय की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया। अधिकांश नेताओं ने आयोग के सामने बयान दिए, जिसमें माकपा के राज्य प्रमुख बिमान बोस और पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी शामिल थे। बुद्धदेव घटना के दौरान ज्योति बसु सरकार में सूचना एवं सांस्कृतिक मामलों के मंत्री थे और कोलकाता पुलिस के प्रभारी भी। वहीं 26 फरवरी 2014 को अपने 50 मिनट के बयान में भट्टाचार्य ने गोलीबारी को उचित ठहराया था और कहा था कि उस समय सिद्धांन्तिक रूप से मुझे न्यायिक जांच की आवश्यकता महसूस नहीं हुई थी और मैं अब भी अपने उस फैसले पर कायम हूं। फरवरी 2014 में, पांच पूर्व पुलिस अधिकारियों को पैनल के सामने दो बार पेश होना पड़ा। इसमें तुषार तालुकदार (तत्कालीन पुलिस आयुक्त), डी. सी वाजपेयी (तत्कालीन अतिरिक्त सीपी), आर. के जोहरी (पूर्व संयुक्त सीपी), एन. के सिंह (पूर्व डीसी-दक्षिण) और कंवलजीत सिंह (राइटर्स के प्रभारी तत्कालीन संयुक्त सीपी) शामिल थे। 1993 में गृह सचिव रहे मनीष गुप्ता जो बाद में सत्तारूढ़ राज्य मंत्रिमंडल में मंत्री हो गए थे ने कहा कि वह पुलिस गोलीबारी के खिलाफ थे।
20 फरवरी को तीन सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारियों, दिनेश वाजपेयी, आर. के जोहरी और नवल किशोर सिंह द्वारा दायर एक याचिका पर आयोग ने 28 जनवरी को उन्हें नोटिस देने को चुनौती दी, हालांकि कलकत्ता उच्च न्यायालय ने नोटिस पर रोक लगा दी। यह पिछले 2011 के अपने फैसले के अनुसार था कि आयोग अन्य सभी गवाहों के बयान को पूरा करने के बाद ही तीन पूर्व आईपीएस अधिकारियों को बुलाने के लिए कह सकता है।
इसके बाद पैनल ने 350 गवाहों को सुना और अप्रैल 2014 तक अपनी रिपोर्ट पेश करने की मंशा जतायी। पीड़ित निम्न-मध्यम वर्ग के परिवार से थे और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। इसी को देखते हुए आगे चलकर आयोग ने मृतकों के परिजनों को 25-25 लाख और घायलों को 5-5 लाख रुपए के मुआवजे का निर्देश दिया।
गौर हो कि मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी पिछले 23 सालों से 21 जुलाई को शहीद दिवस के रूप में मनाती आ रही हैं, जिसमें राज्य के सभी जिलों से हजारों की संख्या में लोग शरीक होते हैं और इस दिन दीदी पीड़ित परिवारों को आर्थिक मदद भी देती है। इसे एक तरह से तृणमूल का शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है।
प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए 21 जुलाई 1993 को शहीद हुए 13 कांग्रेस कर्मियों के नाम इस प्रकार है- श्रीकांत शर्मा, दिलीप दास, बंधन दास, असीम दास, मुरारी चक्रवर्ती, केशव बैरागी, विश्वरनाथ राय, कल्याण बनर्जी, प्रदीप राय, रतन मंडल, रनजीत दास, अब्दुल खालिद और एक का नाम पता नहीं चल सका।
यदि 21 जुलाई के इतिहास पर नजर डालें तो कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। 21 जुलाई 1658 को औरंगजेब ने अपने अनौपचारिक राज्याभिषेक का जश्नय मनाया था। वहीं 21 जुलाई 1883 को कोलकाता में भारत के पहले सार्वजनिक थियेटर हॉल स्टार थियेटर की शुरुआत हुई थी। 21 जुलाई 1884 को लॉर्ड्स के मैदान पर पहला क्रिकेट टेस्ट मैच खेला गया था। 1904 में इसी दिन 13 साल तक चले निर्माण कार्य के बाद रूस ने 4607 किलोमीटर लम्बी ट्रांस साइबेरियन रेल लाइन का काम पूरा हुआ था और इसी दिन साल 1920 मेंं रामकृष्ण परमहंस की धर्मपत्नी शारदा मां का निधन हुआ था। 21 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखा था। 1947 में इसी दिन भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रीय ध्वज को मंजूरी दी थी। लेकिन, इन सारी घटनाक्रमों से ज्यादा महत्वपूर्ण है साल 1993 का 21 जुलाई, क्योंकि इस दिन कोलकाता पुलिस की गोलियों की बौछार ने 13 लोगों की जान ले ली थी। यह दिन बंगाल व देश के इतिहास में काले दिन के रूप में अंकित हो गया और शहीदों के सम्मान में ममता बनर्जी की 21 जुलाई की महारैली एक परम्परा सी बन गई।
सोमेन मित्रा, वरिष्ठ कांग्रेस नेता - 21 जुलाई 1993 की रैली युवा कांग्रेस की ओर से आयोजित की गई थी। मैं उस समय राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष था और घटना के दिन पार्टी के काम से दिल्ली गया था। सूचना मिलते ही उलटे पैर कोलकाता लौट आया और घटना की पूरी जानकारी ली। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और केंद्र सरकार ने राज्य सरकार से उक्त मामले की जांच कराने और रिपोर्ट सौंपने की बात कही थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मारे गए लोगों को न्याय नहीं मिल सका। बाद में जब ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल सरकार सत्ता में आई तो कमिशन बना, लगा कि अब इस मामले में कुछ होगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वाम सरकार में होम सेक्रेटरी रहे मनीष गुप्ता तृणमूल में शामिल हो गए और मुख्यमंत्री ने उन्हें मंत्री बनाया दिया। इतना ही नहीं जांच रिपोर्ट में जो कुछ सामने आया उसे भी पेश नहीं किया गया और मनीष गुप्ता यह कह कर बच निकले की वो इस गोलीकांड से दुखी थे। आज उन्हें राज्यसभा सांसद बना दिया गया है। हर साल शहीद दिवस मनाकर रैली करने से कुछ नहीं होना जाना। आरोपियों को जब सजा मिलेगी तभी न्याय होगा। लेकिन इस सरकार से आशा नहीं है।
सुजन चक्रवर्ती, माकपा विधायक - साल 1993 के 21 जुलाई को क्या घटना घटी, उस घटना के लिए कुसूरवार कौन है? इसकी जांच के लिए तृणमूल सरकार की ओर से कमिशन का गठित कर जांच करवाई गई लेकिन उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया। अगर उस रिपोर्ट में वाकई कुछ होता, जिससे बाजार गर्म किया जा सकता तो ये सरकार जरूर सार्वजनिक करती। लेकिन उस रिपोर्ट में ऐसा कुछ है ही नहीं। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सारे दावे धरे के धरे रह गए। तत्कालीन वाम सरकार में होम सेक्रेटरी रहे मनीष गुप्ता आज मुख्यमंत्री के विश्वा सपात्र हैं और राज्यसभा में तृणमूल सांसद भी। रही बात मरने वाले निर्दोष थे या दोषी इसके निर्धारण के लिए ही तो कमिशन बना। मैं अगर कुछ कहूंगा तो उससे आप संतुष्ट नहीं होंगे। लेकिन जो लोग रैली में शरीक हुए थे वो हिंसा फैलाने वाले थे और सचिवालय पर कब्जा करने आए थे। खैर, शहीद दिवस के दिन मंच पर टॉलिवुड के कलाकार गाते हैं नाचते हैं, न तो इसे हम शक्ति प्रदर्शन मानते हैं और न ही शहीद दिवस। ये तो एक फंशन है।
अब्दुल मन्नान, नेता विपक्ष (कांग्रेस), पश्चिम बंगाल विधानसभा - राइटर्स अभियान के दौरान ममता बनर्जी युवा कांग्रेस की अध्यक्ष थीं और उनके नेतृत्व में रैली का आयोजन किया गया था। इस प्रदर्शन में 13 निर्दोष कांग्रेसी कार्यकर्ता पुलिस की गोली का शिकार हुए थे। इस दिन कांग्रेस पार्टी और पार्टी की समस्त इकाई संस्थाओं की ओर से शहीद दिवस मनायी जाने लगी। बाद में ममता पार्टी छोड़ कर खुद की पार्टी बनाई और उनके पास अपना तो कुछ था नहीं इसलिए 21 जुलाई को शहीद दिवस मनाने की घोषणा कर हमारे शहीदों पर ही अधिकार जमा लिया। आज शहीद दिवस का आयोजन महज एक फेस्टीवल बन कर रह गया है। जिनके आदेश पर गोलियां चली वही बाद में इस सरकार में मंत्री बने और अब राज्यसभा सांसद है। घटना में लिप्त आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कुछ नहीं हुआ। ममता 13 लोगों को मरवाकर सत्ता प्राप्त करना चाहती थी उनका ये सपना पूरा हो गया।
शम्भू ओझा- वरिष्ठ तृणमूल नेता, उत्तर हावड़ा - 21 जुलाई 1993 को बसु सरकार ने सारी हदें पार कर दी थी। भले ही प्रदर्शन कर रहे कांग्रेसी कार्यकर्ता पुलिस की गोलियों से मरे लेकिन गोलियां बसु सरकार ने ही चलवाई थी। उस दौरान मेरी उम्र 35 साल होगी, एक कम्पनी में काम करता था और युवा कांग्रेस में उत्तर हावड़ा क्षेत्र का अध्यक्ष बनाया गया था। हावड़ा अंचल में उस समय के माकपा नेता प्रभाष साधु खां और उज्जवल बनर्जी का खौफ चलता था। पर मैं थोड़ा लड़ाकू किस्म का था और बिना किसी से डरे कांग्रेस का झंडा थामे सड़क पर चलता था। इन दोनों माकपा नेताओं को भी पता था कि वो मुझ से पार नहीं पा सकते थे। कई बार तो इन लोगों ने मेरे एक-दो साथियों को बिना वजह संगीन जुर्म में फंसाया था। जिसके लिए मुझे लंबी लड़ाइयां लड़नी पड़ी। 21 जुलाई को ममता दीदी के नेतृत्व में सचिवालय घेराव की सूचना डबसन रोड़ स्थित पार्टी कार्लायल में मुझे दी गई। 1991 के विधानसभा चुनाव में लाख घपलों के बावजूद लड़ झगड़ कर हमने अपना विधानसभा चुनाव जीता था और अशोक घोष विधायक बने थे। इस इलाके में एक बड़ा युवा वर्ग ऐसा था जो हर मोर्चे पर जंग के लिए तैयार रहता था जैसे ही हमें सूचना मिली तैयारियों में जुट गए और 21 जुलाई को हावड़ा से जुलूस लेकर स्ट्रैंड रोड किसी तरह पहुंचे ही थे कि वहां भारी संख्या में पुलिस बल हमे रोकने के लिए तैयार थी। मैं सामने था इस वजह से जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया तो मुझे हाथ और चेहरे पर चोट आई। हाथ पुरी तरह से सूज चुका था पर मैं डटा रहा। कई साथियों के सिर फटे थे। ज्यादातर प्रदर्शनकारी पुलिसिया लठ की खौफ से भाग चले थे जो नहीं भागे वो मार खा कर अस्पताल पहुंचे। पुलिस का घेरा इतना मजबूत था कि हम सचिवालय तक नहीं पहुंच पाए। डरिया रोड और मेयो की घटना तो अखबारों में छपी लेकिन स्ट्रैड रोड की घटना भी दिल दहला देने वाली थी क्योंकि आंखें बंद कर के लाठियां बरसाई जा रही थी।
विमान बोस, वरिष्ठ माकपा नेता - वाम मोर्चा के चेयरमैन विमान बोस ने आयोग के समक्ष कहा था- मैं राज्य सरकार का हिस्सा नहीं था और न ही राइटर्स बिल्डिंग। पत्रकारों को पता है कि 34 साल में मैं कितनी बार राज्य सचिवालय का दौरा किया। घटना के दौरान मैं शहर में नहीं था लेकिन अखबारों में इस घटना के बारे में पढ़ा।
बुद्धदेव भट्टाचार्य, पूर्व मुख्यमंत्री - बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आयोग के समक्ष दर्ज अपने बयान में कहा था- 21 जुलाई 1993 के आंदोलन का उद्देश्य राइटर्स पर हमला और कब्जा करना था जो अलोकतांत्रिक तरीका था जिसके परिणाम स्वरुप 70-80 पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि पुलिस गोलीबारी से नहीं बच सकी, लेकिन राइटर्स पर हमले को रोकने के लिए कार्रवाई एक मजबूरी थी। वहीं उन्होंने कहा था कि कांग्रेस नेतृत्व का एक हिस्सा अशांति पैदा करने के लिए आंदोलन पर नाखुश था। राज्य सचिवालय को कब्जे से बचाने के लिए कार्रवाई आवश्यक था।
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