@संतोष यादव लखनऊ। नेहा BHU किसी परिचय की मोहताज नही है।सम सामयिक एवं समाजिक सरोकार विषय पर उनकी लेखनी चलती रहती है।बीएचयू की छात्रा नेहा खुले विचारों वाली लड़की है,वह हर मुद्दे पर मुखर रहती है।उन्होंने सवाल उठाया है कि पुरुषों के अनावश्यक नग्नता वाली पोशाक में घूमने पर जो लोग या पुरुष ये कहते है कि कपड़े नही सोच बदलो.... उन लोगो से उन्होंने उनकी इस सोच पर कुछ सवाल खड़े किये है।
1) हम सोच क्यों बदले?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपने लोगो की सोच का ठेका लिया है क्या??
2) आप उन पुरुषों की सोच का आकलन क्यों नहीं करते?? उसने क्या सोचकर ऐसे कपडे पहने की उसका सीना, पीठ, जाँघें इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक निर्लज्ज लड़का चाहता है कि पूरा नारी समाज उसे देखे, वहीं एक सभ्य लड़का बिलकुल पसंद नहीं करेगा कि कोई उसे देखे।
3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये..... हत्या ,डकैती, चोरी, बलात्कार, आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों???
4) कुछ लड़के कहते है कि हम क्या पहनेंगे ये हम तय करेंगे....नारी नहीं..... जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करे....लेकिन हम नारियाँ भी किस लड़के का सम्मान/मदद करें, ये भी हम तय करेंगे, पुरुष नहीं.... और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे.. इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे
5)फिर कुछ विवेकहीन लड़के कहते हैं कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की..... जी बिल्कुल आज़ादी है, ऐसी आज़ादी सबको मिले, महिलाओं समेत हर व्यक्ति को चरस गांजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो, गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो, पुरुष वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो, पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से हर व्यक्ति को आज़ादी हो।
6) फिर कुछ नास्तिक पुरुष कुतर्क देते हैं कि जब नग्न शंकर या शिवलिंग की पूजा भारत में होती है तो फिर हम पुरुषों से क्या समस्या है?? पहली बात ये कि शिवलिंग से तुलना ही गलत है। और उस शिव का साक्षात्कार कोई घंटा नहीं कर पाया है। शिव तो सोमरस यानी भी शराब भी पीते हैं तो तुम बेवड़े लड़कों की हम पूजा करें?? शिव तो पर्वत में एकांतवास करते हैं...तुम लड़के तो समाज में समस्या जन्म देते हो...... और शिव से ही तुलना क्यों??? सभी देवता अल्प वस्त्रों में या ऊपरी हिस्सा बिना ढंके दिखते हैं..तो क्या तुम लोगों को भी देवता मान लें
7)लड़कियों को संस्कारों का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित पुरुष समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा कि क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़का अपनी बहिन या माँ के आगे अपने निजी अंगों का प्रदर्शन बेशर्मी से करे??? क्या ये लड़कें महिलाओं को माँ/बहन की नज़र से देखते हैं ??? जब ये खुद महिलाओं को मां-बहन की नज़र से नहीं देखते तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहते हैं कि "हमें बाप/भाई की नज़र से देखो" कौन सा बाप-भाई अपनी बहन बेटी के आगे नंगा होते है???.
सत्य ये है कि अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दुकान है। और इसका उत्पादन पुरुष समुदाय करता है। मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशों में एक नशा अश्लीलता(सेक्स) भी है। गार्गी ने गार्गी संहिता में सेक्स को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है, और पुरुषों को इससे दूर रहने की सलाह दी है। तो वही कोलम्बिया जर्नल ऑफ जेन्डर एण्ड लॉ के लिए एलेक्ज़ेड्रा ब्रॉडस्की ने एक स्टडी की जिसमें उन्होंने स्टेल्थिंग की पीड़ित लड़की का इंटरव्यू किया, स्टेल्थिंग जैसी घटनाएं पुरुषवादी मानसिकता को दिखाती हैं। यह घटनाए दिखाती है कि कहीं न कहीं हम आज भी स्त्री को भोग का साधन मानते हैं। यह उस सड़ी हुई और विकृत मानसिकता का प्रतीक है जिसमें यह माना जाता है कि पुरुष महिला पर अपने बल का प्रयोग कर सकता है और उसे डॉमिनेट कर सकता है।
अगर पुरुषों की नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर पुरुष अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देते???? क्यों हिंदी फीचर फिल्मो में अर्ध नग्न होकर घूमते पूर्ण घुमे फिर तो? क्यों नही पुरुष नंगे होकर गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।
नारी कहा दोषी हैं ??बस अपने स्वार्थ के लिए पुरुष उसे दोषी मानकर कटघरे में नंगा खड़ा कर देता है?
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