रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 22 अप्रैल 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल में पहली मई से होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव अब तय तारीखों के मुताबिक नहीं होंगे। नई तारीख पर होने वाले मतदान को लेकर किसे, कितना फायदा पहुंचेगा ? राज्य में लोगों में इस बारे में चर्चा शुरू हो गई है। लोगों की ओर से कहा जा रहा है कि क्या एक मई से होने वाले मतदान और उसके बजाए बाद में होने वाले मतदान में क्या फर्क होगा ? क्या इसके कारण राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे जिसका चुनावी नतीजों पर असर पड़ेगा या यह प्रिवर्तन बेअसर रहेगा ?
मालूम हो कि राज्य में सत्ता संभालने के बाद वाममोर्चा सरकार ने सत्ता के विकेंंद्रीयकरण का काम जोरशोर से शुरू किया था। त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था लागू किए जाने की देश-विदेश में प्रशंसा हुई और परिणामस्वरूप भूमिहीन लोगों को जमीन का मालिक बनने का मौका मिला। इसका असर यह रहा कि 34 साल तक राज्य में कम्युनिस्टों की तूती बोलती रही। लेकिन शुरुआती सफलता के बाद पंचायतों की हालत ठहर सी गई थी, जिस उद्देश्य से सत्ता का विकेंद्रीयकरण किया गया था, उसका फायदा लोगों के बजाए कुछ लोगों को मिलने लगा।
पंचायत चुनाव को लेकर कई लोगों की ओर से पूछा जा रहा है कि अदालत में मामला करने के कारण पंचायत में विरोधियों को कुछ फायदा होगा ? एक दिन नामांकन दाखिल करके क्या वे लोग चुनाव नतीजों पर भारी असर डाल सकेंगे ? अनूव्रत मंडल के वीरभूम जिले में उनके एकछत्र राज्य की नींव हिलेगी ? बगैर किसी मुकाबले के दो जिला परिषद, कई पंचायत समितियां और ग्राम पंचायतों पर तृणमूल पहले ही जीत का परचम लहरा चुकी है, उसे नोंच कर फेंक सकेंगे ? इसका कारण यह है कि अदालत ने विरोधियों को ज्यादा खुश होने का मौका नहीं दिया है। सिर्फ एक दिन नामांकन और चुनाव में कुछ दिन का समय दिया है, जबकि कई लोगों का कहना है कि सारी चुनावी प्रक्रिया दोबारा शुरू हो तब भी नतीजों पर असर पड़ने की संभावना नहीं है। गौरतलब है कि विरोधी दलों की ओर से राज्य चुनाव आयोग की ओर से एक दिन नामांकन के लिए बढ़ाने के बाद उसे रद्द करने और राज्य में सरकारी मशीनरी की हिंसा के विरोध में शिकायतें की गई थी। लेकिन अदालत की ओर से राज्य चुनाव आयोग को नामांकन का दिन बढ़ाने के साथ नई तारीखों पर चुनाव करवाने के लिए आदेश दिया। इसके अलावा ऐसा कुछ नहीं है, जिससे विरोधियों को खुशी मिल सके।
हावड़ा स्टेशन पर शनिवार को कुछ लोगों से बातचीत की तो ज्यादातर लोगों का कहना था कि गुजरात-बिहार-पंजाब-राजस्थान समेत किसी भी राज्य में जहां पंचायत चुनाव होते हैं केंद्रीय सुरक्षा बल के जवान तैनात किए जाते हैं। कई लोगों की ओर से कहा गया कि 2008 के पंचायत चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने जितने उम्मीदवार खड़ा किए थे, उतने अकेले भाजपा नामांकन पहले ही कर चुकी है। क्या भाजपा की शक्ति आठ साल पहले तृणमूल के बराबर है ? क्या वह कोई जिला परिषद जीत सकेगी ? तब इतने लोगों ने नामांकन कैसे कर दिया ? रविवार को हावड़ा के चुनाभाटी बाजार में कई लोगों ने चुनाव के बारे में बातचीत करने पर पूछा कि करीब सात साल के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जंगल महल से लेकर दुआर्स, दार्जीलिंग, पहाड़ से लेकर सुंदरवन तक जो विकास किया है, इसका कोई जवाब है ? चूनाभाटी इलाके में ही 30 साल तक गलियों में गड्ढे, कच्चा रास्ता दिखता था, जहां अब पक्का रास्ता बन चुका है। यही हाल राज्य के सभी गांव-देहात में दिख रही है। कन्याश्री से लेकर सबुज साथी जैसे सैकड़ों जनहितकारी योजनाएं लोगों तक पहुंची हैं। सस्ते में चावल, शुद्ध पेयजल, रास्ते, स्कूल-कालेज, अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्रों की हालत ऐसे बदल सकती है, 10 साल पहले लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था।
कई लोगों का कहना है कि राज्य में भाजपा अभी तृणमूल से मीलों दूर पीछे है। वह अपने समर्थकों में हार से होने वाली निराशा के बचाने के लिए तमाम तरह के टोटके कर रही है। हालांकि कई लोगों ने कहा कि माकपा-कांग्रेस बुरी तरह से हिम्मत हार चुकी हैं, जिसका फायदा भाजपा को मिल रहा है। दोनों दलों को मिलने वाले वोट भाजपा को मिलेंगे। नामांकन में दूसरा स्थान हासिल करने के बाद नतीजों में भी वही होगा। लेकिन तृणमूल की ओर से जैसे सवा लाख लोगों ने नामांकन किया है, वहीं भाजपा के 35 हजार तो नतीजों में भी यही अनुपात रहेगा।
पंचायत चुनाव में देरी पर व्यंग्य करते हुए कुछ लोगों ने कहा कि टीवी के पर्दे पर ऐसे-ऐसे नेता दिखने लगे, जिसे लोग भूल चुके थे। माना जा रहा है कि यह उनकी उपलब्धि है।
https://www.indiainside.org/post.php?id=2435