डॉ• डी•एम• मिश्र।
माँ की कोख और वह भूमि जिस पर आदमी धरती पर गिरता है कभी बिसरा नहीं पाता। चाहे वह कितना ही बड़ा अथवा महान क्यों न हो जाय। फिर त्रिलोचन जी तो एक संवेदनशील कवि थे। वह कैसे भूल पाते। उनकी एक कृति भी है- ‘‘उस जनपद का कवि हूँ।’’ सुलतानपुर उनका आना-जाना अक्सर लगा रहता था लेकिन बाद के दिनों में वह बेटों के पास रहने लगे थे तब यह सिलसिला कुछ थम सा गया था। वर्ष 2004 में कमला नेहरू संस्थान की ओर से ‘‘त्रिलोचन-सम्मान समारोह’’ आयोजित किया गया, जिसमें वह पधारे थे और यही अपने गृह जनपद में उनका अंतिम आगमन भी था। उस दिन संस्थान के अतिथि- गृह में वह ठहरे थे। लोग बड़ी आत्मीयता के साथ उनसे मिल रहे थे। मैं भी उनका दर्शन-लाभ पाने के लिए वहाँ पहुँचा। उनका आशीर्वाद लिया। मुझे अपना भरपूर स्नेह देते हुए पहले तो हालचाल पूछा फिर मुस्कराते हुए कहा- भाई आपके नाम में यह जो ‘मल’ शब्द है वह ठीक नहीं है। उसे ‘मल्ल’ होना चाहिए। पर अब आप क्या करेंगे। माँ-बाप तो बिना सोचे-समझे कभी-कभार उल्टे-पुल्टे नाम रख देते हैं। मेरा भी बचपन का नाम बासुदेव सिंह था मेरे गुरु आचार्य देवीदत्त ने उसे बदलकर ‘त्रिलोचन’ कर दिया। तब से मैं त्रिलोचन हो गया। यह बातें चल ही रही थी कि किसी ने आकर सूचना दी कि त्रिलोचन जी अब चलिये- सभागार में लोग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। त्रिलोचन जी जैसे ही मंच पर आये, संस्थान के सभागार में जुटा हुजूम अपने गौरव पुरुष का करतल ध्वनि से अभिनंदन व स्वागत करके धन्य हुआ। सभी संवर्ग मौजूद-छात्र, प्राध्यापक, अधिकारी, अधिवक्ता, अन्य गणमान्य नागरिक। सबके हृदय में एक ही उत्कंठा। एक ही चिर-प्रतीक्षित उपलब्धि की आशा। आगत का स्वागत। जैसे ही इस महान् सरस्वती पुत्र ने माँ की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित किया। लगा एक प्रकाश पुंज से पूरी कुशनगरी ज्योतिर्मान हो उठी। समूची हिन्दी जाति। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो• सत्य प्रकाश मिश्र ने कहा कि मैं तो त्रिचोलन जी का दर्शन करने आया था। उनसे मिलकर अभिभूत हूँ। त्रिलोचन जी के समक्ष स्वयं को हिन्दी का मात्र एक छात्र मानते हुए बस इतना ही कह सकता हूँ कि त्रिलोचन जी ने हिन्दी को जितने नये शब्द दिये हैं, शायद ही किसी और कवि ने दिये हों। हिन्दी, बोलियों की भाषा है। बोलियां, हिन्दी को शक्ति प्रदान करती है। त्रिलोचन जी भाषा के प्रयोग के कवि हैं। काव्यानुशासन के प्रति वह गंभीर है। अनेक सजग कवियों ने उनसे सीखा है। त्रिलोचन जी ने ‘अक्षर’ को अक्षर बनाया। बड़ा कवि वह होता है जो सहज भाषा में अपने अद्वितीय अनुभव लिखता है। तत्सम शब्दों का प्रयोग भाषा को समेटता है। त्रिलोचन जी की कविता का जिक्र करते हुए डा• मिश्र ने कहा कोहरे और बादलों का चित्र बहुतों ने बनाया होगा, पर जो चित्र उनकी पुस्तक ‘धरती’ में देखने को मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसलिए कि उनका अनुभव आरोपित नहीं है। जीवित अनुभव है। त्रिलोचन जी अपराजेय संकल्प के कवि हैं। हिन्दी के स्वाभिमान के कवि हैं। त्रिलोचन जी कभी भी अपने ऊपर किसी प्रकार का बोझ नहीं लदने दिया। दिल्ली से आये प्रोफेसर डा• अजय तिवारी ने त्रिलोचन के साथ वर्षो दिल्ली में बिताये अपने अन्तरंग क्षणों को बोधक ढंग से व्यंजित किया। डॉ• अजय ने कहा- तब मैं हिन्दी का विद्यार्थी हुआ करता था और त्रिलोचन जी से हिन्दी सीखने का अवसर तलाशता था। त्रिलोचन जी के समक्ष, उनके साहित्य पर बोलना बड़ा कठिन है। सच तो यह है कि त्रिलोचन जी पर बात करना अपनी परंपरा को खोजना है त्रिलोचन जी के लिए ज्ञान, श्रम-प्रक्रिया का अभिन्न अंग है। सार्थक कवि निर्विवाद नहीं होता। आदर और घृणा दोनों मिलता है। अत्याचारी तारीफ करे तो शक होता है। त्रिलोचन का व्यक्तित्व, अपना ही रहा है। उन्होंने स्मरण कराया कि मनुष्य के रूप में प्रकृति ने चेतना प्राप्त की है। ‘जनतांत्रिक मूल्यों’ की अनदेखी समाज को विषाक्त करता है- जिसमें वर्ण और वर्ग, साम्प्रदायिक सद्भाव और स्त्री यानी आधी दुनिया। कविता के ये प्रमुख घटक भी है। त्रिलोचन की भाषा का उल्लेख करते हुए डा• तिवारी ने कहा कि यूं तो वह विश्व की अनेक भाषाओं के ज्ञाता हैं, लेकिन कविता में उनकी भाषा, किसान की भाषा है, त्रिलोचन की भाषा है। वह विराट कवि हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर डा• अवधेश प्रधान ने कहा- त्रिलोचन के कारण सुलतानपुर की मिट्टी में संस्कार मिला। त्रिलोचन ने बड़े-बड़े कवियों को संस्कार सिखाया। उनका हठ, उनका जीवन किसान का है। जो कहीं कठोर मिट्टी तोड़ रहा है और कहीं ऊसर धरती को उर्वर बना रहा है। उन्होंने कविता का ‘रहस्य लोक’ खत्म करके उसे आम आदमी के करीब लाया। ‘‘मैं और तुम’’ उनकी एक विशेष कविता है। उन्हें लोग छोटे निराला कहते हैं, पर वह ‘निरालाग्रस्त’ नहीं। डा• सदानन्द शाही ने कहा कि त्रिलोचन की कविता में अलगाववाद को तोड़ने की शक्ति है। उन्होंने त्रिलोचन जी की कई कृतियों का हवाला देते हुए स्वयं को उनके सम्मुख हिन्दी का छात्र बताया। डॉ• राधेश्याम सिंह और कमल नयन पाण्डेय ने भी कई प्रसंग याद दिलाये। और जब त्रिलोचन जी श्रोताओं के सम्मुख उपस्थित हुए तो मानो छियासी वर्षीय युवा तेज अपनी दोपहरी को छू रहा हो। आर्शीवाद की मुद्रा। मुख पर मुस्कान। धीरे से चुटकी ली। मैं अच्छा नहीं बोलता। इसलिए आपको आनन्द आयेगा। जितना हल्कापन हो, जीवन उतना ही प्रवाहपूर्ण होता है। यद्यपि आज लोग साहित्यकार का परिहास करके सुखी होते हैं। तुलसी ने भी ऐसा महसूस किया है। ‘रामचरितमानस’ के प्रारम्भ में खल की वंदना की है। त्रिलोचन जी ने ‘वेद’ और ‘कालिदास’ के हवाले से कई बड़े प्रसंगों की चर्चा की। उन्होंने कहा अपने दोष पहचानने वाला कवि, सबसे बड़ा होता है। अपने गांव को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा- मुझे चिरानी पट्टी से कुछ प्यार न होता/अगर जन्म लेने में मैं लाचार न होता। लोगों के विशेष आग्रह पर उन्होंने अपनी कविताएं सुनायीं। अगर तुम्हारा नेह/बराबर मुझे मिलता तो/ जीकर समझी हुई कहानी/कुछ सांसों में सुना सकूंगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जिला परिषद अध्यक्ष बाबू राज किशोर सिंह ने अपने चिरपारिचित अंदाज में त्रिलोचन जी को पुनः आने का न्यौता तो दे डाला पर वह नियति को मंजूर नहीं था। अपने जीवन के आखिरी सालों में वह 2002 से तकरीबन 5 साल अपनी छोटी पुत्रबधू श्री मती उषा सिंह के साथ हरिद्वार में रहे और 2007 में ज्यादा तबीयत खराब होेने के कारण अपने छोटे पुत्र अमित प्रकाश सिंह के पास गाजियाबाद आ गये थे । यही पर 9 दिसम्बर 2007 को उनका निधन हो गया।
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