परिश्रम व पराक्रम की प्रतीक होती है पगड़ी – बिरेन्द्र सिंह मस्त



कोलकाता, 25 अगस्त। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की धुरी है | देश की कुल श्रम-शक्ति का लगभग 70 प्रतिशत भाग कृषि एंव इससे संबंधित उद्योग-धंधों से अपनी आजीविका कमाता है। ब्रिटिश काल में भारतीय कृषक अंग्रेजों एवं जमींदारों के जुल्म से परेशान एंव बेहाल थे। स्वतन्त्रता के बाद उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ किन्तु जिस तरह कृषकों के शहरों की ओर पलायन एवं उनकी आत्महत्या की खबरें सुनने को मिलती हैं उससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी स्थिति में आज भी अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है जिससे कृषक अपने बच्चों को आज कृषक नहीं बनाना चाहता |
भारतीय कृषक बहुत कठोर जीवन जीता है। अधिकतर भारतीय कृषक निरंतर घटते भू-क्षेत्र के कारण गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। दिन-रात खेतों में परिश्रम करने के बाद भी उन्हें तन ढकने के लिए समुचित कपड़ा नसीब नहीं होता। ठंड हो या गर्मी, धूप हो या वर्षा उन्हें दिन-रात बस खेतों में ही परिश्रम करना पड़ता है। इसके बावजूद भी उन्हें फसलों से उचित आय नहीं हो पाती। बड़े-बड़े व्यापारी कृषकों से सस्ते मूल्य पर ख़रीदे गए खाद्यान्न, सब्जी एंव फलों को बाजारों में ऊँची दरों पर बेच देते हैं। इस तरह कृषकों का श्रम लाभ किसी और को मिल जाता है और किसान अपनी किस्मत को कोसता है। नि:संदेह तंत्र इसके लिए जिम्मेदार है।
एक ओर से देखा जाए तो किसानों की ऐसी दयनीय स्थिति का एक कारण यह भी है कि भारतीय कृषि मानसून पर निर्भर है और मानसून की अनिश्चितता के कारण प्रायः कृषकों को कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। समय पर सिंचाई नहीं होने के कारण भी उन्हें आशानुरुप फसल की प्राप्ति नहीं हो पाती। ऊपर से आवश्यक उपयोगी वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण कृषकों की स्थिति और भी दयनीय हो गई है तथा उनके सामने दो वक्त की रोटी की समस्या खड़ी हो जाती है। कृषि में श्रमिकों की आवश्यकता साल भर नहीं होती इसलिए साल के लगभग तीन-चार महीने कृषकों को खाली बैठना पड़ता है जिससे कृषको के गांव से शहरों की ओर पलायन में वृद्धि हुई है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुपालन का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है। स्पष्ट है कि देश का अधिकांश पशुधन, आर्थिक रूप से निर्बल वर्ग के पास है। भारत में गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूकर तथा मुर्गी का पालन किया जा रहा है। भारत दुग्ध उत्पादन, अण्डा उत्पादन तथा मांस उत्पादन में स्थान रखता है। यही कारण है कि कृषि के सहायक में पशुपालन एक बेहतर मित्र समान है। इस तरह पशुपालन माध्यम से ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करने तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को ऊँचा उठाने की अपार सम्भावनायें हैं।

भारतीय किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है और वो आज भी गरीब, अशिक्षित और शक्तिहीन है। उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उसके परिवार के सदस्य भी दिन-रात खेत-खलिहान में जुटे रहते हैं। बड़ी कठिनाई से वह अपना और अपने बाल-बच्चों का पेट भर पाता है। हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने हमें “जय जवान, जय किसान” का नारा दिया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने “जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान” का नारा दिया। यह हमारे किसानों के महत्व को रेखांकित करता है परन्तु अभी भी उनकी हालत दयनीय है। उनकी इस दशा को सुधारने के लिए हर संभव प्रयत्न किए जा रहे हैं। किसानों की उन्नति और विकास पर ही देश की समृद्धि टिकी है।

उत्तर प्रदेश के भदोही से भारतीय जनता पार्टी के सांसद व भारतीय किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिरेन्द्र सिंह मस्त का तय कार्यक्रमों के तहत कोलकाता आना हुआ। बैरकपुर में आयोजित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मूर्ति अनावरण कार्यक्रम का हिस्सा बने व बतौर मुख्य व विशेष अतिथि उपस्थित हुए। ज्ञात हो राज्य किसान मोर्चा अध्यक्ष रामकृष्ण पाल की अगुवाई में आयोजित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मूर्ति का अनावरण भारतीय किसान मोर्चा अध्यक्ष द्वारा किया गया।

वहीं प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उन्होने ममता बनर्जी की सरकार पर प्रहार करते हुए कहा कि किसानों के प्रति संवेदनशील नहीं है राज्य सरकार व जानबूझ कर अनजान बनी हुई है। केंद्र सरकार ने किसानों के लिए धान की खरीद दर 1640 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है मगर बंगाल के किसानों को केवल 1000 रुपये की दर मिल रहा है। बाकी के 640 रुपये तृणमूल काँग्रेस के दलाल मिलीभगत से हजम कर रहे हैं। साथ साथ बंगाल के जूट किसानों की स्थिति ज्यादा खराब है। राज्य सरकार की नाकामी को उजागर करने के लिए आगामी 30 सितम्बर को कोलकाता में एक प्रतिवाद रैली का आयोजन किया जाएगा। देशभर में किसानों की समस्या के समाधान के लिए किसान संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा। केंद्र सरकार किसानों के प्रति बेहद संवेदनशील है। आज़ादी के बाद यह पहली सरकार है जो गाँव और किसानों के लिए 42 फीसदी बजट विभिन्न योजनाओं पर खर्च कर रही है जिसमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री सड़क योजना आदि शामिल हैं।

एक विशेष मुलाकात पर उन्होने बताया कि खेती पर लागत बढ़ने का एक कारण परिवार का टूटना भी है। एक जगह होने वाली खेती टुकड़ों टुकड़ों में होने लगी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज ऐसे ही नहीं इस मुकाम पर पहुँचे हैं। वे अपने त्याग और तपस्या के बल पर हम सभी का नेतृत्व कर कहे है, न मात्र देश बल्कि समूचे अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी उनके महत्व को देखा व समझा जा सकता है। उन्होने हमारे समाज के सभी जातियों को एकता के धागे में पिरोया है। एकता ही हमारे परिवार की ताकत है। एकता ही हमे बल प्रदान करती है। उन्होने पगड़ी पर बोलते हुए कहा कि “परिश्रम व पराक्रम की प्रतीक होती है पगड़ी”।

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