---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 20 मई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक शासन करने वाली माकपा को हाल के पंचायत चुनाव में जिला परिषद में एक भी सीट नहीं मिल सकी है। पंचायत समिति में 16 जिलों में दहाई का आंकड़ा भी दल पार नहीं कर सका है। इसी तरह, ग्राम पंचायत की कुल मिलाकर 31 हजार 802 सीटों में कूचबिहार और वीरभूम जिले में 10-10 सीटें भी हासिल नहीं हुई है। सीटों के मामले में भले ही भाजपा दूसरे स्थान पर रही हो, लेकिन चार जिलों में दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सकी है। राज्य चुनाव आयोग से मिली सूचना के मुताबिक पश्चिम बर्दवान जिला पंचायत समिति में भाजपा का खाता भी नहीं खुला है। जबकि इस जिले से दल का सांसद बाबुल सुप्रीयो केंद्रीय मंत्री है। इस जिले की 66 सीटों में तृणमूल को 65 पर जीत मिली है। माकपा को एक सीट पर जीत मिली है।
पंचायत समिति के 16 जिलों में माकपा को 10 सीटें भी नहीं मिली हैं, उन जिलों में कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर चौबीस परगना, हावड़ा, हुगली, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा, पूर्व बर्दवान, वीरभूम, अलीपुरदुआर, झारग्राम और पश्चिम मेदिनीपुर जिला शामिल है। राज्य के 20 जिलों में महज चार जिलों में माकपा को 10 से ज्यादा सीटें मिली हैं। जबकि 2003 में पंचायत समिति की वाममोर्चा को 6294 सीटें मिली थी। इसके बाद 2008 में 4894, 2013 में 2829 सीटें मिली थी। लेकिन 2018 में महज 129 सीटें मिली हैं।
अगर बीते 15 साल के पंचायत चुनावके नतीजे देखें तो पता चलता है कि माकपा का ग्राफ नीचे की ओर जाता रहा है तो दूसरी ओर भाजपा का ग्राफ ऊपर की ओर जाता रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 2003 में भाजपा को 362, 2008 में 439, 2013 में 197 और अब 756 सीटें मिली हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस को 2003 में 815, 2008 में 2019, 2013 में 5306 और 2018 की पंचायत समिति में 4888 सीटें मिली हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि मतदान सिर्फ 6123 सीटों पर ही हुआ है।
इसी तरह के नतीजे ग्राम पंचायत में भी देखने को मिल रहे हैं, जहां बीते 15 साल के दौरान माकपा के वोटों का प्रतिशत नीचे की ओर जाता रहा है। जबकि भाजपा के वोट बढ़ते रहे हैं। उत्तर चौबीस परगना जिला माकपा का गढ़ माना जाता रहा है, जहां लाल के मुकाबले दूसरे दलों का हाल बेहाल हो जाता था। लेकिन हाल में संपन्न पंचायत चुनाव में जिला परिषद की 45 सीटों में 34 पर माकपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। इससे ही दल की हालत का पता चलता है। महानगर से सटे राज्य के इस महत्वपूर्ण जिले में दूसरे जिलों की तरह तृणमूल कांग्रेस का बोलबाला रहा है। जिला परिषद की 57 सीटों में नौ पहले ही निर्विरोध जीतने के बाद चुनाव में 48 पर तृणमूल ने जीत हासिल की है। इस तरह जिला परिषद की सारी की सारी सीटें तृणमूल कांग्रेस की झोली में गई हैं। जबकि 2013 के पंचायत चुनाव में माकपा को 16 और भाकपा को चार समेत वाममोर्चा को जिले में 20 सीटें मिली थी। इस बार वाममोर्चा की ओर से 45 सीटों के लिए माकपा के 38, फारवर्ड ब्लाक के 5, भाकपा के दो उम्मीदवार थे। सभी सीटों पर पराजय, 34 पर जमानत जब्त और 40 साल से कब्जे में रही देगंगा की 36 नंबर जिला परिषद 36219 वोटों से पराजित होना जिले की उल्लेखनीय घटना रही।
हालांकि नामांकन को लेकर हुई अनियमितताओं को लेकर अदालत में मामला करने में माकपा अग्रणी रही है। चुनाव के दिन हिंसा और मतगणना में अनियमितताओं को लेकर दल की ओर से एक बार फिर अदालत की शरण ली जा रही है। सूत्रों ने बताया कि सुप्रीम कोट में चल रहे मामले में इसे शामिल करवाने के लिए अलीमुद्दीन स्ट्रीट पार्टी मुख्यालय ने जिला स्तर पर रिपोर्ट तलब की है। राज्य कमेटी की 23-24 मई को होने वाली बैठक में सारा ब्योरा लेकर आने के लिए कहा गया है। जिला सचिवों को 16 सूत्रीय प्रश्नोत्तरी भेज कर त्रिस्तरीय पंचायत में कहां, कितना नामांकन किया गया और कहां, किस वजह से नहीं किया जा सका विस्तृत तौर पर बताने के लिए कहा गया है। इसके साथ ही पुलिस थानों और आयोग में की गई शिकायतों का ब्योरा भी मांगा गया है। पंचायत चुनाव में मिली शर्मनाक पराजय के बाद राज्य नेतृत्व पोलितब्यूरो की बैठक में क्या कहेगा, इस बारे में भी लोगों की निगाहें लगी हैं।
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