---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 22 मई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल में जिला परिषद में एक परंपरा रही है कि अध्यक्ष का पद विरोधी दल के उम्मीदवार को दिया जाता रहा है। लेकिन इस साल के पंचायत चुनाव में हुगली के साथ ही हावड़ा जिले में भी विरोधियों का पूरी तरह से सफाया हो गया है। इसलिए 1977 से चली आ रही परंपरा समाप्त हो रही है। इस बार अध्यक्ष पद पर कोई विरोधी नहीं होगा।
मालूम हो कि अध्यक्ष पद जिला परिषद के कर्माध्यक्ष के बराबर का माना जाता है। उसके तहत ग्यारह सदस्यीय कमेटी होती है। कमेटी में करीब पांच लोग चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं, जबकि बाकी जिला परिषद के मुख्य वास्तुकार व दूसरे अधिकारी होते हैं। कहा जाता है कि पंचायत कानून में ही अध्यक्ष के चुनाव के बारे में कहा गया है। जिला परिषद ही नहीं, पंचायत और पंचायत समितियों के कामकाज पर निगरानी करने का काम भी अध्यक्ष के दायरे में आता है। पंचायत और समिति में किसी तरह की गलती होने पर वे सुझाव देते हैं। इसके अलावा अध्यक्ष हर महीने कमेटी के सदस्यों के साथ बैठक भी करते हैं।
सूत्रों के मुताबिक पंचायत और पंचायत समिति की ओर से क्या काम किया गया, इसका ब्योरा इकट्ठा करने के साथ ही जिला परिषद की त्रैमासिक बैठक में उसका विवरण पेश करना भी अध्यक्ष के जिम्मे रहता है। इस रिपोर्ट के आधार पर ही परिषद पंचायत और समिति पर नियंत्रण कायम रखती है।
इस बारे में पूछे जाने पर हावड़ा जिला परिषद के निवर्तमान सहायक सभाधिपति अजय भट्टाचार्य का कहना है कि समझ में नहीं आ रहा है क्या करना होगा। इस बारे में पंचायत व ग्राम विकास विभाग की ओर से जो कहा जाएगा, वही किया जाएगा।
हालांकि पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी का कहना है कि विरोधी दल के नेता को अध्यक्ष बनाना कानून में कहीं नहीं लिखा गया है, यह एक प्रथा रही है कानून नहीं। अगर विरोधी दल का कोई उम्मीदवार विजयी नहीं होता है, तब जीतने वाले दल का उम्मीदवार ही उस पद पर बैठाया जाएगा। इसके साथ ही उनका कहना है कि अगर विरोधी दल का कोई व्यक्ति अध्यक्ष पद पर रहता है तो उसकी ज्यादा गरिमा होती है और पंचायत व्यवस्था पर नजर रखने वालों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।
गौरतलब है कि 1977 से लेकर 2013 तक हावड़ा जिला परिषद पर वाममोर्चा का कब्जा था। तब हमेशा विरोधी दल के उम्मीदवार को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया जाता था। इसके तहत 2008 में तृणमूल कांग्रेस के अजय भट्टटाचार्य को अध्यक्ष बनाया गया था। जिला परिषद पर तृणमूल का कब्जा होने के बाद 2013 में विरोधी दल की नेता माकपा की अपर्णा पुरकायत को यह पद दिया गया था।
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