---हरेन्द्र शुक्ला, वाराणसी, 31 मई 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
● बीएचयू : केंद्र को पता ही नहीं, पुस्तक हो गई लोकार्पित!!
विविधता को समग्रता में समझने के लिए जनपदों का अध्ययन जरुरी है। यह बात बीएचयू भारत अध्ययन केन्द्र में बुधवार को भोजपुरी अध्ययन केन्द्र की वर्ष 2017 में तत्कालीन समन्वयक प्रो• सदानंद शाही द्वारा संपादित "जनपदीय अध्ययन की भूमिका" पुस्तक का लोकार्पण करते हुये बतौर मुख्य अतिथि वाइसचांसलर प्रो• राकेश भटनागर ने कही। उन्होने कहा कि इस केंद्र को इस प्रकार कार्य करना चाहिए कि पूरे विश्व से भारत के विषय में जिज्ञासु अध्येता भारतीय ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, जीवन दर्शन और कला इत्यादि से परिचित होने यहाँ आएँ।
प्रो• कमलेशदत्त त्रिपाठी ने कहा कि जनपदों का अध्ययन वास्तव में समूचे भारत का अध्ययन है उन्होंने कहा कि भारत में जो जनसमूह सत्ता से वंचित हैं और हाशिए पर हैं जनपदीय अध्ययन उन्हें सत्ता में भागीदार बनाता है।
विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो• अवधेश प्रधान ने कहा कि बीसवीं सदी के आरम्भ में जब भारत ने अपने को सभी क्षेत्रों में जानना शुरू किया उसी दौर में भारत को जानने की प्रविधि के रूप में जनपदीय अध्ययन का विकास हुआ।
अध्यक्षता करते हुए कला संकाय प्रमुख प्रो• उमेश चन्द्र दुबे ने जनपदीय अध्ययन और लोकभाषाओं में निहित ज्ञान, कला कौशल की महत्ता पर विस्तार से चर्चा की।
इस अवसर आयुर्वेद संकाय के प्रो• वी के जोशी, संस्कृत संकायप्रमुख प्रो• चंद्रमा पांडेय, प्रो• युगल किशोर मिश्र, डॉक्टर विजय शंकर शुक्ल, प्रो• मृदुला सिन्हा, प्रो• शुभा राव, हिंदी विभागाध्यक्ष अशोक सिंह, प्रो• विद्योत्तमा मिश्रा, प्रो• बलिराज पांडेय, प्रो• आफताब अहमद आफाकी, विश्वविद्यालय की चीफ प्राक्टर प्रो• रोयना सिंह सहित शोधछात्र-छात्रायें मौजूद रहे।
कार्यक्रम का आरम्भ समृता यादव, बाबी यादव और सौम्या वर्मा द्वारा प्रस्तुत कुलगीत गायन से हुआ। भारत.अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो• सदाशिव कुमार द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन डॉ• अमित पांडेय ने किया।
● मामला भोजपुरी अध्ययन केन्द्र का
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अब पुस्तक लोकार्पण का भी खेल होने लगा है। ताजा मामला भोजपुरी अध्ययन केंद्र का है। बीएचयू भोजपुरी केन्द्र द्वारा प्रकाशित 'जनपदीय अध्ययन की भूमिका' पुस्तक का 30 मई 2018 को भोजपुरी अध्ययन केन्द्र में नहीं करके भारत अध्ययन केन्द्र के सहयोग से बतौर मुख्य अतिथि कुलपति प्रो• राकेश भटनागर ने उसके ही सभागार में लोकार्पित किया।
सूत्र बताते हैं कि लोकार्पण के आयोजको ने भोजपुरी केंद्र को न तो सूचित किया और न ही उससे अनुमति ली गई। भोजपुरी अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल ने इस पूरे प्रकरण से कुलपति को अवगत कराया है।
मिली जानकारी के अनुसार यह पुस्तक भोजपुरी अध्ययन केंद्र के आर्थिक सहयोग से पूर्व समन्वयक प्रो• सदानंद साही के संपादन में अगस्त 2017 में प्रकाशित की गई थी लेकिन सितंबर 2017 में उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। इसके बाद हिन्दी विभाग के प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल की 3 वर्ष के लिए समन्वयक के रूप में नियुक्त करने के साथ ही 3 सदस्यीय एक शोध क्रियान्वयन समिति का गठन किया गया। नियमत: केंद्र के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित पुस्तक व पत्रिका पर केंद्र/विभाग का पूरा अधिकार होता है जिसे समन्वयक /अध्यक्ष को, अपने सहयोगियों के साथ, संचालित करना होता है। समन्वयक के जाने के साथ ही पुस्तक पर से उसका अधिकार भी चला जाता है और अगर पूर्व समन्वयक को कोई गतिविधि करनी भी होती है तो उसके लिए वर्तमान समन्वयक की सहमति आवश्यक होती है।इस प्रकरण में वर्तमान समन्वयक की बगैर सहमति के, अथवा उनकी उपेक्षा करके, चुपचाप पुस्तक का लोकार्पण करवाना तरह तरह के विवाद को जन्म देने जैसा रहा। ऐसे आयोजन से तरह तरह की चर्चाओं को बल मिलता है जो सांस्कृतिक निर्माण के लिए कहीं से भी उचित नहीं है।
कायदे से तो कुर्सी से हटते ही कुर्सी को भूल जाना चाहिए लेकिन कुर्सी का मोह छूटे तब न!! तब ठीक ही कहा गया है--कुर्सी मोह जो न करावे!!
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