वाराणसी। परंपराओं के पोषक देश भारत में जीवन के हर पक्ष पर परंपराओं की अमिट छाप है। पुरातनता के साथ आधुनिकता का मेल इसे अनुठा बनाता है। कला पक्ष भी इससे अछूता नहीं है। इसकी तुलना में रुस की कलाओं को परखें तो उस पर ब्रिटिश प्रभाव का स्पर्श नजर आता है। इस लिहाज से देखें तो न केवल रुस बल्कि दुनियां के सभी देशों के मुकाबले यह बढ़त नजर आती है और भारतीय कला - संस्कृति को समृध्दि बनाती है। परंपराओं की छाप भारतीय कला - संस्कृति को अनूठा बनाती है।
भारतीय कला संस्कृति से प्रभावित होकर रुस की तातियाना बिजीकोवा काशी चली आई। तातियाना काशी हिंदू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय में बीएफए में प्रवेश लेकर भारतीय कला - संस्कृति की बारिकियों को सीख रहीं हैं। अक्सर तातियाना बनारस की मस्ति देखने के लिए शहर के विभिन्न अडियों पर पहुँच कर लोगों से भारतीय कला संस्कृति की विशालता की कहानी सुनने का शौक रखती है। इसी क्रम में तातियाना से मुलाकात अस्सी स्थित पप्पू चाय की अडी पर होती है। बातचीत का सिलसिला शुरु होता है , तातियाना बताती है कि वह गत तीन वर्ष से बीएचयू दृश्य कला संकाय से भारतीय कला संस्कृति के पक्षों को सीखकर कैनवास पर तूलिका से रंग भर रहीं हैं। कहती है कि मैं चित्रकारी के अलावा अद्वैत वेदांत और कश्मीर शिविज्म से बहुत प्रभावित हूं और उसका मैं अध्ययन भी कर रही हूं। माँ गंगा से खासे प्रभावित तातियाना का मानना है कि गंगा भारतीय संस्कृति और लोगों की जीवन रेखा हैं।
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