बंद हो गया देश का पहला पंजाबी दैनिक ‘देश दर्पण’



--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।

हिंदी के प्रसिद्ध अखबार ‘जनसत्ता’ और दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाले पंजाबी दैनिक ‘अजीत’ से जुड़ने से पहले पंजाबी के पहले माने जाने वाले अखबार ‘देश दर्पण’ से जुड़ने का मौका मिला और दो साल तक मैने वहां बतौर संपादक का काम किया। हालांकि यह 25 साल पुरानी बात है। तब पंजाबी का यह अखबार कंप्यूटर तक नहीं पहुंचा था और कंपोजिटर ज्यादातर हिंदी भाषी बिहार और उत्तर प्रदेश के रहने वाले भाषा से अंजान थे। लेकिन उनमें काम करने की लगन थी और पूरी शिद्दत के साथ काम करते थे। एक दिन तो ऐसा हुआ कि संपादकीय विभाग का कोई भी आदमी किसी कारणवश नहीं पहुंच सका, लेकिन फिर भी अखबार प्रकाशित हुआ। हालांकि कंपोजिटरों ने शिखर सम्मेलन की एक खबर को मुख्य खबर के तौर पर छाप दिया, उन्हें लगा कि यह सिखों से संबंधित खबर है।

‘देश दर्पण’ का प्रकाशन 1930 से शुरू हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा और कवि निरंजन सिंह ‘तालिब’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सलाह पर महानगर से गुरूमुखी में अखबार का प्रकाशन शुरू किया। पहले दिन से ही हजारों प्रतियां छपने लगी थी। इसे देश का ‘पहला’ पंजाबी अखबार भी कहा जाता है। इसके बाद 1967 में कोलकाता से ‘नवीं प्रभात’ का प्रकाशन शुरू हुआ था। मालूम हो कि तब अखबार खास तौर से लाहौर से छपते थे और पंजाब और अविभाजित भारत के ज्यादातर अखबार उर्दू में प्रकाशित होते थे। आज का छह लाख प्रतियां से ज्यादा बिकने वाला पंजाबी दैनिक ‘अजीत ’अब हिंदी में ‘अजीत समाचार’ के साथ छप रहा है। लेकिन तब वह भी उर्दू दैनिक अजीत ही था। लाहौर से मीडिया समूह जब जालंधर स्थानांतरित हुए तब अजीत का पंजाबी में प्रकाशन शुरू हुआ।

नेताजी के भारत से पलायन की योजना तब भवानीपुर स्थित देश दर्पण के दफ्तर में बैठ कर ही बनाई गई थी। अंग्रेज सरकार की ओर से ताबिल को गिरफ्तार भी किया गया और अखबार का प्रकाशन भी बंद करवा दिया गया था। बाद में तालिब के पंजाब चले जाने के बाद अखबार की बागडोर रघुवीर सिंह बीर और उनके पुत्र लखबीर सिंह बीर ने संभाली। इन लोगों में भी देश सेवा के साथ ही अखबार के सहारे आंदोलन को आगे बढ़ा कर देश को आजाद करने का लक्ष्य था।

देश को आजादी मिल गई और अखबार अपनी राह पर चलता रहा। बाद में उद्योगपति भूपिंदर सिंह सरना ने अखबार को संभाल लिया और सारी जिंदगी प्रकाशन करते रहे। ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ और‘ सिख विरोधी कत्लेआम’ जिसे दंगा भी कहा जाता है, के दौरान जहां तत्कालीन केंद्र सरकार की ओर से सिख आवाज को दबाने के लिए हर संभव उपाय किए गए। ऐसे में पंजाबी अखबारों ने कौम और देश के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रकाशन किया।

पुराने दिनों को याद करते हुए एक सिख टैक्सीचालक ने बताया कि उन दिनों पंजाबी अखबार खरीद लेते थे, तब दोपहर का खाना खाने की चिंता नहीं रहती थी। अखबार में महानगर के सिख समुदाय के किसी व्यक्ति की शादी, मृत्यु या किसी और जश्न की खबरों के बारे में विस्तार के साथ छापा जाता था और लोग गुरुद्वारे पहुँच कर दोपहर का ‘लंगर’ छकते थे।

सरना साहिब के निधन के बाद अखबार उनकी पत्नी जसबीर कौर सरना ने बेटी अमरज्योति लुथरा और दामाद अमित लुथरा के सहयोग से चलाना जारी रखा। एक समय था कि संपादकीय टीम में छह लोग हुआ करते थे, लेकिन हालात ऐसे हो गए थे कि संपादकीय टीम और रिर्पोटिंग टीम ही नहीं रही। इसके बगैर अखबार में खबरों का संग्रह और बदलते हालात में टिके रहना लगातार कठिन होता जा रहा था।

दूसरे, छह पन्नों का अजीत 1984 में देश का पहला एक लाख प्रतियां बनने वाला अखबार बनने के बाद इन दिनों प्रतिदिन 16 पन्ने, रविवार को 24 से 28 पन्ने और कभी-कभार 40-42 पन्नों का विशेषांक भी प्रकाशित करता है। नेट पर एक करोड़ से ज्यादा लोग, 10 लाख से ज्याद लोग उसका एप डाउन लोड कर चुके हैं और प्रतिदिन छह लाख प्रतियां छपता है। जबकि सालों पुराना ‘देश दर्पण’ चार पन्नों में ही सिमटा रहा और परिवर्तन की ओर ध्यान ही नहीं दिया। इस महीने अचानक अखबार ने प्रकाशन बंद करने का फैसला किया।

पंजाबी साहित्य सभा, कोलकाता के अध्यक्ष हरदेव सिंह ग्रेवाल और उपाध्यक्ष जगमोहन सिंह गिल ने अखबार के प्रकाशन को बंद किए जाने को दुखद बताते हुए कहा कि कोलकाता ही देश का पहला महानगर था, जहां से पहला पंजाबी अखबार प्रकाशित हुआ था। इतना ही नहीं, यहां से प्रतिदिन दो पंजाबी दैनिक निकलते थे। नवीं प्रभात भी सितंबर 2017 में ही बंद हुआ है। यह पंजाबी भाषा के लिए भारी नुकसान है।

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