असम समस्या एक घृणित राजनीति की फसल - तपोधीर



---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 13 अगस्त 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

अध्यापक तपोधीर भट्टाचार्य का कहना है कि वास्तविक हालाल का वास्तविक विश्लेषण करने की जरुरत है असम में 40 लाख लोगों के भविष्य का प्रश्न तो इसके साथ है ही। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि भारत में जो घृणा की राजनीति शुरू हुई है उसमें वे लोग रवींद्र नाथ टैगोर के भारत को छीन लेना चाहते हैं। भारत सभा हाल में फारवर्ड ब्लाक की ओर से आयोजित नागरिक सम्मेलन में उन्होंने यह विचार पेश किए।

असम में एनआरसी को लेकर आयोजित सम्मेलन में पत्रकार बहारुद्दीन और अध्यापक तपोधीर के साथ ही फारवर्ड ब्लाक के बरुण मुखर्जी, राज्य सचिव नरेन चटर्जी, गोविंद राय, हाफिल आलम साइरानी मुख्य वक्ता थे। इस मौके पर नरेन ने कहा कि जब भारत का विभाजन हुआ था नेताजी ने खुलकर विरोध किया था, लेकिन हिंदू महासभा के लोग चुप थे। अब वे लोग आरएसएस, भाजपा के नेतृत्व में हैं। अब वे लोग ही किसी को घुसपैठिए, किसी को शरणार्थी का तमगा लगाकर विभाजन का खेल खेलने में व्यस्त हैं। बंगाली या असमिया एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। हम राजनीति, वर्ण, धर्म से ऊपर उठकर एक साथ विरोध चाहते हैं। भाजपा सरकार वोट की राजनीति के लिए यह खेल खेल रही है।

बहारुद्दीन ने असम और भारत के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल में ही चाय बगान, चाय की खेती के लिए पूर्वी बंगाल और दूसरे राज्यों से लोगों को असम लाया गया था। इसी तरह बंगालियों ने असम को समृद्ध किया है। असम की स्थानीय सभ्यता, संस्कृति में वे लोग शामिल हो गए, अब अचानक देश कह देगा 40 लाख लोग भारतीय नहीं हैं।

अध्यापक तपोधीर ने कहा कि 40 लाख लोगों में कितने हिंदु, कितने मुसलमान हैं, यह बड़ी बात नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि देश को घृणा की राजनीति ने अपने वश में कर रखा है। वे लोग धर्म और सांप्रदायिकता की अफीम खिलाकर हमें सुलाना चाहते हैं। असम अगर सिर्फ असमिया लोगों का है, बिहार सिर्फ बिहारियों का है तब भारत किसका है ?

उन्होंने कहा कि आप, हम या मध्यमवर्ग के लोग किसी तरह की समस्या होने पर थोड़ा सा सजग होने पर अदालत की शरण ले सकते हैं। कुछ हद तक विरोध करके लड़ सकते हैं। लेकिन दरिद्र, कम पढ़े लिखे लोग क्या करेंगे ? वे कहां जाएंगे ? 46 करोड़ रुपए खर्च करके उन नागरिकों के लिए गेस्ट हाउस बनाया गया है। वास्तव में क्या वह हिटलर के डिटेनसन कैंप की तरह कनसेनट्रेशन कैंप है ? अखंड भारत में अगर कोई व्यक्ति अपने रहने की जगह बदल लेता है तो उसे किसी भी हालत में घुसपैठ नहीं कह सकते। सारे लोगों को मिलकर इसका विरोध करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। इसके पीछे की विभाजन को राजनीति को समझने की जरुरत है।

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