शानदार फिल्मों में सबसे अच्छा चुनना एक आम समस्या है : आईएफएफआई 2018 इंडियन पैनोरमा के जूरी सदस्य



पणजी-गोवा, 23 नवम्बर 2018, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

49वें भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव (आईएफएफआई) के इंडियन पैनोरमा (फीचर) के जूरी के चेयरमैन राहुल रावेल ने कहा कि भारत में क्षेत्रीय सिनेमा का विकास बिल्कुल शानदार रहा है और यह काफी उछाल ले रहा है। उन्होंने कहा कि अब वह दिन दूर नहीं जब क्षेत्रीय सिनेमा नामक कोई विभेद नहीं होगी और सभी सिनेमा को केवल सिनेमा के रूप में जाना जाएगा। आईएफएफआई के दौरान इंडियन पैनोरमा श्रेणी में प्रदर्शित फिल्‍मों की श्रृंखला को उजागर करते हुए राहुल रावेल ने कहा कि चयनित फिल्‍मों की सूची में लद्दाख, लक्षद्वीप, तुलु और असम की फिल्‍में शामिल हैं।

गोवा के पणजी में आयोजित 49वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्‍सव (आईएफएफ) के दौरान एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राहुल रावेल ने कहा कि 100 से अधिक शानदार फिल्‍मों की सूची में से 22 फिल्‍मों का चयन करना वाकई कठिन है। उनके साथ फिल्‍म निर्माता एवं जूरी सदस्‍य (आईपी- फीचर) मेजर रवि और नई दिल्‍ली के भारतीय जनसंचार संस्‍थान के निदेशक केजी सुरेश थे। ये दोनों फीचर फिल्‍म जूरी के सदस्‍य हैं।

इंडियन पैनोरमा- गैर फीचर के जूरी भी मीडिया ब्रीफिंग के दौरान मौजूद थीं। जूरी चेयरमैन (गैर-फीचर) विनोद गणत्र, फिल्‍म निर्देशक एवं शिक्षाविद पार्वती मेनन और अभिनेता एवं निर्देशक सुनील पुराणिक ने गैर-फीचर फिल्‍मों की उभरती प्रकृति एवं कालातीत मूल्‍यों के परिप्रेक्ष्‍य में अपने विचार साझा किए।

उन्होंने कहा कि त्‍योहारी संग्रह में शानदार सामग्री के साथ कुछ जबरदस्‍त फिल्‍में शामिल हैं और इस प्रकार का प्रयोग पहले कभी नहीं किया गया। उन्‍होंने कहा कि चयनित फिल्‍में वैश्विक मंच पर भारत को दर्शाने के लिए पर्याप्‍त योग्‍य थीं और इनमें दर्शकों से संबंधित सामग्री को प्रमुखता दी गई थी।

एक सवाल के जवाब में चेयरमैन ने जोर देकर कहा कि राष्‍ट्रीय फिल्‍म और राष्‍ट्र विरोधी फिल्‍म जैसी कोई बात नहीं थी। उन्‍होंने कहा कि जूरी ने प्रस्‍तुत सभी फिल्‍मों को भारतीय सिनेमा के तौर पर देखा। उन्‍होंने कहा कि इंडियन पैनोरमा से कुछ फिल्‍मों को बाहर करने संबंधी विवाद दुर्भाग्‍यपूर्ण है और जूरी को अपने निर्णय तक पहुंचने के लिए पूरी स्‍वायत्‍तता दी गई।

बाजार द्वारा नजरअंदाज की जाने वाली सिनेमाओं को उजागर करने के महत्‍व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस उद्योग पर राज करने वाला सबसे बड़ा माफिया मल्टिप्‍लेक्‍स माफिया हैं क्‍योंकि सिनेमा की सामग्री में उनकी कोई दिलचस्‍पी नहीं होती और वे केवल उन्‍हीं फिल्‍मों में रुचि लेते हैं जो भीड़ जुटाने में मदद कर सके। उन्‍होंने कहा कि देखने लायक अच्‍छी फिल्‍मों को कम लागत पर वितरित करने के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने की आवश्‍यकता है।

जूरी चेयरमैन (गैर फीचर फिल्‍म) विनोद गणत्र ने कहा कि डिजिटल प्रौद्योगिकी के उभार के साथ ही असाधारण सामग्री वाली लधु फिल्‍में बड़ी तादाद में आ रही हैं। हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि फिल्‍म निर्माताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती गुणवत्‍ता सुनिश्चित करना है क्‍योंकि आज हाथ में मोबाइल फोन लेकर हर कोई फिल्‍म निर्माता बन गया है। उन्‍होंने कहा कि भले ही ये शौकिया हों लेकिन यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है कि इस प्रकार की फिल्‍मों की तादाद बढ़ रही हैं।

चेयरमैन ने कहा कि ध्‍यान में कमी के इस दौर में लघु फिल्‍में कुछ समय में फीचर फिल्‍मों की जगह ले लेंगी क्‍योंकि कई फिल्‍म निर्माता जबरदस्‍त सामग्री के साथ सामने आ रहे हैं जो दर्शकों के साथ बेहतरीन तालमेल बिठाने में समर्थ है। विनोद गणत्र ने कहा कि दो तिहाई गैर-फीचर फिल्‍में लघु फिल्‍म हैं। उन्‍होंने यह भी कहा कि लघु फिल्‍में उन लोगों के लिए कहीं अधिक मददगार हैं जो फिल्‍म बनाने की प्रणाली में शामिल होना चाहते हैं। उन्‍होंने युवा फिल्‍म निर्माताओं को पटकथा से कोई समझौता न करने की सलाह दी क्‍योंकि यह एक अच्‍छी फिल्‍म बनाने की चाबी है।

मेजर रवि ने कहा कि इस साल के चयन के लिए 18 ट्रांसजेंडर फिल्‍मों पर विचार किया गया। उन्‍होंने कहा कि देश में बनाई गई सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों को चुनने में जूरी सदस्‍यों को काफी मेहनत करनी पड़ी और उन्‍होंने यह सुनिश्चित किया कि इंडियन पैनोरमा दर्शकों के सामने देश भर का सिनेमा अनुभव प्रस्‍तुत करता है।

फीचर फिल्‍म जूरी के सदस्‍य केजी सुरेश ने कहा कि इंडियन पैनोरमा सेक्‍शन में फिल्‍मों के चयने को लेकर सभी जूरी सदस्‍य संतुष्‍ट हैं। उन्‍होंने कहा कि यह काफी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी और उस दौरान सिनेमैटोग्राफी से लेकर अभिनय तक विभिन्‍न विषयों पर सदस्‍यों के बीच काफी बहस भी हुई थी। उन्‍होंने कहा कि कहानियों की बढ़ती संख्‍या से भी पता चलता है कि भारतीय दर्शक अब लैंगिक और एलजीबीटी मुद्दों पर कहानियों को स्‍वीकार कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि उद्घाटन के लिए फिल्‍म का चयन करना काफी कठिन था क्‍योंकि सभी फिल्‍में अच्‍छी थीं और अंतत: पूरा सिनेमाई अनुभव प्रदान करने वाली फिल्‍म को चुना गया।

गैर-फीचर फिल्‍मों के लिए जूरी सदस्‍य पार्वती मेनन ने कहा कि यह लघु फिल्‍म निर्माताओं की रचनात्‍मकता है जो उन्‍हें दूसरों से अलग करती है। उन्‍होंने यह भी कहा कि उत्कृष्ट विषयों पर जबरदस्‍त भावनात्मक सामग्री के साथ छोटी फिल्में थीं जिस पर कोई फिल्‍म बनाने के बारे में भी नहीं सोचेगा। उन्‍होंने कहा कि हरेक निर्माता एक तरीके से मां है।

गैर-फीचर फिल्‍मों के लिए जूरी सदस्‍य सुनील पुराणिक ने कहा कि इस साल दक्षिणी राज्‍यों से अपेक्षाकृत कम प्रविष्टियां आई थीं जबकि पिछले साल उनका योगदान काफी रहा था। हालांकि उन्‍होंने यह भी कहा कि मराठी और बंगाली भाषाओं में कुछ शानदार फिल्‍में थीं। उन्‍होंने फिल्‍म निर्माताओं की प्रयोग करने की उनकी क्षमता के लिए सराहना की।

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