क्या फिल्में बदल सकती हैं राजनीति की दशा और दिशा ?



--रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 12 जनवरी 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।

सिनेमा, साहित्य और नाटक को समाज का आईना माना जाता रहा है। समाज में जो कुछ घटित हो चुका हो, होने वाला हो या हो रहा है, इसके माध्यम से लोगों को इस बारे में कभी साफ-सुथरे अंदाज में तो कभी संकेतों के माध्यम से बताया जाता रहा है। माना जाता है कि इसका लोगों पर असर भी पड़ता है और दूरंगामी नतीजे होते हैं। लेकिन बदलते जमाने में भी क्या वैसा ही है या इस बारे में भी लोग बदल चुके हैं? क्या फिल्में समाज के लोगों को इस हद तक प्रभावित कर सकती हैं कि वे राजनीति की दशा और दिशा को बदल सकें? इस हफ्ते पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह को लेकर बनाई गई ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनीस्टर’ के प्रदर्शन के बाद यह चर्चा एक बार फिर जोर शोर से शुरू हो गई है।

देश के मौजूदा हालात में बीते पांच सालों के दौरान हुए बदलाव के बारे में कई लोगों का मानना है कि पहले कुछ लोग समाज और राजनीति में घट रही घटनाओं के बारे में जानकारी देने के लिए कहानी, उपन्यास, नाटक, फिल्म के माध्यम से जानकारी देना चाहते थे। लेकिन अब नियोजित तरीके से एक पक्ष दूसरे पक्ष को लोगों की नजरों में गिराने के लिए पुराने साधनों के साथ सोशल मीडिया, टीवी, समाचार पत्रों का सहारा ले रहा है। जबकि पहले ऐसा नहीं था।

राजनीति पर फिल्मों के असर के बारे में एक व्यक्ति ने बताया कि आपातकाल के दौरान ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म का निर्माण किया गया था, लेकिन इस फिल्म के प्रिंट भी जला दिए गए। किसी ने फिल्म को नहीं देखा, इसके बावजूद इमरजंसी के बाद देश के लोगों ने सत्ता को पलट दिया। गुलजार की ‘आंधी’ को भी काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। हालांकि तब किसी ने यह आरोप नहीं लगाया था कि एक खास दल या फिर एक की ओर से इस तरह की फिल्में बनाई गई हैं।

‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनीस्टर’ के बारे में लोगों का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य साफ है कि एक परिवार को लोगों की नजरों से गिराया जाए, जिससे दूसरे राजनीतिक दल को फायदा पहुंच सके। अगले कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनाव में होने वाले जबरदस्त मुकाबले में इसके असर पर भी लोगों को संदेह है। फिल्म में एक संवाद है, ‘कि महाभारत में दो परिवार थे, अब भारत में एक ही परिवार है।’ इसके अलावा फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री और एक परिवार को लेकर घटनाओं को तोड़-मरोड़ कर, न्यू फुटेज को मर्जी के मुताबिक ढालने का आरोप भी है।

महात्मा गांधी के बारे में रिचर्ड एटबनरों ने गांधी फिल्म का निर्माण किया था। भले ही हिंदी फिल्म कारोबार के मामले में सफल नहीं मानी जा सकती, लेकिन इसने विश्व में खासी प्रसिद्धी हासिल की। गांधी जयंती समेत खास दिवस पर एक जमाने में दूरदर्शन पर लगातार इसका प्रदर्शन किया जाता रहा है। भाजपा के एक समर्थक ने हावड़ा में पूछा कि क्या इससे समर्थक गांधी के मुरीद बन गए? उनका कहना था कि कांग्रेस समर्थक एक फिल्म के कारण भाजपा को वोट देंगे, ऐसा मानना अनुचित है।

आम तौर पर शहीद भगत सिंह और नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी के इतने बरस बाद भी युवा वर्ग के नायक हैं। इसके बावजूद भगत सिंह पर बीते कुछ सालों में तीन फिल्में बनीं और एक भी सफल नहीं हो सकी। नेताजी पर भी भव्य पैमाने पर बनाई गई फिल्म , 'बोस- द अनफार्गेटेबल हीरो' ने बाक्स आफिस पर पानी नहीं मांगा था। सरदार पटेल पर बनाई गई ‘पटेल’ का भी यही हाल रहा। फिल्म को मनोरंजन का साधन माना जाता है और आम दर्शक ऐसी फिल्मों से दूर ही रहते हैं। हंगामे और प्रचार के बावजूद देश भर में करीब 1300 प्रिंट के साथ ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनीस्टर’ निराशाजनक तौर पर करीब डेढ़ करोड़ रुपए का कारोबार किया है, जहां पहले दिन 20-25 करोड़ का कारोबार अब सामान्य बात हो गई है।

‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनीस्टर’ के अलावा बीते कुछ सालों में टायलट एक प्रेम कथा, पैडमैन, उरी जैसी फिल्मों में जहां केंद्र सरकार की योजनाओं, सर्जीकल स्ट्राइक को धुंआधार तरीके से पेश किया गया है, वहीं इंदु सरकार और डाक्टर मनमोहन सिंह के बारे में बनाई गई फिल्म में एक परिवार के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। चुनाव के पहले एक और फिल्म ‘पीएम मोदी’ समेत कई फिल्में भी आने वाली है।

वृत चित्र बनाने वाले फिल्मकार राकेश शर्मा का कहना है कि राजनीति के लोगों को फिल्मों की शक्ति के बारे में मालूम है, लेकिन सिनेमा पर राजनीति का नियंत्रण इसके पहले नहीं देखा गया था।

तृणमूल कांग्रेस नेता सुदीप बंदोपाध्याय का कहना है कि पहले मरने के बाद बायोपिक फिल्में बनाई जाती थी, लेकिन अब जीवित लोगों के बारे में फिल्में बनाई जा रही हैं। ऐसी फिल्मों में हमेशा व्यक्ति के बारे में अच्छी-अच्छी बातें ही दिखाई जाती हैं। इसका लोगों पर खास असर नहीं पड़ता महज कुछ लोगों के अहम को संतुष्टी मिल जाती है।

हालांकि पश्चिम बंगाल प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष शादाब खान का कहना है कि हम अभीव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर हैं और फिल्म का विरोध या पाबंदी की मांग नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि दल या संगठन की ओर से फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन नहीं किया गया। मालूम हो कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरोध के कारण राज्य में दो सिनेमाघरों में फिल्म का प्रदर्शन बंद हो गया, इस मामले में पुलिस ने कोलकाता में छह लोगों को गिरफ्तार किया है।

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