--- आशीष तिवारी, टीवी पत्रकार।
☆ बंगाल में राजनैतिक पार्टीयों के सह पर आम जनता के साथ दुर्व्यवहार करने से बाज नहीं आ रहे क्लब के लोग
बंगाल मे दादागिरी करने का प्रचलन वर्षों पुराना है। जिस प्रथा को उसके अनुयायी कायम किये है, इसके लिए वो किसी हद तक जाने में रत्ती भर वक्त जाया नहीं जाने देते। हाल ही में बीते बहुप्रचलीत त्यौहार कम उत्सव दुर्गा पूजा में मेरे एक मित्र के साथ क्लब के लोगों ने उनसे चन्दा लेने पर बहस कर ली थी, मामला काफी बढ़ गया था। उन्होंने हमसे इस विषय पर सलाह भी ली और वे काफी डरे डरे से लग रहे थे।
मैने उनसे पूछा कि क्या बात है, तो वे कहने लगे कि क्लब वालों के मन माफिक चन्दा न देने पर वे लोग अरदब देकर गये है। घर में परिवार रहता है, बच्चे है और ये लोग कुछ गलत बर्ताव न करे। वे कहने लगे कि मैं एक छोटी साड़ी की दुकान मे काम करता हूँ, तनख्वाह के रूप मे ज्यादा नहीं मिलता, उसी में संसार चलाना होता है। मै धर्म के काम के लिए ना नहीं बोल रहा पर हर महिने कुछ ना कुछ को लेकर मनमानी चन्दा काटना कहा का नियम है। इन सबके बीच वे डर के साया में रहते है कि परिवार के साथ ये लोग अभद्र व्यवहार न करे। उन्होंने मुहमागां चन्दा क्लब वालों को दे दिया।
आज मै साप्ताहीक अवकाश के चलते घर पर ही था। शाम को लगभग आठ बज रहा था तब तक डोर बेल बजी, मै गेट पर गया तो पता चला कि काली पूजा होनी है और क्लब वालें चन्दा लेने आये है। मैंने पुछा - भाई साहब कितना देना है, वे लोग बोले पर्ची में जितना लिखा है। मुझे मेरे मित्र की बात याद आई, मैंने कहा कि इतना तो मैं नहीं दूंगा तब वे बोले देना होगा। बहरहाल इनके मंसुबे हमे भी ठीक नहीं लगे। मैने सोचा कि देके हटाओ व मैंने उन्हे उनके मन माफिक चन्दा दिया और वे शेखी बघारते हुए चले गये परन्तु एक पत्रकार होने के नाते मेरा मन बेचैन हुए जा रहा था। मैंने निर्णय लिया कि इस विषय की जानकारी प्रशासन, सत्तासीन राजनेता लोगों के साथ साथ आम जन मानस तक पहुँचाना मेरा फर्ज है। जिस वजह से यह लेख लिखा। मेरा एक सवाल आप से है, क्या यह सही है ? क्या भाव के भूखे भगवान को ये पाखंडी उनके नाम पर लोगो को जो परेशान कर रहे है वह ठीक है ? आखिर क्या सही है ...!
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