---रंजीत लुधियानवी, कोलकाता, 14 अप्रैल 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
चाचा का नाम सुनते ही आज पश्चिम बंगाल के लोगों को जिस शख्स की याद आती है, उसका नाम सरदार ज्ञान सिंह सोहनपाल है। 1954 में खड़गपुर नगरपालिका में मनोनीत कमिश्नर के तौर पर राजनीतिक जीवन शुरूआत करने के बाद 1967 से विधानसभा के उम्मीदवार बने लेकिन पहली जीत 1969 में मिली। इसके बाद 1972, 1982 से लेकर 2011 तक जीत हासिल की। इस दौरान 1977, 2016 में पराजित हुए। उन्होंने 1980 में लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था। राज्य के मंत्री के तौर पर लांच सेवा और मिनी बस सेवा शुरू करने का श्रेय उनका ही है।
कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत भले ही जालंधर के थे, लेकिन राज्य में वाममोर्चा शासन के दौरान बंगाल ही नहीं देश के संसदीय इतिहास में उनका योगदान अविष्मरणीय माना जाता है। राजनीति के किंग मेकर के तौर पर लोग उन्हें याद करते हैं।
सरदार रछपाल सिंह पुलिस के विभिन्न पदों पर काम करने के बाद राजनीति के मैदान में उतरे और बीते दो विधानसभा चुनाव जीत कर विभिन्न मंत्रीपद संभालने के बाद अब राज्य परिवहन निगम के चेयरमैन पद पर सुशोभित हैं।
सुरेंद्र सिंह आहलुवालिया लंबे समय तक दार्जीलिंग के सांसद रहे और अब नए लोकसभा केंद्र से तकदीर आजमा रहे हैं।
यहां चार सरदार नेताओं का जिक्र किया गया है, इनमें एक कांग्रेस, दूसरे माकपा, तीसरे तृणमूल कांग्रेस और चौथे भाजपा से जुड़े हैं। सात चरणों में हो रहे मौजूदा लोकसभा चुनाव में बंगाल के सिख वोटर किधर जाएंगे, इस सवाल पर लोगों से बातचीत के दौरान सिख मतदाताओं का रूख भी इस तरह से ही बिखरा हुआ नजर आया। कोई सिख मानता है कि कांग्रेस ही देश को चलाने के योग्य दल है, इसलिए कांग्रेस के अलावा किसी दूसरे दल को वोट देने का मतलब वोट खराब करना है। जबकि दूसरे कुछ लोगों का मानना है कि सिख धर्म का सिद्धांत ही धर्मनिरपेक्षता और बराबरी का संदेश देता है। ऐसे में मार्क्सवाद के मानववाद और बराबरी के सिद्धांत के कारण मार्क्सवाद का समर्थन ही देना चाहिए।
तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से सर्वधर्म सद्भाव को लेकर किए जा रहे प्रयास और रेलमंत्री रहते हुए पंजाबियों के लिए अकाल तख्त, दुर्गियाणा एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों को शुरू करके बंगाल-पंजाब को और नजदीक करने के कारण ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है कि दीदी के अलावा किसी को वोट देने का कोई मतलब ही नहीं है।
कोलकाता, हावड़ा, डनलप, भवानीपुर, हुगली समेत विभिन्न इलाके के सिख मतदाताओं से बातचीत के दौरान कई लोगों का कहना था कि पाकिस्तान को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आक्रामक रवैया और पड़ोसी देश को सबक सिखाने की उनकी बातों के कारण भाजपा को ही वोट देना चाहिए।
देश में सालों से वोट बैंक की राजनीति चल रही है, लेकिन सिख समुदाय हाल तक किसी का वोट बैंक नहीं बन सका है। लोग अपने मन के मुताबिक मतदान करते हैं और कुछ लोग स्थानीय स्तर पर समस्या को देखते हुए किसी दल के पक्ष मे मतदान करते हैं। चाचा ने एक बातचीत के दौरान बताया था कि उन्हें वोट देने वालों में सिखों के साथ ही दक्षिण भारत, उत्तरभारत समेत देश के सभी हिस्सों के मतदाता हैं। यही बात रछपाल सिंह ने एक बातचीत के दौरान कही कि उन्हें दीदी ने जहां से टिकट दिया था, वहां के लोगों ने सिख को देखा नहीं था और दीदी के सिपाही को देखने के लिए भीड़ लगा रहे थे।
सिख मतदाताओं को करीब से जानने वाले बताते हैं कि आपरेशन ब्लू स्टार के पहले बंगाल के ज्यादातर सिख मतदाताओं को कांग्रेस समर्थक माना जाता था, लेकिन 1984 के भीषण कत्लेआम के दौरान मार्क्सवादी दल की ओर से ज्योति बसु के नेतृत्व में बंगाल में माकपा कैडरों और पुलिस प्रशासन ने जिस प्रकार सिख समुदाय का साथ दिया कि इसके बाद 100 फीसद मतदाता 20 साल तक आंख मूंद कर माकपा को वोट देते रहे। लेकिन ममता के उदय और ज्योति बसु के सत्ता छोड़ने के बाद मतदाताओं में विभाजन शुरू हुआ।
वरिष्ठ पत्रकार और पंजाबी साहित्य सभा, कोलकाता के अध्यक्ष सरदार हरदेव सिंह ग्रेवाल का कहना है कि बंगाल में सिखों का कोई भी राजनीतिक संगठन नहीं है, इसलिए सिख मतदाता बिखरे हुए हैं। धर्म की राजनीति करने वालों को सियासत की जानकारी नहीं है, जिससे ऐसा हो रहा है। इसलिए महानगर के सिख मतदाता अलग-अलग दलों के पक्ष में मतदान करेंगे। हालांकि तृणमूल, भाजपा, माकपा, कांग्रेस सभी दल में स्थानीय सिख नेताओं को देखा जा सकता है। लेकिन कोई भी नेता पंजाबियों के बारे में राजनीतिक दल के सामने जा कर खड़ा नहीं होता।
इसी तरह, एक गुरूद्वारा कमेटी के पूर्व सदस्य सरदार गुरमुख सिंह गांधी का भी मानना है कि सिख समुदाय में सभी राजनीतिक दलों का प्रभाव है। इसमें कई कारणों से लोग कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहते तो कई कारणों से तृणमूल का समर्थन करते हैं। माकपा और भाजपा को वोट देने वालों की भी कमी नहीं है।
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