---ओम प्रकाश सिंह, कोलकाता, 16 जून 2019, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हिंदी भाषियों को बांग्ला सीखने का फरमान जारी कर चुकी हैं। इतिहास गवाह रहा है कि ममता बनर्जी ने राजनीति में अपना मुकाम आंदोलनों और जुझारू तेवर की वजह से बनाया था। बंगाल जब वाममोर्चा के निरंकुश अत्याचार वाले शासन से जूझ रहा था तब ममता दीन, दुखिया, गरीब, मजबूर, पीड़ित, शोषित, वंचित लोगों के पास नंगे पांव भागी हुई जाती थीं। उनके लिए लड़ती थीं, मार खाती थीं और अमूमन अबला समझी जाने वाली नारी होने के बावजूद 'सबला' की भांति बिना झुके अडिग रहती थीं। इसी वजह से उनका उपनाम "अग्नी कन्या" पड़ा। बंगाल के हर वर्ग के बीच अपने जुझारू आचरण की वजह से ही उनकी गहरी पैठ हुई। बंगाल के आम जनमानस के बीच प्रियदर्शी बनकर उभरने की वजह से ही वह सत्ता के शीर्ष पर भी पहुंचीं। लेकिन विगत 8 सालों में ममता के जादुई व्यक्तित्व में जो क्षरण आया है उसकी समीक्षा उन्हें करनी चाहिए। सत्ता पर पहुंचने के बाद जनसेवा और सबको सम्मान ही जनप्रियता का सबसे सफल फार्मूला है, लेकिन लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद मुख्यमंत्री ने जिस तरह की बचकाना हरकतें और बयानबाजी शुरू की हैं, वह उन्हें और अधिक नुकसान ही पहुंचाएगा।
बंगाल में रहने वालों को बांग्ला सीखने का फरमान जारी कर उन्होंने ना सिर्फ यहां सदियों से रहकर बंगाल की अर्थव्यवस्था में अपनी महती भूमिका निभाने वाले मेहनतकश बिहार- झारखंड-यूपी के मजदूरों को डराने की कोशिश की है बल्कि सरल, समावेशी और सभ्य बंगाली मानस को भी व्यथित किया है।
● सरकार की रहनुमाई के मोहताज नहीं हिंदी भाषी
बंगाल में रहने वाले लाखों हिंदी भाषी लोग किसी सरकार की रहनुमाई के मोहताज नहीं रहे हैं। अपने बल पर कड़ी मेहनत, प्रतिभा, ईमानदारी और सरलता के जरिए अपना मुकाम हासिल किया है। बंगाल की सत्ता संभालने से लेकर यहां जनसंख्या की बिगड़ती असमानता को भी बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद भी मुख्यमंत्री ने अपनी हार का ठीकरा हिंदी भाषियों पर फोड़ा था। उन्हें बंगाल में रहने देने की दुहाई दी थी और ऐसा एहसान जताया था जैसे ममता की रहनुमाई की वजह से ही यहां बंगाल में हिंदी भाषियों का गुजर हो रहा है। मुख्यमंत्री को अपना भ्रम तोड़ लेना चाहिए। जो लोग अपनी मातृभूमि को छोड़कर हजारों किलोमीटर दूर आकर बसने के लिए अभिशप्त हुए वह आपके भरोसे नहीं आए थे, ना किसी और सरकार के भरोसे यहां रहेंगे। उन्हें अपने बाजुओं पर भरोसा है और कहीं भी मिट्टी को सोना बना सकते हैं।
इस सच्चाई को समझे बगैर आंदोलन से निकली जन नेत्री ममता का इस तरह का बयान उनकी बौखलाहट और राजनीति की ओछी समझ को दर्शाता है। या तो वह ऐसा जानबूझ कर हिंदी भाषियों के खिलाफ उकसावे वाली बयानबाजी कर रही हैं ताकि विधानसभा चुनाव के समय बांग्ला भाषी और हिंदी भाषी का ध्रुवीकरण हो सके या क्षेत्रीय राजनीति की सीमा में केंद्रित अपनी छिपी हुई कुंठा को जाहिर कर रही हैं। उन्हें समझना चाहिए राजनीत में हार या जीत स्थायी नहीं होती। हार की समीक्षा कर वह अपनी गलतियों को सुधारें तो राज्य की सत्ता पर बना रहना कोई टेढ़ी खीर नहीं। 8 सालों तक बंगाल की सत्ता पर ममता के बने रहने के पीछे हिंदी भाषियों की भी बड़ी भूमिका है। एक चुनाव के हार गई तो उन्होंने बांग्ला और हिंदी भाषियों के बीच भेदभाव और अराजक माहौल पैदा करने की कोशिश शुरू कर दी है। पसीना बहा कर जीवन यापन करने वाले सीधे-साधे हिंदी भाषियों के खिलाफ इस तरह का षड्यंत्र कर विधानसभा चुनाव से पहले जीत के लिए जिस जमीन को तलाशने की कोशिश में जुटी हैं, वह मिलने के बजाय उनके पैरों तले से और अधिक खिसकने वाली है। उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि प्याले में तूफान नहीं उठता। जाति, रंग-रूप, भाषा के आधार पर बंगाल ना कभी बंटा है ना आगे बंटेगा।
भारत का रहने वाला हर एक शख्स देश के किसी भी हिस्से में सम्मान के साथ रहने का अधिकारी है। वह कौन सी भाषा सीखेगा, क्या बोलेगा, क्या खाएगा, कैसे रहेगा, क्या पहनेगा उसे तय करने का पूरा नैतिक और वैधानिक अधिकार उसका अपना है। ममता को उनका सम्मान करना सीखना होगा। भारत के लोग देश दुनिया के विभिन्न हिस्से में अपनी प्रसिद्धि का डंका बजा चुके हैं। लक्ष्मी मित्तल के जन्मदिन पर ममता ने शुभकामनाएं भी दी है लेकिन उन्हें इस बात की भी खोज करनी चाहिए कि दुनिया के 4 सबसे बड़े उद्योगपतियों में शुमार लक्ष्मी मित्तल को क्या लंदन में कभी प्रवासी भारतीय के रूप में अपमानित होना पड़ा है? क्या विदेशी विद्वत समुदाय ने कभी उन्हें भारतीय होने की वजह से भेदभाव किया? कभी नहीं! जब देश दुनिया के दूसरे समुदाय भारतीय प्रवासियों के साथ कभी भेदभाव नहीं किए तब इसी देश के एक राज्य की मुख्यमंत्री की इतनी हिमाकत कैसे हो सकती है कि यहां रहने वाले हिंदी भाषियों को धमकाने, उन्हें डराने, उनके मन में शंका पैदा करें, बांग्ला भाषियों के साथ भेदभाव पैदा करें?
● ममता के जादुई व्यक्तित्व का क्षरण है हार की वजह
ममता को यह बात समझनी होगी की लोकसभा चुनाव में करारी हार की वजह उनके अपनी जादुई व्यक्तित्व का क्षरण है। जो ममता ईमानदारी की प्रतिमूर्ति मानी जाती थीं उन्होंने चिटफंड घोटाला मामलों में शामिल लोगों को अपने कैबिनेट में सम्मान दिया। स्टिंग ऑपरेशन में खुलेआम घूस लेकर फर्जी कंपनी को मदद करने का आश्वासन देने वालों को भी उन्होंने सम्मान दिया। इससे राज्य वासियों के बीच गलत संदेश गया है। ममता को अपनी यह छवि भी सुधारनी होगी।
अगर भ्रष्टाचार के मामले में फंसे लोगों को हटाकर मुख्यमंत्री नए लोगों को कैबिनेट में जगह देतीं तो इससे राज्य वासियों के बीच उनका सम्मान और अधिक बढ़ता। उनके पास नेताओं की कमी नहीं, लेकिन अदूरदर्शी राजनीति करते हुए उन्होंने गलत फैसले लिए और उसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब इसका ठीकरा हिंदी भाषियों पर फोड़ कर एक और आत्मघाती गलती कर रही हैं। मुख्यमंत्री को बिना देरी किए अपने ओछे आचरण से बाज आना होगा। राजा का एक ही धर्म है राजधर्म। कहते हैं, "मुखिया मुख सो चाहिए खान पान को एक"। आजीवन जनप्रियता उसी की बनी रहती है जो सबका समान भाव से पालन करें। ऐसा करने के बजाय अगर हिंदी और बांग्ला भाषियों के बीच भेदभाव करती रहीं तो इससे उनका राजनीतिक जीवन और दागदार होगा।
रही बात हिंदी की तो ममता बनर्जी क्या चीज हैं, कितने नवाब आए और गए पर हिंदी अपने सतत प्रवाह से बहती रही है और बहती रहेगी। इस भाषा का लचीलापन ही है कि न केवल भारत बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी आसानी से स्वीकार्य है। गुरुदेव रवींदनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी विवेकानंद जैसे इसी राज्य के मनीषियों ने हिंदी को जन संवाद की राष्ट्रीय भाषा बनाने की वकालत की थी। इन पुरुधाओं ने कभी भी बांग्ला और हिंदी में भेदभाव नहीं किया। ममता बनर्जी को कम से कम अपनी भूमि पर जन्मे इन मनीषियों का सम्मान अगर करना है तो हिंदी का विरोध बंद कर देना चाहिए।
जहां तक बांग्ला सीखने की बात है तो यह मानवीय गुण होता है कि आदमी जहां रहता है वहां की हर चीज सीखने की कोशिश करता है। बंगाल में रहने वाला हर एक शख्स निश्चित तौर पर बांग्ला समझता है। भले ही बहुत अच्छी तरह से बोल ना सके, ठीक उसी तरह से जैसे आप भारत में रहते हुए हिंदी बहुत अच्छी तरह से नहीं बोल सकतीं लेकिन समझती बखूबी हैं। अगर आप उन पर बांग्ला सीखने का दबाव बनाएंगी तो इसका दो ही असर होगा। या तो लोग आपको राजनीतिक तौर पर जिवाश्म बना देंगे या बंगाल में रहने वाले गैर बंगाली और बंगालियों के बीच एक जहरीला माहौल बनेगा जो भारत की आत्मा अनेकता में एकता, अखंडता, समाज, मानवता और बंगाल के लिए घातक है।
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