‘मैंने गाँधी को जैसे जाना!’



गाँधी को आज हम ऐसे समय में फिर से याद कर रहे हैं जब हमारे चारों ओर हिंसात्मक-उदासीनता पसरी है।

आश्चर्य है कि आप ही नहीं याद कर रहे गाँधी को, भागवत जी भी ‘गाँधीकथा’ याद कर रहे हैं। तो मैं मानता हूँ कि अभी भी गाँधीजी चुके नहीं हैं, कुछ तो अभी भी बचा है उनमें। मने, भागवत जी के भी काम का कुछ गाँधी में है, यह तो आश्चर्य है ना ?

दो अक्तूबर को महात्मा की 150वीं जयन्ती पर संघ के ट्विटर अकाउंट पर मोहन भागवतजी के संदेश को ट्वीट किया गया। देखिए, दो अक्तूबर को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने क्या कहा अपने संदेश में। मोहन भागवत ने लिखा, “ ‘स्व’ के आधार पर भारत की पुनर्रचना का स्वप्न देखने वाले तथा सामाजिक समता और समरसता के संपूर्ण पक्षधर, अपनी कथनी का स्वयं के आचरण से उदाहरण देने वाले, सभी लोगों के लिए आदर्श पूज्य गाँधीजी को हम सबको देखना, समझना तथा अपने आचरण में उतारना चाहिए।” हालाँकि भागवत जी के ट्वीट की चर्चा इस कारण से हो रही है कि संघ और भाजपा पुराने प्रतीकों को कैसे हाइजैक करना चाहती है। यहाँ उन बातों में जाना समीचीन नहीं लगता। किसी की बिना आलोचना किये यह कहा जा सकता है कि गाँधीजी की प्रासंगिकता निर्विवाद है।

तो क्या इतने से ही गाँधी की प्रासंगिकता स्वयंसिद्ध हो जाती है कि संघ प्रमुख ने भी गाँधी जी को याद किया ? शायद नहीं, गाँधीजी की व्याप्ति पूरी दुनिया में है। अपनी जर्मनी की 2017 की यात्रा के दौरान मुझे ग्योटिंगेन स्थित महात्मा गाँधी हाउस जाने का अवसर मिला। आठ मंज़िला इस इमारत के निकट जाकर ही मैं रोमांचित हो रहा था। यह इमारत 1967-68 के आसपास अफ़्रीकी-एशियाई छात्रों को सहज आवासीय सुविधाएँ हेतु छात्रावास के रूप बनाई गयी थी। हालाँकि अब शायद इसके अच्छे दिन लद गये हैं।

खैर; गाँधीजी को हम तब याद कर रहे हैं; तब जब हम मानने लगे थे कि गाँधी की विदाई हो चुकी है।

मैं मानता हूँ कि गाँधी ‘विचार’ नहीं, एक ‘स्वभाव’ है। विचार बदलते रहते हैं; स्वभाव नहीं बदलता। इसलिए जिन लोगों ने गाँधी को विचार माना, वे बदल गये। जिन्होंने गाँधी को स्वभाव माना, वे अन्त तक वैसे ही बने रहे। वे नहीं बदले। गाँधी को समझने का यह बुनियादी तत्व है। यह बात अपने निजी तजुर्बे से कह सकता हूँ। हम अपने आसपास ऐसे गाँधी-स्वभाव के लोगों को देख सकते हैं, जो ना तो गाँधी टोपी पहनते थे और ना ही उस तरह से खद्दर।

गाँधी कोई स्वत: नहीं बनता, बन भी नहीं सकता। गाँधी के समय में ही कई लोग गाँधी बनना चाहे लेकिन बन नहीं पाये। गाँधी को कोई सरपास नहीं कर पाया। पूरी दुनिया में जितने भी गाँधी हुए वे सब ‘मिनी गाँधी” ही रहे।

काल अपने समय के गाँधी को जैसे पैदा करता और वैसे ही उसी निर्ममता के साथ खतम भी करता है। ऐसा लगभग सभी के साथ हुआ।

गाँधी को इस दृष्टि से समझने के लिए हमें उस काल में थोड़ा संतरण करना होगा, जब वे मोहनदास करमचन्द से गाँधी के रूप में उभरते हैं।

गाँधी अपने समय की सबसे बड़ी आँधी के विरोध में खड़े होते हैं।

दरअसल गाँधी की निर्मित ऐसे बुनियादी कारकों के चलते होती है जिससे तब का समूचा विश्व परेशान था, पीड़ित था। यह था सत्ता का नया चेहरा, जिसे तमाम देश देख रहे थे। देख ही नहीं रहे थे; बल्कि भुगत भी रहे थे।

अफ़्रीका व तीसरी दुनिया से लेकर भारतीय प्रायद्वीप तक साम्राज्यवादी अराजकता फैल चुकी थी और लगभग पूरी दुनिया दो वर्गों में बँटकर हलाकान थी। शासित और शोषित, दो ही वर्ग रह गये थे। इनके बीच एक बड़ी खाई थी और यह खाई बढ़ती ही जा रही थी। दुनिया की अधिसंख्य आबादी तमाम संसाधनों के बावजूद भूखी-नंगी और बेज़ार थी तो मुट्ठी भर शासक वर्ग बेइंतहा अय्याशियाँ फ़रमा रहे थे। उपनिवेश बने देशों का माल-असबाब जहाज़ों पर लद-लदकर लंदन की शोभा बढ़ा रहे थे तो यहाँ अपने देश में भुखमरी की हालत पैदा होती जा रही थी। यह तो भारत की दशा थी।

इसके अलावा वैश्विक स्तर पर इसी में से एक और वर्ग बन रहा था; वह था-गोरों और कालों का। यही काले कहीं-कहीं अश्वेत थे।

सन् 1930 या उसके बाद की पैदा हुई पीढ़ी के मन में महात्मा गाँधी के प्रति जो भी और जैसी भी अवधारणा बनी, वह दो माध्यमों से बनी। पहली, जनश्रुतियों से जो हमारे आसपास आज भी तैरती रहती हैं। और दूसरी; उनके अध्ययन व अनुभव से। इसमें गाँधी को जानने के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तत्त्व शामिल हैं। नेहरू के बाद से तो गाँधी के प्रभाव को कम किया जाने लगा या यह कहिए कि गाँधीवाद जो काँग्रेस की विरासत थी, जीवन से ग़ायब होने लगी। गाँधी टोपी के नीचे नया भारत बन रहा था।प्रगतिशील भारत। अकूत पूँजी वाला भारत; जिसमें पारम्परिक भारत बिला गया। गाँधी को इसी बिला गये भारत की चिन्ता थी। उनका सारा चिन्तन और उनकी चिन्ता उसी भारत के लिए थी। वे ऐसे भारत के हिमायती थे जो पूर्णतया स्वनिर्मित हो, जिसके कौशल और संसाधनों का बेहतर उपयोग हो तथा हर व्यक्ति स्वपोषित और स्वावलम्बी हो।

खादी से बने खद्दरधारियों की एक बड़ी जमात के लिए गाँधी या तो ढाल थे या राजनीतिक विवशता।

गाँधी कुछ के लिए ‘गाँधीजी’ थे, ‘गाँधीबाबा’ थे तो कुछ के लिये ‘गँधिया’ बन गये। कुछ लोगों के लिए आदरणीय थे तो कुछ के लिए गाँधी नकारात्मक शब्द बन गये और आज देश में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इसे मैं अपशकुन के रूप में लेता हूँ। हमारी पीढ़ी इसी दुविधा के बीच बड़ी हुई है कि हम गाँधी को कहाँ जगह दें...? आज बहुत से विरोधाभासी विचार हमारे चारों ओर फैले हुए हैं। इसलिए हमारे लिए कभी-कभी गाँधी का स्थान तय कर पाना मुश्किल होता जान पड़ता है। यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि गाँधी का चेहरा नेहरू युग के बाद से ही धुँधलाने लगा था, नेहरू की उत्तराधिकारी इंदिरा गाँधी तक आते-आते तो यह लगभग धुँधली लकीरों में ही रह गया। यदि कुछ रहा तो वह भारत की नोटों में बचा रहा। हाँ, खादी के कपड़ों में गाँधी नाम का टैग जरूर था, गाँधीवाद नहीं था। अब भी खादी “वस्त्र नहीं, विचार है।” के तर्ज़ पर चल तो रही है, परन्तु आज ज़्यादातर लोगों ने वस्त्र की तरह विचार और विचार की तरह वस्त्र; दोनों बदल डाले हैं। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि आज तो गाँधी की खादी भी वह खादी नहीं रह गई जिसे सोचकर गाँधी ने बुना था।

खैर, लगभग दो दशक पहले जनसत्ता में एक आलेख पढ़ा था-“गाँधी का अकेलापन”। जहाँ तक याद आ रहा है इसे प्रभाष जोशी ने लिखा था। इस आलेख में गाँधीजी के आखिरी दिनों का मर्मांतक ज़िक्र था जो मेरे दिमाग में हमेशा तारी रहा। बाद में कई लोगों ने इस विषय पर लिखा। कुछ समय पूर्व इतिहासकार सुधीर चंद्र की एक किताब आयी, ‘गाँधी: एक असम्भव सम्भावना' जिसमें उन्होंने गाँधीजी के आखिरी 169 दिनों का उल्लेख किया है। सुधीर चंद्र लिखते हैं, “चली भले ही न गई हो सीधे-सीधे अर्थों में, 1947 तक गाँधी की नैतिक सत्ता एक बोझ बन गई थी- एक कर्ज – जो उत्तोरत्तर भारी लगने लगा था उनके निकटतम सहयोगियों को। और पहली बार गाँधी चाह रहे थे कि उनकी नैतिक सत्ता बनी रहे। देख नहीं पा रहे थे कि जितना चाह रहे हैं उसे बनाए रखना, उतनी ही निकली जा रही है। जितनी ही वह निकलती उतनी की कोशिश बढ़ती उसे बनाए रखने की।" यह थे गाँधी के आखिरी दिन।

हाँ, तो मैंने गाँधी से कैसे परिचय प्राप्त किया? जहाँ तक मुझे याद है, सबसे पहले गाँधी के रूप में अपने बाबूजी को जाना। लोग उनको गाँधीजी कहा करते थे। तब तक कुछ-कुछ अंदाज़ा लगने लगा कि गाँधी कैसे रहे होंगे? बहुत कम उम्र थी। तो बहुत समझ पाना भी मुश्किल ही था तब, लेकिन धीरे-धीरे कुछ समझ विकसित हुई तो गाँधीजी भी कुछ-कुछ समझ में आने लगे। बाबूजी कभी भी उस तरह से गाँधी टोपी भी नहीं लगाते थे, जैसे इनके अनुयायी लगाते थे। लेकिन उनमें कुछ ऐसा जरूर रहा होगा कि लोग उन्हें गाँधी कहने लगे। आज जब इस पर सोचता हूँ कि बाबूजी को लोग गाँधी क्यों कहते थे तो अपने अभी कहे गये विचारों की पुष्टि होते हुए पाता हूँ; वह यह कि गाँधी विचार से ज्यादा स्वाभावरूप थे, क्योंकि इसी स्वभाव के नाते ही बहुत सारे लोग गाँधी कहे जाने लगे थे; जबकि उनमें महात्मा जैसी बहुत सी चीज़ें नहीं थीं; कुछ साम्यता दिखती थी तो वह स्वभाव में कुछ थी।

गाँधी जी अपने 32 साल के आंदोलन जीवन के दौरान अहिंसा और सत्याग्रह का सबक सिखाते रहे। और अन्ततः यह सिद्ध कर गये कि गाँधी का मतलब अहिंसा, गाँधी का मतलब स्वराज और गाँधी का मतलब लोकतंत्र तथा गाँधी का मतलब एक स्वभाव है जिसमें सबके लिए स्थान था-दोस्त और दुश्मन दोनों के लिए, लेकिन कायरता के लिए स्थान नहीं था। यह कायरता किसी भी तरह की हो। वे तो हिंसकों को भी कायर मानते थे। वे कहते भी थे, “हिंसा और कायरता में एक चुनना होगा तो मैं हिंसा चुनूँगा।” तो ऐसा ही गाँधी का स्वभाव था।

इसलिए जब-जब जिम्मेदार संस्थाएँ ख़तरे में होंगी, जब-जब स्थितियाँ विपरीत होंगी, गाँधी बाबा जी उठेंगे। हमारी नज़र में वे शायद पहले व्यक्ति थे जो भीतर और बाहर दोनों जगह एक जैसे ही थे; कोई द्वैत नहीं था उनमें। दुस्साहस की हद तक साहस था उनमें।

आज इस स्वभाव की फिर बड़ी ज़रूरत है। परन्तु यह कैसे हो सकेगा ? यह एक कठिन सवाल है। हम नहीं जानते कि इसका उत्तर कब और कैसे मिलेगा? एक बार फिर हम सब मिलकर सोचें इस पर....!

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