--योगिता यादव,
(लेखिका चर्चित कहानीकार व पत्रकार हैं।)
जब कहीं कोई व्यक्ति चोरी करते पकड़ा जाता है, तो क्या आप उसे बाबा भारती और खड्ग सिंह की कहानी ‘हार की जीत सुनाते हैं?’ नहीं न ! तब फिर स्त्रियों से संबंधित अपराध होने पर हमारे देश के भगत सिंह कोश्यारी और उन जैसे लोग श्लोक, मंत्र और पंचतंत्र की कथाएं क्यों सुनाने लगते हैं? इसलिए क्योंकि वे जानते हैं कि छोटे से दिमाग को इंगेज कर जेंडर के एक बड़े प्रश्न को बेदखल किया जा सकता है। क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्म, आधुनिक बनाम पारंपरिक की लड़ाई के बीच जेंडर की अस्मिता और संरक्षा के मुद्दे को बहुत शातिराना तरीके से उलझाया जाता सकता है। जिसे इसके खैरख्वाह ने ही यथासंभव उलझाया है।
भूख एक नैसर्गिक क्रिया है, परंतु भूख के लिए किसी का अन्न, औषध या सामान चुराना अपराध है। इसके लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 379 का विधान है, जिसके अंतर्गत कम से कम तीन वर्ष का कारावास है। भूख की मजबूरी से आप चोरी को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकते। दोनों अलग-अलग हैं। पर यौन शोषण और बलात्कार के मामलों में इन दोनों को भरसक उलझाया जाता है। दोनों ही जघन्य अपराधों को मनुष्य की स्वभाविक सहवास की आवश्यकता से जस्टिफाई करने की कोशिश की जाती है। फिर चाहें इसके लिए पीड़ित का चारित्रिक पोस्टमार्टम ही क्यों न करना पड़ जाए।
#मीटू की मुहिम में जब महिलाएं अपने पुराने कटु अनुभवों को सामने ला कर अपनी साझी अस्मिता के लिए खड़ी होने की कोशिश कर रहीं थीं, तब भी कुछ महिलाएं इनके विरोध में आईं। जैसा अकसर होता है, वे इसे सहमति से किए सेक्स को पॉवर की लड़ाई साबित करने लगीं। यह उन लोगों के लिए संभावनाशील मौका बन गया जिन्हें स्त्री के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों से ज्यादा उसकी यौन स्वतंत्रता की वकालत सूट करती हैं। जबकि अपनी दुनिया में वे आर्थिक मामलों में धोखाधड़ी, दल-बदल कानून और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए भी कानून का सहारा लेते हैं।
सहमति से हुए सेक्स के बाद भी यौन शोषण की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसे बस उसी तरह देखने की जरूरत है जिस तरह पार्टनरशिप में शुरू किए गए कारोबार में धोखाधड़ी होने पर कानून आपको आईपीसी की धारा 420 के तहत मुकदमा करने का अधिकार देता है। पर हमारे देश और समाज में आर्थिक मामलों में धोखाधड़ी होने पर तो अपील का अधिकार है पर शारीरिक संबंधों और प्रेम में हुई धोखाधड़ी पर आप ‘चटखारे की विषयवस्तु’ बन जाती हैं। कारण स्पष्ट है कि अब भी आधी आबादी जेंडर के मुद्दे को वोट बैंक नहीं बना पाई है। कितनी ही बार उसके मन का पलड़ा अपने जेंडर की बजाए अपने पुरुष साथी की विद्वता, महानता, सामाजिक-आर्थिक स्टेटस और पॉवर की तरफ झुक जाता है। प्रधानमंत्री की ओर से जारी ‘संकल्प से सिद्धि’ में भी स्त्री अस्मिता और सुरक्षा की गारंटी जैसा कोई संकल्प शामिल नहीं किया गया। अब भी भारतीय राजनीति ‘वीरों’ की पनाहगाह है, स्त्री अस्मिता की नहीं।
लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) की कवयित्री मधुमिता शुक्ला याद है आपको? 17 साल की उम्र में ही वीर रस की कविताओं से हिंदी कविता के मंचों पर तहलका मचा देने वाली इस लड़की की जब हत्या हुई, वह मात्र 24 वर्ष की थी और उसके गर्भ में सात माह का भू्ण पल रहा था। 9 मई 2003 के इस हत्याकांड ने पूर्वांचल की सियासत में तूफान मचा दिया था। पोस्टमार्टम में हुई डीएनए जांच में पता चला कि यह बच्चा उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी का था। अमरमणि त्रिपाठी की पत्नी मधुमणि के नाम पर मधुमिता शुक्ला के यात्रा करने, सरकारी लाभ दिलवाए जाने के किस्से खबरों में तैरने लगे। पर वास्तविकता देखिए कि वही मधुमणि अपने पति अमरणमणि त्रिपाठी के साथ इस हत्या की साजिश में शामिल थीं। अमरमणि और मधुमणि दोनों को ही इस मामले में आजीवन कारावास हुआ। पर जानते हैं जनता जनार्दन ने क्या किया….? 33 से ज्यादा मामलों में दोषी अमरमणि त्रिपाठी ने वर्ष 2007 में गोरखपुर जेल से ही चुनाव लड़ा और वह महाराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट से बीस हजार वोटों से चुनाव जीता। तो हम, भारत के लोग... जो संविधान पर अटूट आस्था रखते हैं, वे असल में इतने भावुक और इतने अत्यधिक विवेकहीन हैं कि मतदान करते समय हमें अपनी मां, बहन और बेटियों का भी ख्याल नहीं आता।
हम वही अति संवदेनशील जनता जनार्दन हैं जो आसाराम और राम रहीम की गिरफ्तारी के विरोध में लट्ठ लेकर खड़े हो जाते हैं कि उन्होंने समाज सेवा और अध्यात्म के लिए बहुत काम किया है। क्या हुआ जो आठ, दस या उससे भी ज्यादा महिलाओं, बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना लिया। न्याय मांगने के लिए दर दर भटकती बलात्कार पीड़िता के लिए हमारा दिल भले ही न पसीजे पर जब कुलदीप सिंह सेंगर की गिरफ्तारी हो तो हम उसके लिए जुलूस निकालेंगे और कहेंगे, “हमारा विधायक निर्दोष है” निर्दोष तख्तियां थामने वाले इन जुलूसों में महिलाएं भी होंगी।
गंभीर आरापों में गिरफ्तार होकर जेल जाने और जेल से ही चुनाव जीतने वाले अमरमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के पहले नेता थे, आखिरी नहीं। अब भी हमारी लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में कई ऐसे नेता हैं जिन पर संगीन आरोप लगे हैं और मुकदमे चल रहे हैं। चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी एक रिसर्च ऑर्गनाइजेशन ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ के आंकड़ें बताते हैं कि भारतीय मतदाता की सहिष्णुता ने आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसदों का प्रतिशत पिछले दस साल में 44 प्रतिशत बढ़ा दिया है। 17वीं लोकसभा के लिए चुन कर आए 542 सांसदों में से 233 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। खुद सांसदों की ओर से जारी हलफनामे में यह सामने आया है कि 129 सांसद ऐसे हैं जिनके खिलाफ हत्या, अपहरण और बलात्कार जैसे संगीन मामले दर्ज हैं। अब आप बताइए कि आप किस तरफ हैं? इन्हें जिताकर दामिनी, निर्भया या दिशा की लाश पर मोमबत्तियां जलाने वालों में या रेप से बचने के लिए लड़कों को श्लोक और मंत्र सुनाने वालों में?
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