--- हरेन्द्र शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार, वाराणसी।
● बीएचयू मालवीय चबूतरा पर "अप्पा" की चर्चा
29 अक्टूबर। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मालवीय चबूतरे पर रविवार को अनोखे रंग और ढंग से पद्मविभूषण स्व• गिरिजा देवी की स्मृति में 'संगीत और शब्द' विषयक चबूतरा चर्चा का आयोजन किया गया। चर्चा में संगीत रसिकों और विमर्शकारों ने मल्लिका-ए-ठुमरी की सांगितिक सफर पर विमर्श किया।
इस अवसर पर संगीत समीक्षक डा• आशीष पांडेय ने कहा कि गिरिजा देवी ने ठुमरी को श्रृंगार और मनुहार से निकालकर विश्व भर में रूहानी दर्जा दिलाया। संगीत जगत में गिरिजा देवी संगीत का पर्याय हैं। उन्होंने काशी की गलियों की क्रियोल भाषा में ठुमरी के बोल दिए वहीँ आम जीवन से लोकधुनों को चुनकर उन्हें राग के रथ पर सवार किया। ठुमरी को रागों का गुलदस्ता बना दिया। उनके कंठ में अनूठी मिठास और खनक के मेल ने साहित्यिक अन्योक्ति के सहारे ठुमरी को अभूतपूर्व ऊंचाई दी है।
नाट्य समीक्षक प्रो• सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि गिरिजा देवी ने ठुमरी में प्रेम,स्वप्नन और भक्ति की ऐसी त्रिवेणी बहाई जिसका दीवाना सदियों तक ज़माना रहेगा।
गीतकार मनोज भावुक ने कहा कि गिरिजा देवी पूरबिया सेमिक्लासिकल की जड़ हैं जिनके बिना संगीत की नई पीढ़ी प्लास्टिक का फूल साबित होगी।
बीएचयू भोजपुरी अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो• श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि गिरिजा देवी में संगीतकार के भीतर गुरू शिष्य परंपरा का एक आदर्श शिक्षक था। उन्होंने ठुमरी को भोजपुरी गीतों की अश्लीलता के बरक्स अध्यात्म का मार्ग दिया।
जनार्दन सिंह ने कहा कि भोजपुरी की हाइटेक और अश्लील संगीत पीढ़ी को गिरिजा देवी से सच्चे संगीत और लोक की नई नई प्रयोगशीलता सीखनी चाहिए।
अरुण तिवारी ने कहा कि जिस समाज में संगीत का विकास होता है वह संवेदनशील और लोकतांत्रिक समाज बनता है।एथेंस से भारत तक इसके उदाहरण हैं।
नेहा ने कहा कि गिरिजा देवी ने गुलाम देश में सामंती परिवार से बाहर निकलकर स्त्री मुक्ति की राह दिखाई। विश्वविख्यात श्रीसंकटमोचन संगीत समारोह में गिरिजा देवी की अबकी बार अंतिम प्रस्तुति रही।
पंकज कुमार ने कहा कि गिरिजा देवी चलती फिरती संगीत सभा थी। वे जितनी बड़ी गायिका थीं उससे बड़ी सम्बंधजीवी बनारसी संस्कृति थी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वाचस्पति ने किया। संचालन चबूतरा संस्थापक डा• रामाज्ञा शशिधर ने किया।
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