--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में दवाएं मिलेंगी, लेकिन अब की तरह सारी दवाएं मुफ्त में नहीं मिलेंगी। इसी तरह, मुफ्त में आपरेशन का सामान भी मरीजों के लिए मिलेगा, लेकिन सारा सामान ‘मुफ्त’ में नहीं दिया जाएगा। महंगी दवाओं के विभिन्न पावर में छूट नहीं मिलेगी। मुफ्त की सूची से कई महंगी दवाओं और इंजेक्शन को बाहर किया जा रहा है। एक ही मलिक्यूलर की कई तरह की दवाइयां भी नहीं मिलेंगी। दवाओं में ‘जरुरी’ और ‘विशेष’ को तरह की सूची में विभाजित किया जा रहा है। अस्पताल के स्तर के मुताबिक वह वितरित की जाएंगी।
मालूम हो कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के निर्देश के मुताबिक राज्य सरकार ने सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज की परियोजना शुरू की थी। राज्य के ग्रामीण इलाकों में भी 2012 से करीब पांच साल तक मुफ्त दवाइयां दी गई हैं। जबकि 2015 से यह व्यवस्था मेडिकल कालेजों में शुरू हुई थी। लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब मुफ्त इलाज की व्यवस्था में फेरबदल किया जा रहा है।
अब राज्य में ‘तामिलनाडू मेडिकल सर्विस कार्पोरेशन’ की दवाई नीति का अनुसरण करते हुए मुफ्त इलाज परियोजना को चलाया जाएगा। लेकिन पांच साल बाद योजना में परिवर्तन का क्या कारण है ?
इस बारे में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहला कारण, प्रतिदिन करोड़ों रुपये की दवाइयां और आपरेशन का सामान बांटने में करोड़ों रुपये की राशि खर्च हो रही है, इससे राज्य सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। दवा कंपनियों का भुगतान बकाया हो गया है। कैंसर, मधुमेह जैसी महंगी दवाओं का संकट दिखने लगा है। जबकि मुफ्त इलाज के कारण मरीजों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि होती जा रही है।
दूसरे, राज्य सरकार का मानना है कि महंगी दवाएं मुफ्त में होने के कारण उनका दुर्व्यवहार भी हो रहा है। कई बार दवाओं का स्टाक रहने पर भी खाली बता कर दवाएं खरीदी जा रही हैं। इसलिए फ्री ड्रग नीति में परिवर्तन किया जा रहा है। स्वास्थ्य अधिकारी विश्वरंजन शतपथी, स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी देवाशीष भट्टाचार्य को को-चेयरमैन बनाकर एक कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी में चिकित्सा विभाग के कई और लोग भी शामिल हैं।
भट्टाचार्य के मुताबिक तामिलनाडू परियोजना के मुताबिक मुफ्त में दवाएं देंगे, लेकिन एक सीमा रेखा या प्रोटोकोल होगा। फिलहाल हमारी व्यवस्था बच्चों के लिए एक टोकरी में ढेर सारी आइसक्रीम रखने जैसी है। क्या खाएं क्या नहीं, इस सोच में काफी आइसक्रीम बर्बाद की जा रही है।
मालूम हो कि तामिलनाडू में 305 ‘एसेनशियल ड्रग’ और 415 ‘स्पेशिलिटी ड्रग’ समेत कुल मिलाकर 700 दवाओं से लोगों का इलाज किया जाता है। जबकि पश्चिम बंगाल में सरकारी सूची में 1800 दवाइयां शामिल हैं। अब कुल मिलाकर 500 दवाइयों को मुफ्त की सूची में लाने का प्रयास किया जा रहा है। तामिलनाडू में आपरेशन की सामग्री सिर्फ 85 है जबकि यहां 900 से ज्यादा सामान सूची में दिया जा रहा है। नतीजा कई अस्पताल महंगी दवाइयां खरीद रहे हैं और पैसे समाप्त होने पर दूसरा काम नहीं हो रहा है।
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