कोलकाता 14 मई। देश में बीड़ी पीने वालों की संख्या अन्य तरह से धूम्रपान करने वालों से काफी अधिक है। बाजार में एक सिगरेट की जगह आठ गुणा अधिक बीड़ी बिकती है। इस समय जब विभिन्न वस्तुओं के लिए वस्तु एवं सेवाकर दर (जीएसटी) तय हेाना है, ऐसे में सबसे ज्वलंत सवाल है कि क्या बीड़ी के कारण 9 लाख 86 हजार 581 लोगों की नौकरी के लिए हर साल 78,800 लोगों की जान ली जा सकती है।
हालांकि सभी जानतें है कि बीड़ी पीने से स्वास्थ्य का नुकसान हेाता है। लेकिन बीड़ी पर किसी तरह का नियंत्रण कर के मामले में नहीं है, इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि बीड़ी बनाने के काम में लगे लाखों लोगों का रोजगार छीन जाएगा।
तंबाकू के सेवन पर रोक लगाने पर काम करने वाले संबध हैल्थ फाउंडेशन के ट्रस्टी संजय सेठ का कहना है कि तंबाकू सेवन पर भारी कर लगा कर इसके प्रयोग को रोकना सबसे कारगर तरीकों में से एक है। लेकिन वर्षों से बीड़ी पर सबसे कम कर लगाया जाता है क्योंकि इसके लिए तर्क दिया जाता है कि बीड़ी उद्योग से लाखों लोगों का जीवनयापन होता है। जीएसटी में भी बीड़ी पर 18 प्रतिशत कर लगाने की बात हो रही है जो अन्य तंबाकू उत्पादों पर लगाए जाने वाले 28 प्रतिशत कर और सेस की तुलना में बहुत ही कम है।
मुंबई टाटा मेमोरियल अस्पताल के कैंसर के सर्जिकल प्रोफेसर डा० पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि जितने लोग बीड़ी उद्योग में लगे हैं उससे अधिक हर साल लोगों की मौत बीड़ी के सेवन से हो रही है। उन्होंने बताया कि वह बीड़ी पीने से हुई कैंसर की बीमारी के मरीजों को रोज देखते हैं इसलिए बीमारी का दंश न सिर्फ मरीज को झेलना पड़ती है बल्कि इससे मरीज का पूरा परिवार भी बर्बाद हो रहा है। किसी भी हाल में बीड़ी के उपभोग को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। बीड़ी भी सिगरेट की तरह ही खतरनाक है और इसे जीएसटी के अंतर्गत अवगुण पदार्थों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
पश्चिमी बंगाल में 9.8 लाख बीड़ी में काम करने वालों को तो न्यूनतम से भी कम मजदूरी मिलती है।उन्होने बताया कि ब्रिटिश मेडिकल जरनल (बीएमजे)2014 के अनुसार पूरे प्रदेश में बीड़ी उधोग में केवल 9 लाख 86 हजार 581 लोगों को ही रोजगार मिला है। इसी दौरान योजना आयोग के रोजगार आंकड़ों के अनुसार राज्य में केवल 3.10 प्रतिशत लोगों को बीड़ी उद्योग में रोजगार मिला हुआ था। इससे इस उत्पाद से मिले रोजगार के महत्व का पता चलता है।
वे बतातें है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी वर्ष 2012/13 के अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार राज्य में तम्बाकू पर वैट से केवल 491 करोड़ रुपए की आमदनी हुई थी जबकि तंबाकू के कारण पैदा हुई बीमारियों पर 3340 करोड़ रुपए खर्च किए गए। ग्लोबल अडल्ट टोबेको सर्वे (जीएटीएस) के अनुसार प्रदेश में 2.4 करोड़ लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। इनमें 70लाख सिगरेट और 1.07 करोड़ लोग बीड़ी पीते हैं। इसके साथ ही 1.49 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जो धुआं रहित तम्बाकू उत्पादों का प्रयोग करते हैं। सभी प्रकार के तम्बाकू सेवन के कारण हर साल 1 लाख 53 हजार लोगों की मौत होती है।
वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी) के प्रभारी व हैड नेक कैंसर सर्जन डा० सोरव दत्ता के कहा कि देशभर में बीड़ी पीने से 5.8 लाख लोगों की मौत होती है। बीड़ी पीने से होने वाली मौतों और पेरशानियों की तुलना रोजगार के तर्क को देकर नहीं की जा सकती।
उन्होंने बताया कि यह धारणा गलत है कि बीड़ी उद्योग असंगठित क्षेत्र है और इसमें बहुत भारी संख्या में लोग काम करते हैं। दरअसल बीड़ी उद्योग एक बहुत ही अच्छी तरह से संगठित क्षेत्र का उद्योग है और हकीकत तो यह है कि बीड़ी मजदूर बीड़ी उद्योग द्वारा दुष्प्रचारित कि बीड़ी उद्योग असंगठित क्षेत्र है का शिकार बने हुए हैं। वंही प्रतिवर्ष एक बीड़ी पीने वाले की मौत से 12 लोगों की नौकरी इस क्षेत्र में रहती है।
वर्ष 2010 के एक बीड़ी बनाने वाले राज्य में किए गए एक अध्ययन के अनुसार यह पाया गया है कि 70 प्रतिशत मजदूर आंख, गैस और दिमाग की बीमारी से पीडि़त है। इनमें से आधे लोगों को सांस लेने में दिक्कत हेाती है।
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