वाराणसी-उत्तर प्रदेश,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर दो दिवसीय ई-संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। "हिंदी अकादमिकता की एक सदी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग" विषय पर केंद्रित इस संगोष्ठी में विभाग के शताब्दी गौरव यात्रा पर दो सत्रों में चर्चा हुई। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य वक्ता प्रो• रामदरश मिश्र, विशिष्ट वक्ता डॉ• विश्वनाथ त्रिपाठी शामिल हुए। अध्यक्षता कुलपति प्रो• राकेश भटनागर ने की।
प्रो• मिश्र ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में बतौर छात्र बिताए अपने पुराने दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि यह विभाग अपने आप में वटवृक्ष है।
डॉ• विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी साहित्य में तो यहाँ से निकले लोगों ने योगदान दिया ही लेकिन देशभर में हिंदी के अकादमिक जगत में यहाँ के पुरातन विद्यार्थियों का योगदान अमूल्य है।
इस अवसर पर बीज वक्तव्य पेश करते हुए हिंदी विभाग, बीएचयू के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रो• अवधेश प्रधान ने कहा कि अपना पूरा जीवन हिंदी विभाग में पढ़ते-पढ़ाते ही बीता दिया। अब जब सेवानिवृत होने का समय आया यह विभाग अपनी शताब्दी पूरी कर रहा है। ये गौरवबोध हमेशा साथ रहेगा कि विभाग की एक सदी की यात्रा में तकरीबन आधी सदी तक इस विभाग से जुड़ाव रहा।
इस अवसर पर विभाग की वरिष्ठ आचार्य व कला संकाय प्रमुख प्रो• रामकली सर्राफ ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि इससे बेहतर संयोग क्या होगा कि विभाग के शताब्दी वर्ष को समर्पित संगोष्ठी में बतौर संकाय प्रमुख विद्वान् अग्रजों एवं पुरातन विद्यार्थियों का स्वागत करने का अवसर मिला है।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे कुलपति राकेश भटनागर ने कहा कि अत्यंत हर्ष का विषय है की हिंदी विभाग ने अपने सौ वर्ष पूरे किए। इसके लिए विभाग से जुड़े सभी लोगों हार्दिक शुभकामनाएं। उन्होंने कहा कि एक संस्थान की ताक़त उसके पुरातन छात्र होते हैं। किसी भी संस्थान के लिए शताब्दी पूरी करना बहुत गौरवमयी बात होती है। हिंदी विभाग, बीएचयू के पास एक शताब्दी के पुरातन विद्यार्थियों की लम्बी श्रृंखला है। यहाँ आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वानों ने विद्यार्थियों को तराशा है।
सत्र का संयोजन कर रहे प्रो• वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने कहा कि विभाग के शताब्दी वर्ष के आयोजन के लिए लंबे समय से तैयारी चल रही थी। हम जैसे प्राध्यापक जिन्होंने पहले यहीं शिक्षा ग्रहण की बाद में यहीं अध्यापन सेवा दी उनके लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर था। इतिहास के पन्नों में सौ वर्षों में अनेक इतिहास इस विभाग ने बनाया लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के चलते पूरे आयोजन को डिजिटल दुनिया में आयोजित करना पड़ेगा यह किसने सोचा था, खैर अब यह आयोजन भी इस विभाग के इतिहास में ही दर्ज हो जायेगा। उन्होंने सत्र में उपस्थित सभी अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र में शोध, आलोचना, रचना एवं इतिहास के विकास में हिंदी विभाग का योगदान विषय पर चर्चा हुई। इस सत्र में विभाग के पुरातन विद्यार्थी चर्चा में शामिल हुए। डॉ• जितेंद्र नाथ मिश्र, प्रो• वीर भारत तलवार, प्रो• मनोज कुमार सिंह बतौर वक्ता शामिल हुए। सत्र की अध्यक्षता प्रो• मैनेजर पांडेय ने की।
उन्होंने अपने विद्यार्थी दिनों को याद करते हुए बताया कि बी.ए. में डीएवी पीजी कॉलेज में पढ़ता था तो विभाग में आना जाना होता था। बाद में यही एम.ए. और पीएचडी किया। यहाँ सिर्फ किताबी शिक्षा ही नहीं मिली बल्कि जीवन के कई अनमोल सीख मिले। यहीं से यह सीखा कि कभी भी क्लास लेने बिना पढ़े ना जाना। यहीं सीखा की शिक्षक को उदार प्रवृति का होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात तो यहाँ के कुलगीत से सीखी - सत्य पहले फिर आत्मा रक्षा।
सत्र का संयोजन प्रो• चंद्रकला त्रिपाठी ने किया। उन्होंने सभी वक्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि हिंदी विभाग बीएचयू से कितनी ही विभूतियाँ निकली। उनके नाम गिनाने लगूँ तो ये सिलसिला बहुत लंबा चलेगा। सौ साल इतिहास की दृष्टि से भले ही छोटा काल खंड हो पर किसी भी संस्था के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है। उन्होंने सभी को कल के सत्रों में चर्चा हेतु आमंत्रित करने के साथ प्रथम दिवस के संगोष्ठी के समापन की घोषणा की।
संगोष्ठी में कल पत्रकारिता, भाषा, शब्दकोश एवं पाठ्यक्रम के निर्माण में हिंदी विभाग का योगदान विषय पर चर्चा एवं समापन सत्र का आयोजन होगा। इस अवसर पर संगोष्ठी के आयोजन में डॉ• सत्यपाल शर्मा, प्रो• राजकुमार और डॉ• बिपिन कुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
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