* रिपोर्ट- प्रकाश पाण्डेय, युवा पत्रकार, सामाजिक व सियासी मामलों के जानकार।
हिन्दू कॉलेज की स्थापना 1817 में हुई, बाद में 1855 में इसका नाम बदलकर प्रेसिडेंसी कॉलेज कर दिया गया। स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, स्वाधीनता सेनानी बंकिम चंद्र चटर्जी, भारत के पहले राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद, अर्मत्य सेन, सत्यजीत राय और हिन्दी फिल्मों के बेजोड़ अभिनेता अशोक कुमार समेत हिन्दी फिल्मों के मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर प्रीतम और अपर्णा सेन जैसे महान कलाकारों व विभूतियों ने यहीं से शिक्षा प्राप्त कर देश दुनिया में खूब नाम किया। बांग्ला या कहिए हिन्दुस्तान की सिनेमा में अमिट छाप रखने वाली फिल्म पाथेर पांचली के डायरेक्टर सत्यजीत राय ने यही से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री ली और कहा जाता है कि पहले पहल इसी कॉलेज की दहलीज पर बैठ उन्होंने पाथेर पांचली की रूप रेखा तैयार करनी शुरू की थी। शायद ही देश में कोई दूसरा शिक्षण संस्थान हो जिसने इस तरह के महान छात्रों की फौज देश को सुपुर्द किया हो।
स्वामी विवेकानंद के विषय में कुछ भी कहना या उनके बारे में लिखना सूरज को दीया दिखाने जैसा है। बेशक, उम्मीद करनी चाहिए कि कोलकाता का प्रेसिडेंसी कॉलेज जो आज विश्वजविद्यालय में तब्दील हो चुका है आगे भी बेहतरीन छात्र देश को देता रहे। लेकिन दुख की बात यह है कि हाल फिलहाल में यह विश्वगविद्यालय अपने शिक्षण पद्धति के लिए कम आंतरिक कलह व सियासत के लिए ज्यादा जाने लगा है और सियासी चक्रव्यूह को रचने का आरोप विश्वंविद्यालय की डीन व हिन्दी विभाग की प्रधान डा० तनुजा मजूमदार पर है।
बीते 21 अप्रैल को हिन्दी विभाग के दो शिक्षकों को जातिगत भेदभाव का शिकार बनाया गया और उन्हें यह कहते हुए सेवा मुक्त कर दिया गया कि आपका प्रदर्शन असंतोषजनक रहा है और विद्यार्थी आपकी शिक्षण पद्धति से संतुष्ट नहीं हैं। लेकिन हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों का कहना है कि जो आरोप पीड़ित शिक्षकों पर लगाए जा रहे हैं वो बेतुके और नाकाफी हैं, उलट विद्यार्थियों ने तनुजा मजूमदार पर ही कई आरोप लगाए और कहा कि तनुजा की ओर से उन्हें लगातार धमकियां दी जा रही है कि अगर वे पीड़ित शिक्षकों के साथ खड़े हुए या उनके पक्ष मे किसी प्रकार का प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें आगे गम्भीर परिणाम भोगने होंगे। पीड़ित शिक्षक सत्यदेव प्रसाद और अनिल पुष्कर के पढ़ाने की पद्धति के बारे में विद्यार्थियों का कहना था कि इन दोनों शिक्षकों की पढ़ाने की शैली दूसरे शिक्षकों की तुलना में काफी उम्दा रही है। अनिल पुष्कर दलित समुदाय से आते हैं और सत्यदेव ओबीसी से, इसको लेकर भी उनके साथ शुरू से ही भेदभाव किया जाता रहा है। दोनों शिक्षक परिवीक्षाधीन थे और एक वर्ष की अवधि के अंतराल में उनकी शिक्षण पद्धति के लिए दो बार उन्हें ग्रेड भी दिए गए थे, सत्यदेव कहते हैं कि जिस दिन उन्हें सेवामुक्ति पत्र सौंपा गया उस दिन तक उन्हें कोई खबर नहीं थी।
इससे पहले सत्यदेव दिल्ली के नामचीन किरोड़ी मल कॉलेज में 6 वर्षों तक सेवा दे चुके थे। सत्यदेव कहते हैं कि दिल्ली से कोलकाता आने के पीछे उनका एक ही उद्देश्य था कि उनका नाम प्रेसिडेंसी से जुड़े क्योंकि इसका इतिहास गौरवपूर्ण रहा है।
अनिल पुष्कर जेएनयू से पीएचडी धारक हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल विश्वकविद्यालय में शामिल होने के समय से ही उन्हें भेदभाव का शिकार होना पड़ा। इससे पहले पुष्कर इलाहाबाद विश्वाविद्यालय में पोस्टडॉक्टोरल सदस्य के तौर पर काम कर रहे थे। यहां उन्हें बार-बार अयोग्य दर्शाया जाता था और यह अहसास दिलाया जाता था कि आप आरक्षण कोटे से हैं। उनका कई मौकों पर सार्वजनिक तौर पर मजाक भी उड़ाया गया। आगे पुष्कर कहते हैं कि पिछले साल के आखिर में उन्हें अपना कोर्स पूरा करने में विफल रहने के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। इतना ही नहीं उन पर यह भी आरोप लगा था कि उन्होंने सेमेस्टर परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्नों को लीक किया था। हालांकि पुष्कर ने खुद पर लगे आरोपों के खिलाफ अपना बचाव करते हुए जारी किए गए नोटिस का जवाब दिया था। इसके बाद उन्हें लगा कि मामला खत्म हो गया क्योंकि आगे इस संबंध में कोई पत्राचार नहीं हुआ था।
साल के प्रारम्भ में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने विद्यार्थियों को उदारता दिखाते हुए ज्यादा नम्बर दिए, इस आरोप को पुष्कर ने सिरे से खारिज करते हुए गलत करार दिया था। जिसके बाद अन्य शिक्षकों ने मूल रूप से चिन्हित पेपर का फिर से मूल्यांकन किया था। बाद में उन्हें सेवा समाप्ति का नोटिस थमा दिया गया और कहा गया कि विश्व्विद्यालय की ओर से जो आवास उन्हें रहने के लिए दिया गया है उसे वे छोड़ दें हालांकि बाद में कहा गया कि जब तक वे रहने के लिए कोई दूसरा इंतजाम नहीं कर लेते तब तक वहां रह सकते हैं। वहीं सत्यदेव प्रसाद ने कहा कि शुरू से ही उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा। उन्होंने कहा कि वो पूरी ईमानदारी के साथ अपना काम करते रहे, साथ ही वरिष्ठ सहयोगियों के साथ उनका हमेशा से ही सौहार्द पूर्ण व्यवहार रहा। बावजूद इसके उन्हें हमेशा नीचा दिखाया जाता रहा। आगे उन्होंने कहा कि विभाग में उची जाति के लोगों का वर्चस्व है।
मुख्य रूप से इन दोनों शिक्षकों के आरोप के केंद्र में हिन्दी विभाग की प्रमुख तनुजा मजूमदार ही रही और उन्होंने यह भी साफ कहा कि तनुजा अपने पद का गलत इस्तेमाल कर रही है। वहीं इस पूरे मुद्दे पर तनुजा कन्नी काट रही है और मीडिया से मुखातिब होने से बच रही है। लेकिन आखिर में सवाल उठता है कि क्या शिक्षण संस्थान कभी जातिगत वर्चस्व से उपर नहीं उठेंगे या फिर आज के आधुनिक समय में भी प्राचीन प्रथा यूं ही जीवित रहेगी, जरा सोचिए.....!
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