नोटबंदी के एक साल बाद बंगाल



--- रंजीत लुधियानवी, वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता।

अमरीक सिंह महानगर के एक गुरुद्वारा में कैश का कामकाज देखते हैं। गुुरुद्वारे में प्रतिदिन लोग चढ़ावे के तौर पर रेजगारी चढ़ाते हैं। एक जमाना था जब हर महीने गुरुद्वारे की गोलक की गिनती शुरू होने से पहले लोगों की कतारें लग जाती थी। लेकिन अब हालत ऐसे हो गए हैं कि जबरन लोगों को खुदरा पैसे देने की कोशिश की जाती है, कोई लेने के लिए तैयार नहीं। जहां से खरीद फरोख्त की जाती है, वे भी और विभिन्न संस्थाओं की ओर से काम करने वाला कोई भी खुदरा लेने के लिए तैयार नहीं है। रेजगारी का भंडार बढ़ता ही जा रहा है, बैंक भी खुदरा लेने के लिए उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। 

एक स्कूल की प्रधानाध्यापिका मंजीत कौर का कहना है कि कुछ लोगों की ओर से बच्चों को स्कूल से हटा लिया गया है क्योंकि ट्रांसपोर्ट के कारोबार में लगे लोगों का कहना है कि किसी तरह से बच्चों को पढ़ा रहे थे। लेकिन नोटबंदी के बाद जीएसटी से कामकाज ठप हो गया है। 

इस बारे में महेंद्र साव का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को जब 500 और एक हजार रुपये के नोटों को रद्द करने के साथ नोटबंदी का एलान किया था, तब देश से आतंकवाद, भ्रष्टाचार, महंगाई, कालाबाजारी, जाली नोटों का कारोबार, काला धन समेत पता नहीं क्या-क्या समाप्त करने का भरोसा दिया गया था। इसके लिए प्रधानमंत्री ने 50 दिन का समय मांगा था। लेकिन हाल में एक खबर के मुताबिक लोगों को पता चला कि 350 दिन बाद भी आरबीआई की ओर से बरामद हुए नोटों की गिनती जारी है। इसके पहले आरबीआइ की ओर से बताया गया था कि बाजार में जितने नोट थे, तकरीबन सारे के सारे बैकों में जमा हो गए हैं। 

बीएसएफ की ओर से भारत-बांग्लादेश सीमा से लगातार जाली नोटों को बरामद किए जाने का सिलसिला जारी है। नोटबंदी के बाद से ही नए दो हजार के जाली नोटों की तस्करी शुरू हो गई थी। 

कल्पना का कहना है कि महंगाई लगातार आसमान छू रही है। प्याज से लेकर टमाटर, हरी मिर्च से लेकर धनिया पत्ता महंगाई के नए से नए कीर्तिमान कायम करता जा रहा है। एलपीजी सिलेंडर की कीमत में पहली बार 90 रुपए से ज्यादा की वृद्धि हुई है और महंगाई ने लोगों की जान मार दी है। 

नोटबंदी के कारण कतारों में लगकर 126 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, लेकिन केंद्र सरकार की ओरसे मरने वाले लोगों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया। लोगों का ख्याली पुलाव तैयार हो रहा था कि शायद नोटबंदी के बाद उनके बैंक खातों में सरकार की ओर से 15-15 लाख रुपये जमा करवा दिए जाएं। इस उम्मीद में कई लोगों ने बैंक खाते भी खुलवा लिए। बाद में केंद्रीय नेताओं की ओर से कहा गया कि 15 लाख रुपये दिए जाने की बात पूरी नहीं हो सकती, लेकिन देश को कैशलेस करने के लिए नोटबंदी की गई थी। हालांकि ज्यादातर लोगों का कहना है कि साल भर बाद भी वे पहले की तरह नोटों से कामधंधा कर रहे हैं।

नोटबंदी के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जोरदार विरोध शुरू किया था, अब दूसरे विरोधी दल भी इस बारे में विरोध करने लगे हैं। इसलिए देश भर में आगामी आठ नवंबर को काला दिवस मनाया जा रहा है, कोई इसे सनक दिवस कह रहा है। लेकिन भाजपा की ओर से नोटबंदी की सफलता को लेकर आठ नवंबर को कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

दूसरी ओर, रवींद्र  का कहना है कि एक अनुमान के मुताबिक काले धन को सफेद करने में करीब 30 फीसद खर्च हुआ और वह राशि उन लोगों के पास चली गई जो आर्थिक रूप से कमजोर थे। यानी काले धन का पुर्नबंटवारा हुआ, जिससे देश का गरीब तबका भी लाभान्वित हुआ। जनधन योजना वाले खातों में भी हजारों करोड़ रुपये पहुंच गए और उनका एक हिस्सा उन खातों के मालिकों को भी मिला। इसलिए आंशिक तौर पर ही सही, लेकिन धन का फिर से बंटवारा हुआ और उसका लाभ आपेक्षिक रूप से कमजोर हैसियत रखने वालों को हुआ। 

उनकी ही बातों की पुष्टि करते हुए नाम न छापने की शर्त पर महानगर के एक प्रतिष्ठित स्कूल के शिक्षक ने बताया कि नोटबंदी और मोदी का आभार क्योंकि उनके कारण दूसरे लोगों का काला धन सफेद करके सालों पुराना कर्ज ही सिर से नहीं उतरा, एक मोटरसाइकिल भी खरीदने में सक्षम हुए हैं।

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