--एकलव्य केसरी,
कोलकाता-पश्चिम बंगाल, इंडिया इनसाइड न्यूज़।
वैसे तो देश में राजनीतिक पार्टियों की लंबी फौज है। आये दिन किसी न किसी पार्टी का असंतुष्ट खेमा पार्टी से नाराज चल रहे किसी नेता की सरपरस्ती में नई पार्टी में शामिल हो जाता है। वर्षों तक पार्टी से जुड़कर नाम कमाने वाले नेताओं को ऐसा क्या हो जाता है कि वो बगावत पर उतर आते हैं। ऐसे क्या कारण होते हैं कि वह या तो किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं या फिर नई पार्टी का गठन कर लेते हैं। इन सबके बावजूद एक्का-दुक्का नई पार्टी ही सशक्त रूप से क्षेत्रीय दल के रूप में उभरती है। इनमें से कइयों का तो नाम तक वोटर नहीं जान पाते। वहीं कई नए दल क्षेत्रीय दल से आगे का सफर तय नहीं कर पाते। ये बात जरूर है कि वो अन्य राज्यों के चुनाव में अपने उम्मीदवार जरूर खड़े करते हैं।
अब बात करते हैं मुख्य मुद्दे पर कि क्यों तमाम गलत फैसलों के आरोपों और विपक्ष के प्रचार प्रसार के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश में एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरी है। वहीं कॉंग्रेस और उसके सहयोगी दलों का केंद्र की सत्ता में वापसी का रास्ता लगातार संकरा होता जा रहा है।
भाजपा जिन बातों को मुद्दा बनाती है विपक्ष उसमें फंसकर रह जाता है चाहे वह तीन तलाक़ का मुद्दा हो, धारा 370 का मुद्दा हो या फिर वंशवाद का। हालांकि भाजपा में वंशवाद नहीं है ऐसा कहना गलत होगा लेकिन विपक्ष उसे आईना दिखाने में असफल रहा है।
■ भाजपा की सबसे बड़ी ताकत :
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में काँग्रेस मुक्त भारत के नारे के साथ भाजपा ने धमाकेदार जीत दर्ज की। विपक्ष को भी इस करारी मात का अनुमान नहीं था। इस जीत का श्रेय वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिला। सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री ने पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से पहले तो रिश्ते सुधारने की पहल की। एकबार उनका अचानक पाकिस्तान जाकर पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को जन्मदिन की बधाई देना विपक्षी पार्टियों को खल गया। शांति की इस पहल को पाक हुक्मरानों ने भारत की कमजोरी समझा। पाक के नापाक इरादे आतंकी हमलों के रूप में सामने आया। लेकिन पाक के हुक्मरान को शायद यह याद न रहा कि भारत में सत्ता बदल चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंकी हमलों को देश के सम्मान पर चोट के रूप में लिया। उन्होंने साफ संदेश दिया कि देश के वीरों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, पाक को सही समय पर जवाब दिया जाएगा और हुआ भी यही। गुलाम कश्मीर में आतंकी लांच पैड पर बड़े ही गोपनीय तरीके देश के वीर जवानों ने सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया। भारत के इस आक्रामक कदम के बारे में पाक ने सोचा भी नहीं था। हालांकि विपक्षी पार्टियों के कुछ नेताओं ने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूतों की मांग तक कर डाली। देशवासियों ने मोदी के आक्रामक कदम की खूब प्रसंशा की। भारतीय सेना की इस कार्रवाई ने एक तरफ पाक को लगातार बैकफुट पर धकेला वहीं सत्ताधारी दल के कड़े फैसले लेने की क्षमता ने विपक्षी पार्टियों को।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नई भारत की बात कही वहीं कालेधन पर चोट की बात कहते हुए नोटबन्दी और जीएसटी जैसे कदम भी उठाए। सरकार के इन फैसलों ने विपक्ष को हमले का मौका दे दिया। इन सबके बावजूद जमीनी स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं की मेहनत, सोशल मीडिया पर सरकार द्वारा चलाई जाने वाली योजनाओं के प्रचार प्रसार और विशेष तौर पर कांग्रेस के पिछले कार्यकाल, नेहरू-गांधी परिवार पर लगातार बयानबाजी और कांग्रेस पार्टी की एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण नीतियों को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने की कोशिशों ने विपक्ष को खोखला कर दिया। विपक्षी पार्टियों में आपसी फूट ने भाजपा को नई ताकत दी। महागठबंधन और तीसरे मोर्चे के बैनर तले तमाम दलों को एकजुट करने की कोशिश भी हुई लेकिन कौन बनेगा पीएम के सवाल पर एकराय नहीं बन पाई। ऐसा भी नहीं है कि विपक्षी पार्टियों में सशक्त नेताओं की कमी हो पर उनमें आपसी विश्वास की कमी रही है। विपक्षी पार्टियों में आपसी सहमति की कमी, एक-दूसरे के खिलाफ राज्य चुनावों में तीखे शाब्दिक हमले वोट को विभाजित करते रहे हैं। वहीं विपक्षी पार्टियों का यही रवैया भाजपा की ताकत बनकर उभरा है।
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