--प्रकाश पाण्डेय,
हावड़ा-पश्चिम बंगाल,
इंडिया इनसाइड न्यूज़।
■ जुमलों से परेशान आम अवाम
■ कैंसर से पीड़ित हैं विक्रम सिंह गरेवाल
तरक्की के नाम पर देश बेचने की नीतियों के कारण आज हिन्दुस्तान की अवाम का वर्तमान की केंद्र की मोदी सरकार पर से विश्वास उठने लगा है। कोरोना संक्रमण के दौरान लॉकडाउन में जिस तरह से लोगों की नौकरियां गई व महंगाई बढ़ी, वो यह साबित करने को काफी है कि अन्य सरकारों की भांति ही मोदी सरकार भी महज़ छलावे और जाति-धर्म के नाम पर बंटवारे के बूते अपनी सियासी सफरनामे को आगे बढ़ाना चाहती है। एक ओर हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी "मन की बात" कार्यक्रम के जरिए युवाओं को आत्मनिर्भर होने को नए सिरे से स्टार्टअप और व्यवसाय पर जोर देने को प्रोत्साहित करने के साथ ही सरकार को नई कार्य योजना देने की बात करते हैं। पर विडंबना इस बात की है कि अगर देश की तरक्की को कोई कार्य योजना उन्हें सौंपी जाती है तो उसके क्रियान्वयन के बजाय पैसों की अनुपलब्धता की दुहाई दी जाती है। हालांकि, जब धन एकत्रीकरण के सरल उपाय बताए जाते हैं तो ये सरकार उक्त विषय पर प्रतिउत्तर से बचाने को खामोश हो जाती है। दरअसल, उक्त बातें पश्चिम बंगाल के हावड़ा जनपद निवासी व 78 वर्षीय बुजुर्ग विक्रम सिंह गरेवाल ने कही।
उम्र के 78वें बसंत पर कैंसर से जद्दोजहद कर रहे विक्रम सिंह अपनी तमाम शारीरिक समस्याओं को भूलकर युवाओं को रोजगार से जोड़ने की बात करते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने देश में रोजगार कैसे बढ़े व सालों से आफत बनी नदियों की रफ्तार और बाढ़ से होने वाले नुकसान को सर्वथा के लिए खत्म करने को एक खास रोड मैप के साथ केंद्र की मोदी सरकार को तीन प्रस्तावों की प्रतियां भेजी थी, जिसके क्रियान्वयन के बाद इन समस्याओं का स्थायी निदान ही नहीं, बल्कि देश में बिजली उपज भी बढ़नी तय थी। साथ ही भारी संख्या में नागरिकों को रोजगार भी मिलती। इसके इतर, राज्य व केंद्र के अधीन राजमार्गों से लगी खाली जमीन के इस्तेमाल से लोगों को आसानी से रोजगार से जोड़ सरकार देश की कोष भर सकती थी। विक्रम सिंह कहते हैं कि सरकार को सबसे पहले कुछ नीतिगत ऐसे प्रारूप तैयार करने होंगे, जिससे कि स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीक से हर भारतीय को जोड़ा जाए। इसके बाबत भी उन्होंने जिलों की एक ऐसी रूपरेखा तैयार की, जिसमें हर घर खुशहाली की झलक देखने को मिलती है। इसमें मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, हाई स्कूल समेत अन्य आवश्यक मौलिक बिन्दुओं को इंगित किया गया। लेकिन इतना कुछ करने के बाद भी जब उक्त प्रस्तावों को मौजूदा मोदी सरकार को सौंपा गया तो प्रतिउत्तर निराशाजनक ही रहा।
विक्रम सिंह कहते हैं कि आज हमारे देश में धन की कोई कमी नहीं है, बावजूद इसके जनता रोटी को जद्दोजहद कर रही है। नौकरी और रोजगार दूर की कोड़ी बन गए हैं। इन सभी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ही मैंने मोदी सरकार को तीन ऐसे प्रस्ताव की प्रतियां भेजी थी, जिससे जमीनी स्तर पर रोजगार की समस्याओं से निजात मिलने के साथ ही देश को आर्थिक मोर्चे पर अधिक सबल बनाया जा सकता था। लेकिन दुख की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अधिनस्थ अफसर पीएम तक पत्र की कॉपी ही नहीं जाने दिए और खुद से जवाब दे दिए। कहा गया कि वर्तमान में देश के पास संबंधित प्रस्तावों पर काम करने को पर्याप्त पैसे नहीं हैं। हालांकि, प्रस्ताव की प्रति में ही सरल धन एकत्रीकरण के उपाय भी सुझाए गए थे। जिसपर अमल मात्र से ही देश में व्याप्त समस्याओं का निदान किया जा सकता था। यहां तक कि 12 करोड़ से अधिक नागरिकों को सीधे रोजगार से जोड़ा जा सकता था।
दरअसल पहले प्रस्ताव में बाढ़ की विभीषिका को खत्म करने को नए बांधों के निर्माण और पुराने बांधों में जमी मिट्टी की सफाई पर जोर दिया गया था। अगर सिस्टेमेटिक तरीकों से पानी की क्षमता के अनुरूप बांधों का निर्माण किया गया होता तो बाढ़ की समस्याओं के स्थायी निदान के साथ ही सिंचाई व्यवस्था को भी अधिक बेहतर बनाया जा सकता था। इतना ही नहरों के द्वारा रेगिस्तानी इलाकों तक पानी पहुंचाई जा सकती। यानी संकट को अवसर में तब्दील किया जा सकता। यहां तक कि बांधों से नहरें निकालकर सिंचाई को सुगम बनाने के अलावा पनबिजली निर्माण कर देश का राजकोष भी भर सकते थे। वहीं, दूसरे प्रस्ताव में जिलेवार मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ ही प्रबंधन संस्थानों को खोल शिक्षा के स्तर को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करने के बारे में बताया गया था। इससे रोजगार की भी संभावनाएं बढ़ती। प्रस्ताव में कहा गया था कि देश के नागरिकों से मनोरंजन टैक्स के रूप में महज 200 रुपए लेकर अगर हम अपने आधारभूत ढांचे का विस्तार करने के साथ ही स्वास्थ्य देखभाल को उच्च गुणवत्ता की सुविधाएं मुहैया कराए तो हर व्यक्ति खुशी-खुशी इस राशि को देने को तैयार होता।
वहीं, आखिरी व तीसरे प्रस्ताव में हाईवे पर खाली पड़ी जमीन और अतिक्रमित जमीनों को स्थानीय लोगों को देकर उस जमीन पर साग-सब्जी उपजा उसे समीपवर्ती बाजारों में बेचकर धन अर्जित करने का जिक्र किया गया था। इससे करीब 2.5 करोड़ लोगों को सीधे रोजगार से जोड़ा जा सकता था। इतना ही नहीं नक्सल प्रभावित और सीमा से लगे इलाकों में भी चहलकर्मी बढ़ती और इसका लाभ यह होता कि वहां की हर गतिविधि पर नजरें रखी जा सकती। इन इलाकों के हर नागरिक को यदि सेना द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता तो ये नागरिक ही मुश्किल वक्तों में देश की मजबूती बन जाते।
● बांधों की व्यापक पहुंच से अधिक लाभ
प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से समृद्ध भारत में नदियों की एक व्यापक श्रृंखला है, जो पूरे देश में अविरल गति से बहती हैं। वहीं, राष्ट्रीय विकास प्रतिमान के केंद्र में बड़े बांधों को रखने वाली वैज्ञानिक कल्पना सदियों पुरानी है। हम बांधों की वर्तमान संरचना को संशोधित करने का प्रस्ताव रखा था, ताकि एक एकल बांध से तीन बांधों को स्टेप-डाउन संरचना में बदल दिया जाए और प्रत्येक का अपना जलाशय हो। नदियों पर तीन बांध सिंचाई के लिए अधिक कवरेज, पनबिजली उत्पादन के लिए अधिक गुंजाइश आदि में मददगार साबित होते। साथ ही अनिवार्य रूप से इस संशोधन के साथ बांध के लाभ को 2x से अधिक तक उत्पन्न करने में मदद करते।
इधर, स्टेप डाउन डैम संरचना के साथ, हमारे पास बांध के साथ ही और अधिक नहरें खोलने की क्षमता होती और इनके स्पर्श वाले उन क्षेत्रों को लाभ मिलता, जो पहले पहुंच के भीतर नहीं थे और अलग-अलग ग्रामीण क्षेत्रों तक पानी पहुंच से किसानों की खेती संबंधित समस्याओं का भी स्थायी समाधान सुनिश्चित होता। वहीं, पहला बांध संरचना में सबसे बड़ा होता, दूसरा बांध पहले के 75% की क्षमता वाला और तीसरा बांध संरचना में पहले के 60% की क्षमता वाला होता। यह जलाशयों बनाम वर्तमान बांधों के लिए मौजूदा क्षमता का 2.25x तक को जोड़ता।
साथ ही सभी नदियों के किनारे 15 फीट की अतिरिक्त फुटवाल बनाकर सभी नदियों की गहराई को 30 फीट और बढ़ाने के बाबत कल्पित प्रस्ताव में जिक्र किया गया था। हालांकि, पानी के बहाव को नियंत्रित करने को 20 किलोमीटर के अंतराल पर लॉक गेट वाली नहरें बनाने और बांध से नहर की उत्पत्ति के हर बिंदु पर जलविद्युत ऊर्जा जनरेटर स्थापित करने का भी कल्पित प्रस्ताव में उल्लेख किया गया था, जो आसपास के गांवों और कस्बों को बिजली मुहैया कराने का काम करते।
■ स्वास्थ और शिक्षा को सुदृढ़ कर सृजित होता रोजगार
● शिक्षा
प्रस्ताविक सुझाव में हमने इस बात का जिक्र किया था कि देश के आधार कार्ड धारक नागरिकों से प्रति माह 100 या 200 रुपए गुणवत्ता प्रधान सेवा मासिक शुल्क के नाम पर लिया जाए और उन्हें इसके एवज में गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा प्रदान किया जाए। हालांकि, इससे पहले, निजी स्कूलों के बराबर आने को सरकारी स्कूलों में सुधार करने को भी कल्पित प्रस्ताव में कहा गया था, ताकि गुणवत्ता के साथ ही खामियों को यथाशीघ्र दुरुस्त किया जा सके। वहीं, शिक्षा के साथ ही राष्ट्रीय खेलों पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने के बारे में भी कल्पित प्रस्ताव में कहा गया था। जिससे वास्तव में भारत का भविष्य निर्माण सुनिश्चित हो सकता था। एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि 2010-11 और 2015-16 के बीच सरकारी स्कूलों में औसत नामांकन 122 से घटकर 108 छात्र प्रति स्कूल हो गया था। शिक्षा को देश की समस्त जनसंख्या तक अनिवार्य रूप से पहुंचाने को यह आवश्यक है कि सरकारी विद्यालयों के मोहभंग की वर्तमान प्रवृत्ति को समाप्त किया जाए।
यदि हम सरकारी स्कूलों को सैन्य स्कूलों के समान दायरे में लाते हैं, तो स्कूलों में शिक्षा और समग्र गुणवत्ता में वृद्धि होगी। साथ ही छात्रों के लिए एनसीसी के साथ अनिवार्य 2 साल का कार्यकाल भी सुझायआ गया, जो छात्रों में अनुशासन के साथ-साथ देशभक्ति की भावना पैदा करने में मदद करने का काम करता।
इसके अलावे रोजगार के मुद्दे से निपटने को जिलेवार इंजीनियरिंग कॉलेज, चिकित्सा, प्रबंधन और इसी तरह के क्षेत्रों को कवर करने वाले कॉलेजों के साथ देशभर के हर बड़े शहर में शिक्षा तक पहुंच विकसित करने को काम करने की बातें रखीं। साथ ही मांग के अनुरूप सीटों की उपलब्धता और पाठ्यक्रमों के लिए आवेदन करने वाले लोगों की संख्या के संबंध में भी हमने पंजीकरण तंत्र को चाक-चौबंद करने पर कल्पित प्रस्ताव में फोकस किया था।
● चिकित्सकीय देखभाल
ऐसे तो देश के हर नागरिक को 5 लाख का बीमा कवर प्रदान करने का कल्पित प्रस्ताव में जिक्र किया गया था, जो कि पहले से ही राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत आता है। वहीं, सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पतालों में सेवा के बेहतर मानकों को सुनिश्चित करके चिकित्सा देखभाल की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर भी हमने खास तौर पर जोर दिया था। भारत के स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता उपलब्ध सेवाओं में गुणवत्ता की एक श्रृंखला है।
● ऐसे होता हाईवे पर खाली व अतिक्रमित जमीनों से लाभ
विक्रम सिंह गरेवाल द्वारा तैयार "हरित विकास रणनीति" प्रोजेक्ट के तहत भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को यह सुझाव दिया गया था कि प्राधिकरण अपने खाली पड़े जगहों का सुचारू ढंग से इस्तेमाल कर करीब 2.5 करोड़ रोजगार नए सिरे से सृजित कर सकता है। इसके लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाने को राजमार्गों पर खाली पड़ी जगहों के साथ-साथ अवैध रूप से अतिक्रमित सरकारी भूमि को साफ कराने का सुझाव दिया गया था। साथ ही प्रोजेक्ट में इस बात का भी उल्लेख किया गया था कि इस प्रस्ताव के तहत सेना के तत्वावधान में संलिप्त नागरिकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें प्रत्यक्ष रोजगार शुरू करने को प्रोत्साहित किया जाएगा। ताकि ग्रीन कॉरिडोर की स्थिरता, कार्यान्वयन, निष्पादन और बाद की सुरक्षा को सुविधाजनक बनाया जा सके।
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