उनका बुलडोजर, उन्हीं पर चला दिया गया है



--दयानंद पांडेय,
वरिष्ठ साहित्यकार,
संरक्षक - अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी सेवा न्यास।

फ़िलहाल तो उत्तर प्रदेश की सत्ता राजनीति में यूक्रेन और रुस जैसा ही घमासान है। अटल बिहारी वाजपेयी इकाना स्टेडियम अखिलेश यादव का बनवाया हुआ। मंत्रिमंडल नरेंद्र मोदी और अमित शाह का बनाया हुआ। योगी मंत्रिमंडल का कुल हासिल यह है कि उनका बुलडोजर, उन्हीं पर चला दिया गया है। कुचल कर रख दिया गया है योगी को, उनके ही बुलडोजर से। 10 मार्च को नतीज़ा आया और 15 दिन लग गया शपथ ग्रहण में। इस देरी से ही समझ आ गया कि योगी के हाथ-पांव बांधने की इक्सरसाइज चल रही है। गड़बड़ एक दिन पहले से ही दिख रही थी। जब विधायक दल की बैठक लोकभवन में नेता चुनने के लिए हुई तभी योगी तनाव में दिखे। लगातार। योगी के भाषण में भी जोश नहीं औपचारिकता थी।

हरदम ऊर्जा से भरे रहने वाले योगी चेहरे पर थकान लिए घूम रहे थे। और जब उन के 52 सहयोगियों ने शपथ ली तो उनके तनाव के प्याज के छिलके परत दर परत खुलते दिखे। और हद्द तो तब हो गई जब शपथ के बाद ग्रुप फ़ोटो सेशन हुआ। बीच में मोदी, मोदी के एक बगल राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और दूसरी बगल योगी। यहां तक तो ठीक था। पर आनंदीबेन पटेल की बगल में केशव प्रसाद मौर्य पीछे से आ कर एक मर्यादित दूरी रख कर खड़े हुए। लेकिन योगी के बगल में बृजेश पाठक जिस तरह अशोभनीय ढंग से योगी को चांप कर खड़े हुए, वह बहुत ही अमर्यादित था।

यह दृश्य देख कर निरहुआ का गाया गाना याद आ गया, चलेला जब चांपि के बाबा क बुलडोजर! बृजेश पाठक योगी के बगल में इस क़दर चांप कर खड़े हुए कि भूल गए कि वह अपने कैप्टन के बगल में खड़े हैं। इतना कि योगी अपना हाथ भी उठा कर हिला नहीं पाए। कम क़द वाले योगी ने लंबे क़द वाले बृजेश पाठक को बगल से सिर उठा कर दो बार तरेर कर देखा भी। पर बृजेश पाठक को इस की बिल्कुल परवाह नहीं थी। जितनी बदतमीजी वह कर सकते थे, अभद्रता कर सकते थे, भरपूर करते रहे। इस पर योगी का तमतमाया चेहरा देख कर एक बार तो मुझे लगा कि कहीं वह बृजेश पाठक को वहीं डपट कर चपत न मार दें।

लेकिन योगी ऐसा कुछ करने के बजाय वह किसी तरह अपने को संयत किए रहे। फिर अभद्र स्थिति से बचाव के लिए ख़ुद मुड़ कर खड़े हो गए। 180 डिग्री से हट कर 90 डिग्री पर खड़े हो गए। क्या कोई मुख्यमंत्री शपथ के बाद ऐसे भी कहीं ग्रुप फ़ोटो खिंचवाता है? मोदी समेत सब लोग एक दिशा में देख रहे हैं। और मुख्यमंत्री योगी अकेले दूसरी दिशा में मुड़ा हुआ। चेहरे पर हर्ष नहीं, हताशा है। क्या पता आगे, ऐसे और भी चित्र देखने को मिलें।

जाहिर है बृजेश पाठक ने अपने आक़ा लोगों की ताक़त पर योगी को मुख्यमंत्री नहीं, फिलर मान लिया है। आज ही से। योगी के वह पुराने निंदक भी हैं। केशव प्रसाद मौर्य पहले ही से योगी को अपमानित करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ने के अभ्यस्त रहे हैं। कुछ समय पहले तक जब भी कभी उन से पूछा जाता था कि किस के नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगे? तो वह या तो मोदी का नाम लेते थे या कमल का फूल के नेतृत्व में चुनाव लड़ना बताते थे। और हरदम माहौल बनाते रहते थे कि योगी अब गए कि तब गए।

योगी गए तो नहीं पर प्रचंड बहुमत पा कर लौटे। पर क्या जानते थे कि जिस बुलडोजर के नाम पर वह विजयी हुए, वही बुलडोजर मोदी और अमित शाह उन पर ही चढ़ा देंगे। मैं होता या कोई अन्य सामान्य आदमी भी होता तो ऐसे मंत्रिमंडल के साथ शपथ लेने की जगह शपथ लेने से इंकार कर देता। या अपने मनमुताबिक़ मंत्रिमंडल बनाता या सरकार से बाहर रह जाता। 2017 में योगी ने मुख्यमंत्री न बनने की स्थिति में बग़ावत का झंडा उठा लिया था। मोदी एंड कंपनी को झुकना पड़ा था। तब योगी के साथ बग़ावत करने भर के विधायक थे। इसलिए योगी की बात मान ली गई। फिर जब बीते दिनों योगी को ताश के पत्ते की तरह फेंटने की कोशिश की गई तब भी योगी ने ताश की गड्डी में समाने से इंकार कर दिया था।

इस बार योगी के पास बग़ावत करने के लिए कुछ नहीं है। क्योंकि इस बार टिकट बांटने में उनकी नहीं चली है। अब योगी के पास अगर है कुछ तो नाथ संप्रदाय की ताक़त, गोरखनाथ का योग। और गोरख की शिक्षा। वनडे मैच खेलने वाले योगी हार-जीत और कुचक्र के फेर में नहीं पड़ते। योगी को अपने काम पर इतना भरोसा है, अपनी निर्भीकता पर इतना भरोसा है कि यहां-वहां उठक-बैठक करने में यक़ीन नहीं करते। गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर में यह सब उन्होंने सीखा है। लोग जानते ही हैं कि योगी आदित्यनाथ गुरु गोरखनाथ के नाथ संप्रदाय से आते हैं। वह गोरख जो अपने गुरु मछेंद्रनाथ को भी उनके विचलन पर अवसर आने पर चेताते हुए कहते हैं, जाग मछेंदर, गोरख आया! योगी अपनी राजनीति में भी यही सूत्र अपनाते हैं।

पर हाईकमान के नाम पर जो मंत्रिमंडल योगी को मिला है, उसमें योगी के मन के दो-चार लोग ही हैं। उनकी पसंद का तो एक भी नाम नहीं है। देखना दिलचस्प होगा कि ऐसे बेमन के मंत्रिमंडल से योगी कैसे शासन और प्रशासन को साध पाते हैं। अभी तो योगी मंत्रिमंडल में प्रशासनिक सेवा के सिर्फ़ अरविंद शर्मा ही नहीं उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव दुर्गा प्रसाद मिश्र भी मोदी के सहयोगी रहे हैं। रिटायर होने के एक दिन पहले ही मिश्रा को मुख्य सचिव बना कर मोदी ने उत्तर प्रदेश का मुख्य सचिव बना कर भेजा और साल भर का सेवा विस्तार दे दिया। मतलब मंत्रिमंडल ही नहीं, प्रशासन भी योगी की मन मर्जी का नहीं है।

मुलायम सिंह यादव का पहला कार्यकाल याद आता है। अखिलेश यादव का कार्यकाल याद आता है। मुलायम सिंह यादव जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे बसपा के सहयोग से तब कांशीराम ने पी एल पुनिया को मुख्यमंत्री का सचिव बनवा कर अपना प्रतिनिधित्व कायम रखा था। मुलायम पर नकेल लगा रखी थी। पी एल पुनिया, मुलायम के लिए कम, कांशीराम और मायावती के लिए काम ज़्यादा करते थे। इसी तरह जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो मुलायम ने अखिलेश पर नकेल लगाने के लिए अखिलेश की सचिव अनीता सिंह को बनवाया था। अनीता सिंह मुलायम के लिए काम करती थीं। अखिलेश के लिए नहीं। अखिलेश को अनुभव भी नहीं था। अब मोदी लगातार योगी के लिए यही सब करते जा रहे हैं। निरंतर। कभी इसी तरह इंदिरा गांधी भी अपने मुख्यमंत्रियों को इसी तरह नकेल डाले रहती थीं। नौकरशाही और मंत्रिमंडल मुख्यमंत्री के मनमुताबिक नहीं, अपने मनमुताबिक़ रखती थीं। एक नहीं, अनेक क़िस्से हैं।

तो अभी मंत्रियों के विभाग बंटवारे और फिर अफ़सरों के तबादले में भी योगी की कितनी चलती है, यह देखना दिलचस्प होगा। अफ़सरों के तबादले में अभी तक एक नाम सुनील बंसल का अक्सर लिया जाता रहा है। सो अभी तो योगी को चारो तरफ से केकड़ों से घेर दिया गया है। इन केकड़ों के भरोसे अगर मोदी 2024 में उत्तर प्रदेश में 70 -75 सीट जीतने का सपना देखे हुए हैं तो अभी से यह सपना टूटा हुआ समझिए। हां, योगी के हिस्से अभी भी शहरों के नाम बदलने और बुलडोजर चलाने का काम शेष है। जाग मछेंदर, गोरख आया! सूत्र भी साथ है, उनके साथ। कौन कितना फलदायी साबित होगा, यह आने वाला समय बताएगा। कि कौन रुस है, कौन यूक्रेन। फ़िलहाल तो उत्तर प्रदेश की सत्ता राजनीति में यूक्रेन और रुस जैसा ही घमासान है। परमाणु संपन्नता की परवाह किसी को नहीं है। इसलिए भी कि योगी मंत्रिमंडल का कुल हासिल यह है कि उनका बुलडोजर, उन्हीं पर चला दिया गया है।

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