मिटता निशां…….



विशेष संवाददाता, बंगाल - प्रकाश पाण्डेय।

कोलकाता महानगर का इतिहास अपने आप में विशाल व अंग्रेजों के उपनिवेशवाद के इतिहास से जुड़ा है। आजादी की क्रांति की अलख से लेकर साहित्य साधना व साम्यवाद की प्रथमार्थ पदार्पण का किस्सा भी यहां की मिट्टी में दफना पड़ा है, जो सियासत के केंद्र में रहें उन्हें इतिहास के पन्नों में जगह मिली और जो सियासत से बेदखल रहें वे अनाम दास के पोथी की तरह दरकिनार कर दिए गए। हुगली नदी के किनारे तीस मील में पसरा कोलकाता महानगर टकराव भरे तर्जुबें से पटा पड़ा है। शहर में तिलिस्मी महल और शूल सी चुभती झुग्गियां यहां के इतिहास को आज भी बयां करती है। किसी को इस शहर को देख टोकियो तो किसी को लंदन और न्यूयार्क की याद आती है। किसी ने सीटी ऑफ जाय कहा, तो किसी ने मुर्दों का टीला घोषित कर दिया यानि कहने का अर्थ यह है कि जिसे जैसा लगा उसने शहर का नामकरण वैसे किया। आज भी यहां सियासत की शून्यता और संघर्ष के आसरे को सड़क पर चलते हुए देखा जा सकता है। बंगाल की सियासत के बारे में कहा जाता है कि यहां सत्ता के बदलाव के दौरान कुछ खास तब्दिलियां नहीं होती है, महज मुखौटा परिवर्तन से ही काम चल जाता है।

मुम्बई के बाद देश के सबसे बड़े धोबीघाट का रुतबा इसी शहर को हासिल है लेकिन इस रुतबे की दीवार पर सियासी दिमक कुछ इस कदर लगी है कि किल्लत का अंबार धोबियों की व्यथा की कथा के रूप में सामने आ रही है। महानगर का एक धोबी घाट जल्द ही इतिहास बनने के कगार पर है। बालीगंज के सर्कुलर रोड के पास स्थित सेंट लारेंस स्कूल के पीछे साउथ धोबीखाना है। पानी की किल्लत की वजह से यहां कपड़ा धोने आने वाले धोबी अब निगम की ओर आशा भरी नजरों से देख रहे हैं। कोलकाता नगर निगम इस समस्या के निराकरण के लिए बोरिंग ट्यूबवेल लगाने की बात तो कर रहा है, लेकिन समस्या यह है कि अभी तक निगम की ओर से यह साफ नहीं किया गया है कि आखिरकार यह व्यवस्था किसकी ओर से की जाएगी। कपड़ों की धुलाई करने के लिए यहां कुल 108 पैन हैं जो कभी लबालब पानी से छलका करते थे लेकिन आज यहां ऐसा कुछ नहीं है। गरम हवाओं और पानी की किल्लत की वजह से ज्यादातर धोबी यहां आने से कतराते हैं। कभी यहां का दृश्य भी बिल्कुल मुंबई की तरह दिखता था। लेकिन आज वैसा कुछ नजर नहीं है। कोलकाता नगर निगम के टाला टैंक से यहां पानी की पूर्ति की जाती है लेकिन इन दिनों धोबी घाट को पानी की समस्या से दो चार होना पड़ रहा है। यहां प्रतिदिन कई टन कपड़ों की सफाई की जाती है। महानगर के तमाम बड़े रेस्तरां, होटल, गेस्ट हाउस के अलावा सभी धोबियों ने अपने कपड़े धोने के लिए यहां के धोबियों को आउटसोर्स कर रखा है। अलसुबह से ही यहां कपड़ों की धुलाई शुरू हो जाती है, जो गोधुली बेला तक चलते रहती है। लेकिन पिछले कई सालों से ये धोबी घाट पानी की किल्लत से जूझ रहा है। वहीं यहां के धोबियों की शिकायत है कि कई दफा उन्हें पीने तक का पानी नहीं मिलता है। ऐसे में आप कल्पना कर सकते हैं कि ये लोग कैसे काम करते होंगे। नाम व तस्वीर न छापने की शर्त पर एक धोबी ने बताया कि यहां दिन में दो बार ही पानी की आपूर्ति की जाती है। सुबह 6.30 से 9.00 बजे तक पानी मिलता है, लेकिन पानी का प्रेशर 7 बजे बढ़ता है। शाम में 4 से 6 बजे तक पानी की सप्लाई की जाती है, लेकिन शाम के वक्त पानी का फ्लो बेहद कम होता है। स्थानीय पार्षद के बारे में पूछे जाने पर उसने बताया कि ये धोबी घाट कोलकाता नगर निगम के 69 नंबर वार्ड के अंतर्गत आता है और इस वार्ड के पार्षद सुखदेव चक्रवर्ती हैं।

जब इस समस्या को लेकर स्थानीय पार्षद सुखदेव चक्रवर्ती से बात की गई तो उन्होंने कहा कि पानी की किल्लत पहले से ही इलाके में है और यहां कपड़े धोने के लिए पेयजल का इस्तेमाल किया जाता है। अगर यहां पानी के प्रशेर को बढ़ाया गया तो आसपास के इलाकों में पेयजल की समस्या आ सकती है। ऐसे में समस्या के निराकरण के लिए नगर निगम की ओर से यहां बोरिंग ट्यूबवेल लगाने की बात कही गई, जिसके लिए धोबी तैयार नहीं हैं। पार्षद से बातचीत के बाद कोलकाता नगर निगम के जलापूर्ति विभाग के डायरेक्टर जनरल बीके माइती से जब इस समस्या के बाबत सवाल किए गए तो उन्होंने कहा कि यह समस्या आज की नहीं है। समस्या के निराकरण के लिए नगर निगम के सदस्य वहां का दौरा भी कर चुके हैं। यदि यहां पानी की सप्लाई बढ़ाई जाती है तो आम लोगों को पेयजल की समस्या से जूझना पड़ेगा। वहीं उन्होंने कहा कि हमने धोबियों को इस समस्या के निराकरण के लिए बोरिंग ट्यूबेल लगाने को कहा है। लेकिन मोइती साहब ने एक बार भी यह नहीं कहा कि बोरिंग ट्यूबेल की व्यवस्था निगम की ओर से की जाएगी।

साउथ धोबीखाना की नींव साल 1902 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान रखी गई, उस दौरान कलकत्ता देश की राजधानी हुआ करता था। अंग्रेजों ने कपड़ों की सफाई के लिए साउथ धोबीखाना बनाया। आज भी अंग्रजों के समय में काम करने वाले धोबियों के वंशज यहां काम कर रहे हैं। लेकिन दुख की बात तो यह है कि आज के आधुनिक मशीनरी के दौर में कोलकाता का ये साउथ धोबीखाना घाट श्रम की उस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं जो उपनिवेशवाद की कथा को बयां करने का एक नजीर मात्र है और यहां काम करने वाले लोग अपनी विरासत को किल्लत की लकीर से बाहर लाने की कोशिश में जुड़े हैं।

https://www.indiainside.org/post.php?id=90