विशेष संवाददाता, बंगाल – प्रकाश पाण्डेय
सियासी गणित के माहिर पीएम मोदी ने एनडीए की ओर से राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में एक दलित चेहरे को पेश कर विरोधियों की बोलती बंद कर दी।
सियासी गलियारों में जिन नामों को जाहिरी तौर पर रखा जा रहा था यदि उनमें से कोई नाम उम्मीदवार के रूप में सामने आता तो विरोधी खेमों की ओर से ज्वार उठना तय था। शिवसेना ने अपना रूख पहले ही साफ कर दिया था कि नाम सर्वमान्य होना चाहिए। दरअसल राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के नाम पर फैसला के लिए बीजेपी संसदीय बोर्ड की अहम बैठक में चले लंबे मंथन के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने राम नाथ कोविंद के नाम की घोषणा की। लेकिन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद का नाम हर किसी के लिए चौकाने वाला रहा।
दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में हुई बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू, अनंत सिंह और थावर चंद गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता शामिल थे।
वहीं सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर बीजेपी ने अपने सभी सांसदों और विभिन्न राज्यों के अपने विधायकों को दिल्ली बुलाया है। दरअसल राष्ट्रपति चुनाव के लिए चार नामांकन पत्र दाखिल होंगे। इन सभी में कुल 480 सांसद, विधायक हस्ताक्षर करेंगे।
इसके इतर पीएम मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह से बातचीत करके राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने का अनुरोध भी किया है।
राम नाथ कोविंद मौजूदा समय में बिहार के राज्यपाल हैं और इससे पहले कोविंद दिल्ली हाईकोर्ट में 1977 से 1979 तक केंद्र सरकार के वकील रहे थे। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 16 साल तक प्रैक्टिस की। इसके बाद 1971 में दिल्ली बार काउंसिल के लिए नामांकित हुए थे। 1980 से 1993 तक केंद्र सरकार के स्टैंडिग काउंसिल में रहें। साल 1994 में कोविंद उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए सांसद चुने गए और 12 साल तक राज्यसभा सांसद रहे। अपने 12 साल तक सांसद रहने के दौरान उन्होंने शिक्षा से जुड़े कई मुद्दों को उठाया। ऐसा कहा जाता है कि अधिवक्ता रहने के दौरान कोविंद ने गरीब दलितों के लिए मुफ्त में कानूनी लड़ाई भी लड़ी। इतना ही नहीं वे कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे हैं। ये समितियां हैं- आदिवासी, होम अफेयर, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, सामाजिक न्याय, कानून न्याय व्यवस्था और राज्यसभा हाउस कमेटी के भी चेयरमैन रहे।
कोविंद का जन्म एक अक्टूबर 1945 को उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में हुआ था और उन्होंने कानपुर विश्व्विद्यालय से बीकॉम और एलएलबी की डिग्री हासिल की। उनकी शादी 30 मई 1974 को सविता कोविंद से हुई थी। इनके एक बेटे प्रशांत और बेटी स्वाति हैं।
कोविंद गवर्नर्स ऑफ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के भी सदस्य रह चुके हैं। साल 2002 में कोविंद ने संयुक्त राष्ट्र के महासभा को संबोधित किया था और उनकी पहचान एक दलित चेहरे के रूप में अहम रही है। छात्र जीवन में कोविंद ने अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं के लिए काफी काम किया। कोविंद के सियासी केरियर की बात करे तो उनकी छवि हमेशा से ही बेदाग रही है।
वहीं सियासी जानकारों की माने तो साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है। ये किसी मास्टर स्ट्रोक से कम नहीं है और इस निर्णय के बाद विपक्ष की एकता धराशाई होती दिख रही है। ऐसे में यह कहना जरा भी गलत नहीं होगा कि सियासी समझ की जो गणित मोदी एंड टीम की ओर से पेश की गई है उस पर कोई दूसरा फार्मूला फीट ही नहीं हो सकता है। विपक्ष की ओर से बार-बार एक ही बात की रट लगी थी कि आम सहमति के लिए बेदाग चेहरा होना चाहिए और पीएम मोदी इस बात को समझ चुके थे कि इस परीक्षा को पास करना है तो कुछ खास पैतरे की आवश्यकता है और उन्होंने आखिरकार दलित कार्ड खेलकर सबकी बोलती बंद कर दी।
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